बिजनेस स्टैंडर्ड - रोजगार में भी हो वृद्घि तभी आएगी वास्तविक समृद्घि
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, August 16, 2022 09:06 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

रोजगार में भी हो वृद्घि तभी आएगी वास्तविक समृद्घि
अभीक बरुआ /  January 03, 2013

वित्तीय बाजार से जुड़े अर्थशास्त्रियों के हमारे छोटे से समुदाय में इस बात को लेकर कुछ आशावाद पनपता नजर आ रहा है कि शायद विकास को जितना नीचे जाना था वह जा चुका और अब यहां से केवल सुधार की संभावना है। अगले वित्त वर्ष यानी 2013-14 में विकास दर के बेहतर आंकड़े देखने को मिल सकते हैं। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष की विकास दर का माध्य अनुमान 5.5 फीसदी है। इस आशावाद के लिए कई वजहें जिम्मेदार हैं- सरकार नीतियों में सुधार दिख रहा है जिससे कारोबारी रुझान ओर सार्वजनिक क्षेत्र की परियोजनाओं में भी सुधार नजर आ रहा है, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा महंगाई दर में कमी आने के बाद ब्याज दरों में कटौती की संभावना है, बाहरी वातावरण में भी सुधार हो रहा है आदि। मेरा भी काफी हद तक यही मानना है। बहरहाल, कारोबारी चक्र में कितनी जल्दी सुधार हो सकता है और विकास की दर में कितनी बढ़ोतरी हो सकती है, इस चर्चा में जाने से पहले मैं देश में रोजगार के परिदृश्य पर एक नजर डालना चाहता हूं।
यह हकीकत अब सामने आ चुकी है कि जहां आर्थिक उदारीकरण ने विकास दर में बढ़ोतरी को बल दिया वहीं यह बेरोजगारी में कोई खास कमी लाने में कामयाब नहीं हो सकी। टी एस पापोला और पार्थ प्रतिम साहू द्वारा भारतीय समाज विज्ञान शोध परिषद के लिए तैयार किए गए एक पत्र के आंकड़ों के मुताबिक 1970 के दशक में देश के औसत वार्षिक रोजगार वृद्घि 2.4 फीसदी थी जबकि वर्ष 1993-94 से 2009-10 के दरमियान यह दर घटकर 1.65 फीसदी हो गई।
बल्कि उदारीकरण के इन आंकड़ों में तो कुछ सुधार इसलिए नजर आ रहा है क्योंकि वर्ष 1999-2000 और 2004-05 के दौरान रोजगार की विकास दर बढ़कर 2.8 फीसदी तक जा पहुंची थी। वर्ष 2004-05 से 2009-10 तक जबकि जीडीपी विकास दर ऐतिहासिक रूप से उच्चतम स्तर पर रही, उस अवधि में रोजगार वृद्घि दर शून्य के करीब पहुंच गई थी। कुछ लोग इस बारे में यह दलील देते हैं कि उस अवधि में उच्च शिक्षा में अधिक लोग गए और इस चलते देश की श्रम शक्ति में कमी आई और यह एक सकारात्मक लक्षण था। बात यहीं खत्म नहीं होती है। संगठित क्षेत्र में भी रोजगार वृद्घि का रुझान कमोबेश इसी तरह का रहा। इस क्षेत्र के बारे में कहा जा सकता है कि उदारीकरण के बाद वहां रोजगार में वृद्घि का प्रतिशत शून्य के करीब ही रहा।
अगले दो दशकों के दौरान रोजगार की वांछित दर तकरीबन 3 फीसदी है। अगर ऐसा होगा तभी उन सब लोगों को रोजगार मिल सकेगा जो आने वाले वर्षों के दौरान देश की श्रम शक्ति से जुडऩे जा रहे हैं। इसके अलावा उन लोगों को भी जो रोजगार की तलाश में हैं। यह उदारीकरण के दौरान देश की रोजगार वृद्घि दर के तकरीबन दो गुना के बराबर है।
हमें इस वक्त रोजगार क्षमता में वृद्घि पर ध्यान क्यों केंद्रित करना चाहिए इसकी कई वजहें हैं? एक बात तो यह है कि यही वह समय है जब हमें जननांकीय स्थितियों का लाभ मिलेगा और काम करने वालों पर निर्भर लोगों के निर्भरता अनुपात में कमी आएगी। नीति निर्माताओं पर यह दबाव रहेगा कि वे लगातार बढ़ रही युवा आबादी के लिए रोजगार का सृजन करें।
ऐसे में दो विकल्प ही उपलब्ध हैं। या तो हम कोई ऐसी राह निकालें जिसमें कि विकास कुछ इस तरह का हो कि रोजगार को जोरदार बढ़ावा दें। अगर ऐसा होगा तो न केवल खपत को बढ़ावा मिलेगा बल्कि विकास और मांग में भी स्वाभाविक तौर पर तेजी आएगी। अगर ऐसा नहीं होता है तो हम महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी जैसी योजनाओं पर ही आश्रित बने रहेंगे जबकि हमें इसके प्रतिकूल असर और अर्थव्यवस्था को इसकी वजह से पहुचंने वाले नुकसान से भी दो चार होना पड़ेगा। गौरतलब है कि इसकी वजह से व्याप्त असंतुलन ही देश में महंगाई जैसी विभिन्न समस्याओं का सबब बन रहा है।
क्या बेरोजगारी संबंधी ऊपर दिए गए आंकड़े हमें इस बारे में कोई संकेत देते हैं कि दरअसल रोजगार के मामले में हमें आगे चलकर कौन सी नीति अपनानी चाहिए? देश में सेवा क्षेत्र का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा है। इसमें भी वित्तीय सेवाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। उदारीकरण के बाद के दो दशकों में देखा जाए तो सभी सेवा क्षेत्रों में रोजगार वृद्घि की दर औसतन 3 फीसदी के करीब रही। बहरहाल, इस तर्क के आधार पर सेवा क्षेत्र आधारित विकास की वकालत करते समय भी हमें निश्चित तौर पर सावधानी बरतनी होगी।
वर्ष 2009-10 में वित्तीय सेवाओं का मूल्य संवर्धन 16 फीसदी था जबकि कुल रोजगार में इनकी हिस्सेदारी महज 2.2 फीसदी थी। वर्ष 2008-09 में सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र ने कुल मिलाकर 17.6 लाख लोगों को रोजगार दिया बेहतर से बेहतर स्थिति में अब वह 25 लाख लोगों को रोजगार दे सकता है। मामला चाहे जो भी हो इन क्षेत्रों में रोजगार हासिल करने के लिए शिक्षा और कुशलता का स्तर बहुत बेहतर होना चाहिए और यह फार्मूला बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार दिलाने में कामयाब नहीं हो पाएगा। दूसरा क्षेत्र जो बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार मुहैया करा सकता है वह है कारोबार और परिवहन क्षेत्र। इस क्षेत्र में भी रोजगार और उसकी वृद्घि दर बेहतर रही है। पिछले दो दशक के दौरान विनिर्माण का काम भी अच्छा रहा है लेकिन इसमें मनरेगा जैसी योजना की भूमिका प्रमुख रही है। बुनियादी ढांचा क्षेत्र की गतिविधियों में इजाफा भी इसमें मदद करेगा।
मेरा यह तात्पर्य कतई नहीं है कि हम रोजगार संबंधी आंकड़ों में उलझकर रह जाएं बल्कि में इस हकीकत पर रोशनी डालना चाहता हूं कि बगैर आर्थिक ढांचे में बदलाव लाए हम यह गारंटी नहीं दे सकते कि आर्थिक विकास हर स्थिति में अपने साथ रोजगार भी पैदा करेगा। समावेशी विकास का तात्पर्य केवल नकदी हस्तांतरण अथवा अनुत्पादक कार्यों के लिए रोजगार गारंटी योजना से नहीं है। इसके बजाय उसका मतलब यह सुनिश्चित करना भी है कि विकास की प्रक्रिया में अधिक से अधिक श्रमिक उत्पादक कार्यों में लग जाएं।
शुरुआती तौर पर हमें इस सवाल से रूबरू होना होगा कि क्या भारत तेजी से श्रम आधारित विनिर्माण क्षेत्र से निकलकर सेवा क्षेत्र आधारित विकास की तरफ कदम बढ़ा सकता है। अगर इस सवाल का जवाब यह है कि हम ऐसा नहीं कर सकते और हमें विनिर्माण क्षेत्र पर निर्भर रहना ही होगा तो ऐसे में जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी में तेज गति से इजाफा करना होगा। इसके अलावा संगठित क्षेत्र को भी इस क्षेत्र में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी होगी। नीतिगत मोर्चे पर इस समस्या से निपटने के लिए अभी काफी कुछ किए जाने की आवश्यकता है।

Keyword: Employment, Financial market, Reforms,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या महंगाई में कमी के मद्देनजर दर बढ़ोतरी थाम सकता है आरबीआई
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.