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सरकारी महकमे आखिर क्यों करते हैं आपस में मुकदमे?
अदालती आईना / एम जे एंटनी December 30, 2012

सरकार की विभिन्न शाखाओं के बीच आपसी मुकदमेबाजी कम करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का एक दशक पुराना प्रयोग विफल हो गया है और महकमों के बीच की लड़ाई पहले से कहीं ज्यादा दम-खम के साथ शुरू हो गई है। हालत यह है कि 60 फीसदी से ज्यादा मुकदमे केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों, उनके सार्वजनिक उपक्रमों और स्थानीय अधिकारियों के बीच लड़े जा रहे हैं। यह भी कम स्पष्टï नहीं है कि इनमें से ज्यादातर मुकदमे एक-दूसरे के खिलाफ लड़े जा रहे हैं और इन सब पर जनता का पैसा बरबाद किया जा रहा है।
हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय में एक अनूठा मुकदमा आया जो दुर्बल प्रकृति की इस आपसी लड़ाई का एक बढिय़ा मिसाल है। इस मुकदमे के केंद्र में एक प्रवासी भारतीय (एनआरआई) की जेवरात फर्म की तरफ से छोड़ा गया सोना है, जिसके लिए सीमा शुल्क विभाग, एमएमटीसी और इंडियन बैंक आपस में भिड़े हुए हैं। इस फर्म के प्रवर्तक नियमों को तोडऩे और बैंक को धोखा देने के बाद गायब हो गए थे। अब कानूनी लड़ाई इस बात को लेकर हो रही है कि फर्म के सोने पर किस सरकारी संस्था का पहला दावा होगा।
इससे पहले कि अदालत यह मसला सुलझाती, उसने कुछ कठोर टिप्पणियां कीं। फैसले में कहा गया, 'इस मुकदमे के तमाम संबंधित पक्ष सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं, बावजूद इसके वे यह मसला खुद सुलझाने में विफल रहे, इस पर हम अपनी पीड़ा जाहिर करना चाहते हैं। हमने संबंधित पक्षों के वकील से जानना चाहा कि वित्त मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय के सचिवों को आपस में मिल-बैठकर यह मसला क्यों नहीं सुलझाना चाहिए।' पिछले साल दिसंबर में संबंधित पक्षों ने हमारी सलाह पर अमल के लिए बार-बार मोहलत मांगी। न्यायाधीशों के मुताबिक विवाद सरल था। उनका कहना था, 'हमने पाया कि मसला केवल यह है कि आखिर सरकार की किस संस्था को सोना मिलना चाहिए और इस तरह के मामलों में अदालती वक्त जाया नहीं होना चाहिए।'
बावजूद इसके अदालत को इस महीने बताया गया कि तीन सचिवों की समिति मसले का हल निकालने में विफल रही। इस पर टिप्पणी करते हुए न्यायाधीशों ने कहा, 'हम इस निष्कर्ष से निराश हैं क्योंकि हमें लगता है कि इस मसले का व्यावहारिक तरीके से हल निकालने के लिए आला दर्जे की नौकरशाही के अधिकारियों को परिपक्वता और अनिवार्य निर्णय क्षमता का परिचय देना चाहिए था, ताकि गैर-जरूरी खर्च से बचा जा सके और अदालत का वक्त बरबाद न होने पाए। इस मामले में इस हकीकत पर गौर करना चाहिए था कि विवादित संपत्ति अंतत: किसी न किसी सरकारी संस्था के पास ही जानी है। हमें लगता है कि इस मामले में वरिष्ठï अधिकारियों ने लापरवाही की, जिससे अनिर्णय और गतिरोध की स्थिति बनी, जो अच्छे और कुशल प्रशासन के लिए शाप है। संबंधित फाइलों में दर्ज है कि निर्णय अच्छे कारणों से पूरे होशहवास में और ईमानदारी से लिए गए। लेकिन ऐसा करते समय अधिकारियों किसी तरह की असुरक्षा की चिंता बिलकुल नहीं होनी चाहिए। उन्हें नहीं लगना चाहिए कि कोई फैसला करने से उन पर पक्षपात और भ्रष्टाचार जैसे आरोप लगेंगे। हम उम्मीद करते हैं कि नीति निर्माताओं को निर्णय लेने में हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए, यहां तक कि कठिन फैसला करने में भी, ताकि सरकारी मशीनरी को ठहराव वाली स्थिति में आने से बचाया जा सके।' अपीलीय अदालतों में यह पुरानी समस्या है। इस पर गौर करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से कहा है कि विवादों को अदालत में आने से पहले ही सुलझाने का एक प्रभावी तंत्र स्थापित किया जाए। वर्ष 1992 में ओएनजीसी बनाम उत्पाद शुल्क कलेक्टर मुकदमे के फैसले में शीर्ष अदालत ने सरकार से कहा था कि विवादों को अदालत पहुंचने से पहले उनकी जांच के लिए एक उच्च अधिकार प्राप्त समिति का गठन किया जाए। इसके बाद अंतर्विभागीय समिति बनाई गई, लेकिन जाहिर है, उसकी बैठकों में केवल समय की बरबादी ही हुई। बाद के कुछ फैसलों में अदालत ने बार-बार अपनी हताशा दोहराई, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।
पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय के एक संवैधानिक पीठ ने ओएनजीसी मामले में अपने आदेश को याद करते हुए स्वीकार किया कि उसकी सलाह पर अमल नहीं किया गया। इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया बनाम भारत सरकार के फैसले में न्यायालय ने कर संबंधी मुकदमों के दो उदाहरण दिए। एक में संबंधित समिति ने अपील दायर करने की अनुमति दे दी, लेकिन समान सवाल वाले एक अन्य मामले में अपील की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया। इससे भेदभाव का आरोप तो लगता है ही है, साथ-साथ ज्यादा मुकदमेबाजी और विवाद सुलझने में देरी भी होती है। महान्यायवादी ने अदालत से यह भी कहा कि बदले हुए परिदृश्य में इस तंत्र की उपयोगिता खत्म हो गई है।
न्यायालय का कहना था कि शुरुआती में इसे उच्च अधिकार प्राप्त समिति बनाने का विचार था, जिसे बाद में सचिव समिति का रूप लेना था और अंतत: इससे विवाद समिति (सीओडी) बनाया जाना था, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बेकार के मुकदमेबाजी में सरकारी संसाधनों का फिजूल इस्तेमाल न होने पाए। फैसले में कहा गया, 'सैद्घांतिक तौर पर आदेश की मंशा नेक है, जिसकी प्रशंसा की जानी चाहिए, लेकिन अनुभव बताता है कि सीओडी की तमाम कोशिशों के बावजूद यह तंत्र वह नतीजा नहीं दे पाया, जिसके लिए इसका गठन किया गया था। इसके उलट इसकी वजह से मुकदमा निपटने में देरी हुई।'
फैसले के बाद की घटनाओं को एमएमटीसी गोल्ड मामले में उच्च न्यायालय के फैसले में अच्छे और बुरे, दोनों नजरिये से देखा गया। दरअसल समितियां गठित करना सरकारों का पुराना तरीका है। इसके जरिये गंभीर और ज्वलनशील मुद्दों को टाला जाता है, उनका हल निकालने की मंशा होती ही नहीं। लेकिन लगता है कि न्यायाधीशों को यह बात समझने में थोड़ी देर हो गई।

Keyword: Court, judiciary Supreme Court,
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