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आईपीओ में निवेश नहीं है लॉटरी
जयंत पई /  December 16, 2012

पिछले लगभग तीन वर्षों से प्राथमिक बाजार काफी सुस्त बने हुए हैं। इस अवधि के दौरान जहां संस्थागत निवेशकों ने पात्र संस्थागत नियोजन (क्यूआईपी) में सक्रियता बढ़ाई वहीं छोटे निवेशकों ने काफी हद तक इससे परहेज किया है। अब प्राथमिक बाजार में तेजी आकर्षक दिख रही है और इस बाजार में निवेश के मूल सिद्घांतों के साथ फिर से दांव लगाने के लिए अच्छा समय हो सकता है।
प्राथमिक बाजार में काफी हद तक दो खंड सार्वजनिक आरंभिक पेशकश आईपीओ और एफपीओ शामिल हैं। आईपीओ बाजार को अक्सर लॉटरी के रूप में देखा जाता है  जिसमें सफल निवेशक लिस्टिंग के समय अपने शेयरों को बड़े मुनाफे के साथ बेचने में सफल रहते हैं। कुछ देशों में यह धारणा अच्छी हो सकती है, लेकिन भारत में यह विकल्प का रंग फीका पड़ चुका है। इसके कारण हैं-

आईपीओ का मुक्त मूल्य निर्धारण
आज के नए निवेशकों को आईपीओ से आकर्षक प्रतिफल के पुराने उदाहरण काफी आकर्षक लग सकते हैं। हालांकि उनके लिए दुख की बात यह है कि अब समय बदल गया है। 1992 से पूर्व, आईपीओ का मूल्य अल्ट्रा-कंजरवेटिव फॉर्मूले के हिसाब से तय किया जाता था जिसकी वजह से आवंटी को असाधारण प्रतिफल का लाभ उठाने का मौका मिलता था। हालांकि 1992 के बाद से यह फॉर्मूला प्रवर्तकों को रास नहीं आ रहा है और वे अपने आईपीओ की कीमत को बाजार की मांग के अनुसार मुक्त बनाने के लिए स्वतंत्र हैं। इसलिए, आईपीओ के लिए वैल्यू प्रवर्तक द्वारा स्वयं ही बढ़ा दी जाती है। चूंकि यह जीरो-पूंजी वाला गेम है, और प्रवर्तक का लाभ आवंटी (निवेशक) के नुकसान से जुड़ा होता है।  श्रेष्ठ निवेश बैंकों तक प्रवर्तकों की पहुंच होती है। अपने ग्राहक को खुश करना उनका (इस मामले में, प्रवर्तक) काम है और वे यह सुनिश्चित करते हैं कि उन्हें मौजूदा धारणा का लाभ उठाने के लिए एक बड़ा हथियार मिल गया है। स्पष्टï रूप से इसका मतलब है कि निवेशक के तौर पर आपकी दिलचस्प कम ही है।
इन कारकों के बीच, आईपीओ में निवेश तब उचित रूप से लाभदायक हो सकता है जब आप इसे लॉटरी के बजाय 'निवेश' के रूप में देखें। यह इन वजहों से आवश्यक है:-
मूल्यांकन पर ध्यान दें न कि मूल्य पर
यह काफी अजीब लग सकता है, लेकिन कई छोटे निवेशक वास्तव में मूल्यांकन के बजाय शेयरों की अनुमानित वैल्यू के आधार पर निर्णय लेते हैं। उदाहरण के लिए, मेरे एक दोस्त ने केयर आईपीओ के मुकाबले भारती इन्फ्राटेल के निर्गम को पसंद किया, क्योंकि भारती का मूल्य लगभग 230 रुपये था जबकि केयर 750 रुपये पर। तब मैंने उन्हें केयर के निर्गम के मूल्यांकन के बारे में समझाया था कि यह कीमत/आय आदि के नियमित मूल्यांकन मानकों के आधार पर वास्तव में अधिक कीमत का था। निवेशक सिर्फ कम कीमत वाला शेयर होने की वजह से ऐसी खरीदारी को पसंद करते हैं और वे द्वितीय बाजार में भी इस तरह की गलती करते हैं।
दरअसल, कई बार मंदी के दौरान आए आईपीओ काफी बेहतर निवेश विकल्प हो सकते हैं, क्योंकि उनका मूल्यांकन अक्सर उचित स्तर पर होता है। इसके अलावा बाजार में सामान्य दिलचस्पी की वजह से आवंटन की गुंजाइश भी अधिक होती है।

तुलनात्मक अध्ययन
मौजूदा समय में जब प्रतिस्पर्धी का तुलनात्मक अध्ययन कठिन हो तो ऐसे में किसी आईपीओ के बारे में पूरी तरह से निष्कर्ष निकाल पाना मुश्किल काम है। इसलिए निवेशक को हमेशा ऑफर से जुड़ी कंपनी का अन्य सूचीबद्घ कंपनियों के साथ तुलनात्मक अध्ययन करना चाहिए। तभी आपको यह पता चल पाएगा कि संबद्घ आईपीओ आपके लायक है या नहीं।
यदि नई कंपनी अपने प्रतिस्पर्धियों से स्पष्टï तौर पर भिन्न नहीं है तो उस पर दांव लगाना समझदारी हो सकती है, बशर्ते कि वह अपने शेयर मूल्यांकन डिस्काउंट पर मुहैया करा रही हो।

एफपीओ में निवेश
यह विकल्प सूचीबद्घ कंपनियों द्वारा और अधिक इक्विटी निर्गम से संबद्घ है। इसमें यह निर्णय लेना थोड़ा आसान है कि इसके लिए निवेश करें या न करें, क्योंकि एफपीओ कीमत और मौजूदा बाजार कीमत के बीच तुलना निरंतर आधार पर की जा सकती है। कभी कभी कमजोर बाजार हालात ऑफर की कीमत को बाजार भाव की तुलना में काफी अधिक चढ़ा देते हैं। इसमें ऑफर कीमत की घोषणा और निर्गम खुलने के बीच समय का अंतर भी अहम भूमिका निभाता है। ऐसे मामलों में आप एफपीओ के लिए आवेदन करने के अलावा सेकंडरी बाजार से शेयर खरीद सकते हैं।

ऐसे निर्गम से जुड़े सामान्य बिंदु
तुरंत लाभ के लिए आईपीओ की खरीदारी न करें: यह महत्वपूर्ण है कि आप कंपनी की बुनियादी के आधार पर दीर्घावधि नजरिया अपनाते हैं ताकि बाजार में संबद्घ आईपीओ की लिस्टिंग के समय विपरीत हालात की स्थिति में आपको कड़वेपन से न जूझना पड़े। दूसरे शब्दों में कहें तो आईपीओ के समय न सिर्फ शेयर को बल्कि बिजनेस को खरीदें।
आईपीओ को 'ऑन-मार्जिन' पर खरीदने से परहेज करें: आप निर्गम को सिर्फ कुल रकम का एक छोटा हिस्सा लगा कर खरीदते हैं बाकी रकम 'मार्जिन फाइनैंसर्स' द्वारा उधार दी जाती है। ऐसे फाइनैंसरों का उन इक्विटी शेयरों पर हक हो जाता है जिनके लिए आप आवेदन करते हैं। दूसरे शब्दों में, इससे आपको बड़ी मात्रा में शेयरों के लिए आवेदन करने में आपको मदद मिलती है। हालांकि यदि इसके सूचीबद्घ होने के समय यदि कीमत बढ़ती है तो आप पर अधिक वित्तीय दबाव पड़ सकता है।
डिस्काउंट के अधिक लालच से बचें: कई कंपनियां आईपीओ के समय छोटे निवेशकों के लिए कुछ डिस्काउंट की पेशकश करती हैं। हालांकि यह अच्छा है, पर निवेश के दौरान यह एकमात्र लक्ष्य नहीं होना चाहिए। किसी कमजोर कंपनी का आईपीओ सूचीबद्घ होने के बाद इस रियायती कीमत से भी नीचे आ सकता है।
स्वयं को अधिक चालाक न समझें: अक्सर निवेशक कंपनी का बुनियादी आधार संदिग्ध होने के बावजूद 'हॉट' आईपीओ में निवेश कर बैठते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं कि सूचीबद्घ होने के बाद वे बड़े मुनाफे के साथ अपने निवेश से बाहर हो जाएंगे।  इसे 'ग्रेटर फूल थ्योरी' के नाम से जाना जाता है।
मौजूदा समय में ऐसा लगता है कि हम मंदी के नए बाजार के पहले चरण में हैं। फिलहाल आईपीओ बाजार बहुत अधिक उत्साहजनक नहीं है, लेकिन सेकंडरी बाजार की तर्ज पर इसके अधिक मजबूत होने की उम्मीद है। निवेशकों के लिए अतीत से सीखने का यह अच्छा समय है, ताकि भविष्य में किसी तरह के दबाव से बचा जा सके।

(लेखक पीपीएफएएस ऐसेट मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड में विपणन प्रमुख हैं)

Keyword: Share markets, Investment, Return,
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