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गठबंधन के प्रति बदलता रवैया देता क्षेत्रीय ताकतों को मान्यता
दिल्ली डायरी / ए के भट्टाचार्य December 26, 2012

अब से साल पहले कांग्रेस की एक अनौपचारिक बैठक में देश की  सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के एक लोकप्रिय नेता ने कहा था कि पार्टी अब भी उस मानसिकता में रम नहीं पाई है जो गठबंधन सरकार चलाने के लिए जरूरी है। इस बयान की काफी चर्चा हुई थी। शायद यही वजह है कि कांग्रेस ने केंद्र में सरकार बनाने के लिए छोटी क्षेत्रीय पार्टियों को रिझाने और उनका समर्थन हासिल करने की योजना खारिज कर दी। यह 2004 से पहले की बात है। बाद में हालात बदले और कांग्रेस नेतृत्व ने फैसला किया कि वह केंद्र में गठबंधन सरकार के गठन की गंभीरता से कोशिश करेगा।
यह गंभीर प्रयास पार्टी के विचारकों की परंपरागत सोच से अलग था और इसने पिछले सालों के दौरान मिश्रित परिणाम दिए हैं। यह नया प्रयोग कितना सफल रहा है इसका आकलन करना जरूरी है। कांग्रेस का गठबंधन (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन या संप्रग) सरकार चलाने का प्रयोग पहले पांच साल बढिय़ा रहा। साझा न्यूनतम कार्यक्रम की वजह से राह काफी आसान रही।
वर्ष 2004 से 2009 के बीच पहली पारी में संप्रग सरकार को अगर कभी गठबंधन सरकार चलाने में दिक्कत आई तो उसकी मुख्य वजह थी कांग्रेस नेतृत्व की साझा न्यूनतम कार्यक्रम में रेखांकित नीतियों और सिद्घांतों से दूरी बनाने की कोशिश।  संप्रग-1 के सामने पहली बड़ी समस्या सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में सरकारी हिस्सेदारी को बेचना रही। वामपंथी पार्टियों ने साझा न्यूनतम कार्यक्रम के विशेष प्रावधान का हवाला देते हुए इसका विरोध किया। हालांकि इसकी व्याख्या एक दूसरे तरीके से भी की जा सकती है जैसा कि कांग्रेस नेतृत्व ने वामपंथी पार्टियों के साथ अपने विचार-विमर्श में किया।
 कांग्रेस ने गठबंधन सरकार के तथाकथित जज्बे को ध्यान में रखकर एक चतुराई भरा समझौता किया। वाम दल तब सरकार का हिस्सा नहीं थे और उन्होंने सरकार को बाहर से समर्थन दे रखा था और कांग्रेस ने उस समझौते को सम्मान देने के लिए अपनी ओर से हरसंभव प्रयास किया। जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भारत-अमेरिकी नागरिक परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर के लिए उत्साहित थे तो दूसरी बार वामपंथी पार्टियों ने अपना विरोध जताया पर तब तक कांग्रेस का रवैया थोड़ा बदल चुका था। कांग्रेस ने वाम दलों को दरकिनार करते हुए दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों के साथ इस करार को लेकर समझौता कर लिया। इस दफा कांग्रेस ने वाम दलों की चाल को पहले से ही भांपते हुए राजनीतिक गुना भाग कर लिया था और उसे भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते पर कदम आगे बढ़ाए। संप्रग सरकार ने 2009 में अपनी दूसरी पारी शुरू की और तब कांग्रेस के पास कोई साझा न्यूनतम कार्यक्रम नहीं था जिसका फायदा पार्टी उठा पाती। तब वामपंथी पार्टियां भी नहीं थीं जो बाहर से समर्थन दे सकें। उस वक्त कांग्रेस को लोकसभा में भारी सीटें मिली थीं और उसे बाहर से ही सही मगर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) जैसी क्षेत्रीय पार्टियों का समर्थन भी मिला था।
हालांकि प्रशासन बुरी तरह प्रभावित हुआ- न केवल सरकार और उसके मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से पैदा हुई नीतिगत जड़ता के कारण, मगर इसलिए भी कि गठबंधन के एक प्रमुख सहयोगी दल तृणमूल कांग्रेस में अपनी मौजूदगी दर्शाने की कोशिश की। 2011 की सर्दियों में उसने सरकार पर बहु ब्रांड खुदरा में 51 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश या एफडीआई को मंजूरी देने के अपने फैसले को वापस लेने का दबाव बनाया। साथ ही पेंशन और बीमा क्षेत्रों में एफडीआई का विरोध करने की धमकी भी दे दी।
संप्रग-2 में गतिरोध इसी तरह बरकरार रहा जब तक उसने गठबंधन दल तृणमूल कांग्रेस को छोडऩे और अपनी नीतियों को हरी झंडी दिलाने के लिए बसपा और सपा जैसे दलों का समर्थन हासिल नहीं कर लिया। बीते कुछ हफ्तों में जो घटनाएं घटी हैं उनसे पता चलता है कि कांग्रेस नेतृत्व ने गठबंधन सरकार को चलाने की अपनी नीतियों में बदलाव कर लिया है।
2008 में जो हुआ और खुदरा एफडीआई विवाद उभरने के दौरान जो कुछ हुआ उसके बीच के अंतर पर गौर फरमाइये। साल 2008 में जब कांग्रेस ने भारत-अमेरिकी नागरिक परमाणु समझौते के लिए वाम दलों से समर्थन हासिल करने की कोशिश की तो उसका प्रयास आधे अधूरे मन से किया गया नजर आ रहा था और पर्यवेक्षकों को अक्सर हैरानी होती थी कि क्या कांग्रेस पार्टी और मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार इस मसले पर एक दूसरे से पूरी तरह सहमत है। इस समझौते को लेकर यह केवल मनमोहन सिंह की मंशा का नतीजा था कि कांग्रेस के पास सरकार को बचाने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों के साथ राजनीतिक समझ बनाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था।
साल 2012 में कांग्रेस और मनमोहन सिंह की सरकार के बीच ऐसा कोई मतभेद नजर नहीं आ रहा था। खुदरा में एफडीआई को पार्टी के हर वर्ग से सहमति दिखी और जिन लोगों को इन पर एतराज था, उन्होंने सार्वजनिक रूप से कभी इसे नहीं दर्शाया। नए संसदीय कार्य मंत्री कमल नाथ ने बसपा और सपा के साथ समझौता कर सरकार की सभी मुश्किलें दूर कर दीं और सरकार ने अपेक्षाकृत बड़ी आसानी से संसद में एफडीआई पर जंग जीत ली। यह साफ है कि कांग्रेस अब गठबंधन को साथ लेकर चलने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है।
जो पार्टी केंद्र में गठबंधन सरकार की सबसे अविश्वसनीय समर्थक मानी जाती थी (वह कम से कम दो गठबंधन सरकारों को बाहर से समर्थन देने के बाद पीछे हट जाने के लिए जिम्मेदार है), उसके लिए यह एक बड़ा बदलाव है। कांग्रेस अब चाहती है कि उसे एक ऐसी पार्टी के तौर पर देखा जाए जो अपनी गठबंधन सरकार को सुरक्षित और संरक्षित रखने के लिए काम करना चाहती है। 2012 के आर्थिक संकट ने कांग्रेस को मनमोहन सिंह सरकार के सुधारों के एजेंडों के करीब लाने के लिए बाध्य किया होगा ताकि ऊंचा विकास हासिल करने के लिए अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकी जा सके। अगर अर्थव्यवस्था की हालत सुधरती है तो सरकार के पास गरीबों के सशक्तिकरण के लिए चुनावी तौर पर लोकप्रिय कार्यक्रमों की फंडिंग के लिए संसाधन उपलब्ध होंगे। मगर गठबंधन की राजनीति में कांग्रेस का बदलता रवैया बढ़ती क्षेत्रीय शक्तियों का भी संकेत है।

Keyword: Regional Political parties, alliance, Government,
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