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सुधार की संतानें
संपादकीय /  December 24, 2012

इस समय देश भर के शहरों और कस्बों में सुरक्षा और न्याय की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं। इसके मूल में मुख्य रूप से युवा पेशेवर और छात्र-छात्राएं हैं। उल्लेखनीय है कि इससे पहले हुए ऐसे आंदोलनों से इतर इस बार वे सरकार से कोई विशिष्ट तवज्जो नहीं मांग रहे हैं बल्कि वे सुरक्षित जीवन जीने का वह अधिकार मांग रहे हैं जिस पर उनका हक है। यह राज्य की मूल जिम्मेदारियों में से एक है। यह विरोध प्रदर्शन किसी एक राजनीतिक दल अथवा राज्य की किसी इकाई अथवा उसकी किसी गतिविधि के खिलाफ भी नहीं है। वे नरेंद्र मोदी के अहमदाबाद, शीला दीक्षित की नई दिल्ली, जे. जयललिता के चेन्नई और ओ. इबोबी सिंह के इम्फाल में एकदम स्वत:स्फूर्त ढंग से एकत्रित हुए। यह देश के आर्थिक सुधारों की संतानों वाली पहली पीढ़ी है। इसे उन सुधारों के तमाम लाभ हासिल हुए हैं। शिक्षा और पेशे को लेकर बेहतर अवसर, खुद के लिए उम्दा आकांक्षाएं पालने और आसपास की दुनिया से बेहर उम्मीदें पालने का मौका। नई दिल्ली के विजय चौक और इम्फाल में हुई हिंसा के बावजूद यह जरूरी नहीं है कि एक वर्ग पहले से ही ङ्क्षहसा फैलाने को उद्यत था। सन 1990 के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशों के मुताबिक सरकारी नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ भड़के गुस्से से इतर इस बार मांगें किसी खास समूह के लिए या उसके खिलाफ नहीं हैं। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से इतर इनका संबंध सरकारी लाभों से भी नहीं है। यह किन्हीं खास लोगों अथवा विधेयकों से भी ताल्लुक नहीं रखता। यह समूचा प्रदर्शन एक आधुनिक, प्रभावी और जिम्मेदार देश की मांग के साथ पनपा है। लेकिन देश के सुधारों के साथ त्रासदी यह रही है कि राज्य खुद में बदलाव लाने में कठिनाई महसूस करता रहा है। राजधानी नई दिल्ली की एक बस में एक छात्रा के साथ जो बर्बर कृत्य हुआ उस बारे में बोलने से पहले प्रधानमंत्री ने बहुत अधिक समय ले लिया। दिल्ली की मुख्यमंत्री ने आरोपों को और अधिक विस्तार दे दिया और पुलिस ने संसाधनों की कमी का दावा कर दिया। इस तरह यह बात टलती चली गई। उनके वक्तव्यों में चाहे जो भी सच्चाई हो लेकिन आर्थिक सुधारों के बाद वाली पीढ़ी ने ऐसी बहुत बातें सुनी हैं। यही वजह है कि उनके भीतर बहुत अधिक नाराजगी है और दृश्य श्रव्य माध्यमों तथा डिजिटल मीडिया ने भी इसमें इजाफा ही किया है। इसके अलावा विजय चौक और इम्फाल की घटनाओं ने सरकार की कम तैयारी को भी उजागर किया। जो प्रदर्शन मोटे तौर पर शांतिपूर्ण था उस पर शरारती तत्व काबिज हो गए। निश्चित तौर पर बल प्रयोग कभी सही नहीं होता। रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन भारत की यात्रा पर हैं और ऐसे में बल प्रयोग के पीछे जो वजह बताई गई हैं वे बहुत अधिक विश्वसनीय नहीं हैं। एक युवा महिला से बलात्कार के बाद उपजे इन विरोध प्रदर्शनों में देश की कानून व्यवस्था और प्रशासन को लेकर क्षोभ भी शामिल है। देश के नेतृत्त्व को इन तमाम समस्याओं से निहायत जिम्मेदारी से निपटना चाहिए और उसे अभिव्यक्ति की आजादी को भी रोकना नहीं चाहिए। सरकार अधिक संवेदनशील पुलिस व्यवस्था, बेहतर जांच,मामलों की तेज सुनवाई आदि के जरिये जरूरी कदम उठा सकती है। यह ध्यान देने योग्य है कि यह पीढ़ी भी सुधारों की प्रक्रिया की तरह ही अधूरी हैं। वर्ष 1991 के पहले की तर्ज पर लोग किसी भी समस्या के लिए पहले सरकार का रुख करते हैं जबकि वह मोटे तौर पर सामाजिक समस्या होती है। गुस्सा केवल बाहर नहीं निकाला जाना चाहिए बल्कि अपने भीतर भी झांकना चाहिए। इस समय लाठियों और आंसू गैस से अधिक जरूरत बाहरी और आंतरिक स्तर पर बदलाव के एजेंडे की है।

Keyword: Protest, agitation, Digital Media,
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