बिजनेस स?टैंडर?ड - सार्वजनिक परिवहन के सुधार में अड़चन
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Wednesday, December 07, 2022 06:20 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

सार्वजनिक परिवहन के सुधार में अड़चन
सुनीता नारायण /  12 24, 2012

शराब कारोबारी पॉन्टी चड्ढा और उनका भाई पिछले दिनों गोलीबारी में मारे गए। उनका एक और कारोबार था जिसके बारे में बहुत अधिक सार्वजनिक जानकारी नहीं थी। उनके पास दिल्ली में सार्वजनिक परिहवन के लिए बसें चलाने की अनुमति थी। कुल तीन क्लस्टरों में उनके पास तकरीबन 600 बसों का बेड़ा था।
लेकिन उनकी मौत के पहले ही सार्वजनिक परिवहन की बसों के परिचालन का यह धंधा महंगा पडऩे लगा था। चूंकि निजी-सार्वजनिक भागीदारी (पीपीपी) देश का पसंदीदा शगल बन गया है इसलिए यह सवाल उठाना महत्त्वपूर्ण है कि क्या हम वाकई यह समझ पा रहे हैं कि देश के अपेक्षाकृत गरीब और मध्य वर्ग के लोगों के लिए एक स्थायी सार्वजनिक बुनियादी ढांचा किस तरह उपलब्ध कराया जा सके? दूसरे शब्दों में कहें तो सवाल यह उठता है कि हमें निजी उद्यमियों के साथ मिलकर कैसे काम करना चाहिए ताकि लागत को व्यावहारिक बनाए रखा जा सके। यह काम सरकारी सब्सिडी के जरिये हो अथवा नई तरह के वित्तीय प्रबंधन के जरिये?
हम सभी जानते हैं दिल्ली शहर और देश के अन्य नगरों के सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था में तत्काल सुधार की आवश्यकता है। अगर सुविधानजक और व्यावहारिक परिवहन व्यवस्था का विकास नहीं किया गया तो निजी वाहनों की बढ़ती संख्या शहर की सड़कों को पूरी तरह अवरुद्घ कर देगी। इतना ही नहीं शहर की हवा में भी जहर की मात्रा लगातार बढ़ती जाएगी। ऐसे में सवाल यह है: इस व्यवस्था का आकार और उसका सांगठनिक स्वरूप क्या होगा?
देश के अधिकांश इलाकों में शहरी बस परिवहन पर मोटे तौर पर सरकार का नियंत्रण है। फिर चाहे हम मुंबई की बात करें या फिर बेंगलूर, कोलकाता, हैदराबाद अथवा दिल्ली की, इन सभी जगहों पर प्रमुख परिवहन सेवाओं पर नगर निकायों का नियंत्रण है। इनमें से कुछ का प्रदर्शन दूसरों से बेहतर भी है लेकिन कुलमिलाकर देखा जाए तो इनकी हालत खस्ता नजर आती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इनकी परिचालन लागत काफी बढ़ चुकी है जबकि टिकटों की कीमतें काफी कम बनी हुई हैं। बसों की टिकट कीमतों को दोपहिया वाहनों की प्रति किलोमीटर लागत से भी कम बनाए रखा गया है। भारत में यह यह लागत 1-2 रुपये प्रति किलोमीटर है। बस टिकट की कीमतों में केवल तभी इजाफा किया जा सकता है जबकि इनके विकल्पों पर पर्याप्त अंकुश हो। उदाहरण के लिए निजी वाहनों के लिए पार्किंग दर में भारी इजाफा और अनधिकृत पार्किंग आदि पर भारी जुर्माना लगाने से लोग सार्वजनिक परिवहन की ओर रुख कर सकते हैं।
चूंकि शहरों के पास पहले से चल रही बसों की परिचालन लागत की भरपाई करने के लिए ही धन नहीं है इसलिए वे नई बसों अथवा आधुनिक बुनियादी ढांचे में निवेश नहीं करते हैं। इसके परिणामस्वरूप बसों में भीड़ बहुत अधिक बढ़ जाती है और बस सेवाएं खराब होने के साथ-साथ अविश्वसनीय होने लगती हैं। दिल्ली में सरकारी बस सेवा की इकलौती प्रतिस्पर्धी कुख्यात ब्लूलाइन बस सेवा है। इस बस सेवा को इसके प्रदर्शन के चलते 'हत्यारी बस सेवा' कहा जाता है। इनका न बजट अच्छा है और न ही इनकी सेवा बेहतर है। लोग इनको सुविधा के लिए नहीं इस्तेमाल करते बल्कि वे मजबूरी में इनका प्रयोग करते हैं। लेकिन एक मालिक होने तथा सीमित लागत खर्च के चलते ये बस सेवाएं आर्थिक रूप से व्यवहार्य होती हैं। दिल्ली में पिछले दिनों जो हौलनाक बलात्कार हुआ वह ऐसी ही सेवा में चलने वाली बस थी। इस तरह यह खराब पीपीपी मॉडल पनप रहा है।
दूसरा विकल्प है असंगठित निजी बस उद्योग को एक कॉर्पोरट मॉडल में तब्दील कर देना जहां हर बस मालिक को एक खास मार्ग पर बसों का परिचालन करने तथा उसकी स्थिति दुरुस्त रखने को कहा जाए तथा इसके बदले वे सरकार को एक निश्चित धन राशि का भुगतान करें। दिल्ली में कुछ साल पहले यह तरीका अपनाया गया था। इसके तहत दिल्ली शहर को क्लस्टरों में बांटा गया था और फैसला किया गया था कि हर इलाके में केवल दो ही बस ऑपरेटरों की बसें चलेंगी। इनमें से एक दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन तो दूसरा निजी परिचालक होगा। माना गया कि इससे प्रतिस्पर्धा का माहौल तैयार होगा और सेवा को नये सिरे से आंका जा सकेगा।
संगठित बस सेवाओं को बस की लागत का भुगतान करना होगा। दिल्ली में यात्रियों की सुविधा का ख्याल रखते हुए लो फ्लोर बसो में भारी निवेश किया गया। एक ऐसी आलीशान बस की औसत मासिक किस्त 24 रुपये प्रति किलोमीटर जबकि सामान्य बस की 12 रुपये प्रति किलोमीटर है। इसका आकलन इस अनुमान पर आधारित है कि एक बस एक दिन में 200 किलोमीटर की दूरी तय करती है। बस सेवाओं को ईंधन की लागत, कर्मचारियों, मरम्मत, बीमा और कर आदि का भुगतान करना होगा। बेंगलूर में इनका सबसे किफायती परिचालन होता है और यहां लागत 30 रुपये प्रति किलोमीटर पड़ती है, जबकि मुंबई में 60 रुपये प्रति किलोमीटर जबकि इसमें पूंजी की लागत शामिल नहीं है।
दिल्ली की बात की जाए तो यहां एक आधुनिक बस सेवा की खरीद और परिचालन लागत तकरीबन 50-60 रुपये प्रति किलोमीटर पड़ती है जिसमें से सरकार 10 रुपये प्रति किलोमीटर की गैप फाइनैंसिंग की जाती है। अगर टिकट बिक्री में सुधार के सर्वोत्तम प्रयास किए जाएं तो भी प्रति मिलोमीटर 37 रुपये तक का राजस्व अर्जित होगा। लब्बोलुआब यह है कि किसी भी तरीके से देखा जाए राजस्व मॉडल हमेशा घाटे वाला ही रहेगा। ऐसे बाजार में जहां सस्ते निजी परिवहन के साधन मौजूद हैं, वहां लागत हमेशा राजस्व से अधिक बनी रहेगी। ऐसे में इन सेवाओं को सरकारी सब्सिडी या किसी नई तरह की वित्तीय सहायता की आवश्यकता होगी।
पॉन्टी चड्ढा की कंपनी ने ऐसे ही मॉडल के लिए बोली लगाई थी। लेकिन परिचालन में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा था। हकीकत यह है कि निजी परिचालकों को कठिन सेवा परिस्थितियों को पूरा करने के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन उपलब्ध नहीं है। ऐसे में वे यहां वहां से राजस्व जुटाने की कोशिश करेंगे। इसके परिणामस्वरूप विवाद उत्पन्न होने की पूरी संभावना रहती है।  पॉन्टी चड्ढा की बसों की बात की जाए तो दिल्ली सरकार ने उसे समझौते का पालन नहीं करने के मामले में पहले ही जुर्माने का नोटिस थमा दिया है। अब सवाल यह है कि दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन का आगे क्या होगा? बेहतर होगा कि हम इसका जवाब खोज लें क्योंकि सार्वजनिक परिवहन का कोई विकल्प नहीं है। कारों की वजह से पहले ही हम काफी कुछ भुगत रहे हैं।

Keyword: Public Transport, Bus, Delhi,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या देश में व्यापक तौर पर अपनाया जाएगा डिजिटल रुपया
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.