बिजनेस स्टैंडर्ड - दो कानूनों के तहत मुआवजा एक साथ
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दो कानूनों के तहत मुआवजा एक साथ
एमजे एंटनी /  February 10, 2013

उच्चतम न्यायालय ने पिछले हफ्ते यह फैसला सुनाया कि अगर किसी श्रमिक की मौत काम के दौरान हो जाती है तो वह श्रमिक मुआवजा कानून और मोटर व्हीकल ऐक्ट दोनों ही के तहत मुआवजा पाने का हकदार है। उच्चतम न्यायालय ने ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी की अपील को ठुकरा दिया। बीमा कंपनी ने मोटर वाहन दुर्घटना न्यायाधिकरण और कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुआवजे के फैसले को चुनौती दी थी। यह फैसला मुरगांव पोर्ट ट्रस्ट के एक श्रमिक की काम के दौरान हुई मौत से जुड़ा था। बंदरगाह के अधिकारियों ने मृतक के आश्रितों को श्रमिक मुआवजा कानून के तहत मुआवजा दिया था। आश्रितों ने इससे पहले न्यायाधिकरण का रुख किया था। बीमा कंपनी की दलील थी कि चूंकि आश्रितों को श्रमिक मुआवजा कानून के तहत मुआवजा मिल चुका है, इस कारण से उन्हें मोटर व्हीकल ऐक्ट के तहत दोबारा मुआवजा नहीं दिया जा सकता। उच्चतम न्यायालय ने इस दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि आश्रितों ने पहले ही मुआवजे के लिए न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटा दिया था। इसी बीच बंदरगाह के अधिकारियों ने खुद ही श्रमिक मुआवजा कानून के तहत मुआवजा अदा कर दिया था। इस तरह आश्रितों ने दो बार क्लेम नहीं किया। हालांकि अदालत ने मुआवजे की दोनों रकम को इस तरह तय किया कि किसी तरह का दोहराव न हो।

विलंब के कारण अपील खारिज
उच्चतम न्यायालय ने पिछले हफ्ते लखनऊ विकास प्राधिकरण की उस अपील को खारिज कर दिया जिसमें प्राधिकरण ने राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग और उपभोक्ता फोरमों के फैसले को चुनौती दी थी। उच्चतम न्यायालय ने यह कहते हुए प्राधिकरण की अपील को खारिज कर दिया कि उसने साढ़े चार साल बाद आयोग में अपील की। जमीन के एक आवंटी श्याम कपूर ने कहा कि प्राधिकरण की ओर से मांगी गई बढ़ी हुई रकम के भुगतान के बावजूद उन्हें जमीन का आवंटन नहीं किया गया। जिला फोरम ने प्राधिकरण को उस जमीन का आवंटन करने को कहा। उसके बाद प्राधिकरण ने अपीली आयोग में जाने में काफी देरी कर दी जिस कारण से अपील को खारिज कर दिया। उच्चतम न्यायालय ने इस फैसले को बनाए रखा।

लगातार काम से नौकरी पक्की नहीं
एक दैनिक भत्ता मजदूर ने अगर किसी प्रतिष्ठान में 240 दिनों से अधिक काम किया है तो भी वह पुनर्नियुक्ति और पिछले भत्ते, दोनों का ही हकदार नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने सहायक अभियंता बनाम गीतम सिंह मामले में यह फैसला सुनाया है। यह मामला 1991 का है जब मजदूर ने केवल आठ महीने कंपनी में काम किया था। उसके बाद उसे काम से निकाल दिया गया। तब मजदूर ने श्रम अदालत का दरवाजा खटखटाया जिसने राजस्थान विकास निगम से कहा कि उसकी पुनर्नियुक्ति की जाए और उसके पिछले भत्ते का 25 फीसदी भी उसे दिया जाए। श्रम अदालत ने उसे काम से निकालने को औद्योगिक विवाद कानून की धारा 25 एफ का उल्लंघन बताया। श्रम अदालत ने कहा कि औद्योगिक कानून के उल्लंघन के कारण उस दिहाड़ी मजदूर को पुनर्नियुक्ति का अधिकार है। राजस्थान उच्च न्यायालय ने भी इस पर अपनी मुहर लगा दी। मगर उच्चतम न्यायालय ने इस फैसले को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि अगर किसी दिहाड़ी मजदूर को गलत तरीके से काम से निकाल दिया गया हो तो भी वह दूसरे फायदों के साथ खुद-ब-खुद पुनर्नियुक्ति के लिए अधिकृत नहीं होता। यह काफी दूसरी बातों पर भी निर्भर करता है जैसे कि नियुक्ति किस तरह से हुई थीं, रोजगार किस तरह का था और सेवाकाल कितना लंबा था आदि।

Keyword: Supreme court, insurance company, compensation,
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