बिजनेस स्टैंडर्ड - आंतरिक चुनौतियों पर पाकिस्तान का ध्यान
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आंतरिक चुनौतियों पर पाकिस्तान का ध्यान
अजय शुक्ला /  January 25, 2013

पिछले हफ्ते पाकिस्तान की यात्रा के दौरान मैंने जम्मू कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर दो भारतीय सैनिकों की हत्या और उनके शवों को क्षत विक्षत करने की घटना को लेकर भारतीयों और पाकिस्तानियों की प्रतिक्रियाओं में घोर अंतर को महसूस किया। पाकिस्तानी मीडिया ने भारतीय राष्ट्रवाद को तवज्जो नहीं दी बल्कि वह अपने यहां अन्ना हजारे के आंदोलन की तर्ज पर चल रहे ताहिर उल कादरी के सत्ता विरोधी प्रदर्शन के हर पल का ब्योरा देने में व्यस्त रहा।
यह भारत-पाकिस्तान के परिप्रेक्ष्य में बदलते हालात का एक संकेत है। दशकों तक भारत बाहरी खतरे के बारे में कहता रहा जबकि  पाकिस्तान बढ़ते भारतीय खतरे को लेकर शोर मचाता आया है। आज पाकिस्तान एक तरह की लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर बढ़ते हुए मुख्य रूप से बढ़ती आंतरिक चुनौतियों पर ध्यान दे रहा है जबकि भारत को सबसे अधिक खतरा सीमा पार आतंक से लगता है। ऐसा तब हो रहा है जब पाकिस्तान की ओर से उकसाई जा रही हिंसा में कमी आई है और भारतीय पुलिस व खुफिया अधिकारियों का ध्यान अब देश में पनपे असंतोष की ओर अधिक है।
पाकिस्तान का ताहिर उल कादरी के तथाकथित 'लॉन्ग मार्च' पर पूरा ध्यान होने से एक फायदा यह हुआ कि नियंत्रण रेखा पर दो भारतीय सैनिकों की बर्बर तरीके से की गई हत्या पर भारत की ओर से जो कड़ी प्रतिक्रिया आई उस पर पाकिस्तान में शायद ही किसी का ध्यान गया और पाकिस्तान को यह मौका मिल गया कि वह इस मामले में एक औपचारिक सा बयान देकर मामले को रफा दफा कर दे। इस तरह पाकिस्तान की ओर से कोई तीखी प्रतिक्रिया हासिल नहीं हुई। आमतौर पर दोनों देशों के बीच ईंट का जवाब पत्थर से देने जैसी बयानबाजी होती है जो इस बार देखने को नहीं मिली और एक तरह से पाकिस्तान के बिखरे भारत विरोधी खेमे को एक होने का मौका हाथ नहीं लग पाया। मगर यह महज एक संयोग था, सोची समझी गतिविधि नहीं। भारत हमेशा से यह मानता रहा है कि पाकिस्तान जघन्य घटनाओं पर बड़े बेतरतीब तरीके से टिप्पणी करता है, मगर उसे यह समझने की जरूरत है कि पाकिस्तान में बड़ी तेजी से हालात बदल रहे हैं। पाकिस्तान में सबसे बड़ा बदलाव वहां के सबसे शक्तिशाली संगठन सेना और पाकिस्तान के पांच प्रमुख संस्थानों सेना, राजतंत्र, न्यायपालिका, नागरिक समाज और मीडिया के बीच बदलते संबंध से जुड़ा है।
पाकिस्तानी सेना के लिए भारत से खतरा एक ढोल की तरह है जिसे वह जब चाहे तब बड़ी आसानी से पीट सकती है, खासतौर पर तब जबकि भारत युद्घोन्मादी बयान जारी करता है, रावलपिंडी में जनरल मुख्यालय का खासा ध्यान पश्चिमोत्तर सीमा के जनजातीय इलाकों की ओर है जिन्हें अब खैबर पख्तूनखवा प्रांत कहा जाता है। जैसा कि पाकिस्तानी जनरल मानते हैं कि उनकी रणनीति- जिसमें एक ओर तो सत्ता विरोधी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान से लडऩा है वहीं दूसरी ओर अफगानिस्तान पर जोर देने वाले हक्कानी नेटवर्क को समर्थन देना है- जिहादियों से करीबी संबंध होने के कारण अब नहीं चलने वाली है। जनजातीय इलाकों में तंजीम की नजदीकी अब लश्कर-ए-जांगवी और लश्कर-ए-तैयबा के साथ है जिनकी मौजूदगी पंजाब में है। जनजातीय इलाके तो पहले से ही सुलग रहे हैं और ऐसे में जनरलों की चिंता है कि अफगानिस्तान में तालिबान की सफलता न चाहते हुए भी पाकिस्तान को ही नुकसान पहुंचाएगी, पहले जनजातीय इलाकों को फिर वहां से केंद्रीय इलाकों को।
पाकिस्तान की सेना पर करीब से नजर रखने वाले हसन असकरी रिजवी कहते हैं, 'सेना को डर है कि अफगानी तालिबान की सफलता पाकिस्तानी तालिबान को बढ़ावा देगी। पंजाब में कट्टïरपंथी समूहों से उनके संबंधों की वजह से पाकिस्तान में आतंकवाद, उग्र सुधारवाद और कट्टïरवाद को बढ़ावा मिलेगा। तालिबान की सफलता देवबंदी और वहाबी मदरसों में भी नई जान फूंक सकती है जो आज की तारीख में सक्रियता से तालिबान का समर्थन नहीं करते हैं जैसा कि वे 1990 के दशक में किया करते थे। सेना का मानना है कि इस तरह पाकिस्तान में आंतरिक सुरक्षा के हालात काबू से बाहर हो सकते हैं।'
यह डर अफगानिस्तान पर भारत और पाकिस्तान के बीच एक महत्त्वपूर्ण चर्चा का अवसर पैदा करता है। दोनों ही देश मानते हैं कि अफगानिस्तान से किसी को फायदा नहीं होने वाला है मगर अफगानिस्तान को लेकर यह निराशापूर्ण नजरिया कुछ राजनीतिक पहल के जरिये दूर किया जा सकता है। इस तरह दोनों पक्षों की चिंताएं दूर की जा सकती हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच एक समझौता अफगानिस्तान में स्थिरता ला सकता है जो दोनों देशों के लिए फायदेमंद हो।
पाकिस्तानी सेना से सेवानिवृत्त होने प्रमुख जनरल कहते हैं कि वे इस तरह की किसी वार्ता के पक्ष में हैं। जब उनसे पूछा गया कि आखिर क्यों जनरल मुख्यालय ने अपने बदले हुए रवैये का संकेत नहीं दिया तो इन अधिकारियों ने कहा कि भारत के प्रति पाकिस्तानी सेना का बदलता रवैया कभी सार्वजनिक बयानों से नजर नहीं आएगा। इसलिए भारत को कभी इसका इंतजार नहीं करना चाहिए। इसके बजाय भारत को सार्वजनिक मंचों पर पाकिस्तान की प्रतिक्रियाओं पर नजर रखनी चाहिए जिन्हें आमतौर पर रावलपिंडी से हरी झंडी मिली हुई होती है।
मौजूदा समय में पाकिस्तानी सेना ने कम आक्रामक रवैया अपना रखा है, मगर इसका मतलब यह नहीं है कि अब वह देश का सबसे शक्तिशाली संस्थान नहीं रह गया है। उसका राजनीतिक दबदबा कायम है, मगर उसकी हरकतें संयमित हो गई हैं और इसकी वजह संतुलित बलों का उदय है। इनमें पहले से अधिक सक्रिय न्यायपालिका और एक मीडिया का उदय है जिसने पहले अधिकारों से वंचित नागरिक समाज को आवाज दी है। इन वैकल्पिक शक्ति केंद्रों की वजह से ही सेना के लिए अकेले अपने बूते पर पाकिस्तान का प्रबंधन मुश्किल हो गया है।
साथ ही पाकिस्तानी सेना को सत्ता से दूर रखने का एक मतलब यह भी समझ में आता है कि पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था संकट में है। जनरल मुख्यालय को आर्थिक विशेषज्ञता हासिल है। न केवल इसलिए कि वह अपने इतने बड़े कारोबारी साम्राज्य का प्रबंधन करता है बल्कि इसलिए भी क्योंकि जनरल पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय विचारधारा का अध्ययन करते हैं और समय-समय पर विदेशी विशेषज्ञों से चर्चा करते रहते हैं। फिलहाल आर्थिक संकट का दोष नेताओं पर डाला जा सकता है पर अगर सेना सत्ता में आती है तो ऐसा नहीं किया जा सकता।
जब ताहिर-उल-कादरी ने अपने 50,000 समर्थकों के साथ इस्लामाबाद के एक चौक पर कब्जा जमाया तो जनरल देखते रहे। तहरीक मिनहाज उल कुरान के प्रमुख ने राजधानी को पूरी तरह ठप करने की उम्मीद पाल रखी थी ताकि मजबूरी में सेना को हस्तक्षेप करना पड़े। मगर उनकी यह उम्मीद धरी की धरी रह गई जब राजनीतिक नेताओं ने हाथ मिला लिये और उन्हें मजबूरन उस समझौते पर हस्ताक्षर करने पड़े जो एक हफ्ते पहले उन्हें सौंपा गया था। यह लोकतंत्र की जीत थी, हालांकि जिन राजनीतिक नेताओं ने समझौता किया उनकी प्रतिष्ठा खुद ही दागदार थी। अगर ऐसा कभी पहले हुआ होता तो इनमें से कई पाकिस्तानी सेना से हस्तक्षेप की उम्मीद करते। दिलचस्प है कि जब पाकिस्तानी सेना की सार्वजनिक पटल पर उतनी मौजूदगी नहीं दिखाई दे रही है, वहीं भारत ने भले ही शुरुआत में नियंत्रण रेखा पर हुई घटना को हल्के में लिया था मगर बाद में अपनी सेना से संकेत लेकर पाकिस्तान की कड़ी आलोचना की। मगर भारतीय सेना को यह याद रखने की जरूरत है कि लंबी अवधि की रणनीति तैयार करने, हथियारों के आधुनिकीकरण और सैन्य कल्याण जैसे मामलों में उसे कोई खास तवज्जो नहीं दी जाती।

Keyword: Pakaistan, jammu and kashmir, Soldier,
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