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सीधे जनता को मिलें अधिकार तो थम सकता है भ्रष्टाचार
श्रीलता मेनन /  November 12, 2012

अरविंद केजरीवाल पिछले कुछ महीनों के दौरान तकरीबन हर हफ्ते भ्रष्टाचार, क्रोनी कैपिटलिज्म यानी मिलीभगत के पूंजीवाद के बारे में भंडाफोड़ करते रहे हैं और अब हाल ही में उन्होंने काले धन को लेकर कुछ जानकारियां सार्वजनिक की हैं। वह भ्रष्टाचार से जुड़ी जानकारियों को लगातार सामने ला रहे हैं और दिनोदिन इसका दायरा बढ़ता जा रहा है। केजरीवाल के मुताबिक स्वराज के जरिये भ्रष्टाचार को फैलने से रोका जा सकता है। स्वराज यानी जनता का शासन। बकायदा उन्होंने अपनी पुस्तक 'स्वराज' में आदर्श राज्य की संकल्पना का खाका पेश किया है। इसके मुताबिक प्रत्येक पंचायत और नगर को अधिकार प्राप्त आर्थिक और राजनीतिक इकाई के तौर पर देखा गया है। फिलहाल ये इकाइयां लोकसेवकों की दया पर निर्भर हैं जहां पर भ्रष्टाचार का बोलबाला है। 
दरअसल स्वराज की कल्पना प्राचीन भारत से प्रेरित है जहां ग्रामीण गणतंत्र की मौजूदगी थी और ग्रामीण जन निकाय काफी शक्तिशाली हुआ करते थे। एनी बेसेंट और चाल्र्स मेटकॉफ के साथ इतिहासकार जी एम ट्रिवेलयान भी तत्कालीन ग्रामीण लोकतांत्रिक व्यवस्था की तारीफ कर चुके हैं। वर्ष 1930 में गवर्नर जनरल चाल्र्स मेटकॉफ ने लिखा कि किस तरह से ग्रामीण समुदाय अपने आप में एक छोटे गणतंत्र की तरह था और लगता था कि यह कभी खत्म नहीं होगा। केजरीवाल लिखते हैं, 'उन्होंने (चाल्र्स मेटकॉफ) कहा था कि यह भारत और उसके लोगों का योगदान है।' केजरीवाल बताते हैं कि ब्रिटिश इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं थे और इस बात को समझते हुए उन्होंने ग्रामीण जन निकायों या सभाओं से उसकी ताकत छीन ली और इसे ब्रिटिश कलेक्टर के हाथों में दे दिया और बाद में यही शक्ति भारतीय लोकसेवकों के हाथों में हस्तांतरित हो गई। नगरीय विधानसभा आज के समय में भी अमेरिका जैसे देश में स्थानीय मुद्दों पर सार्वजनिक मतदान के जरिये निर्णय लेती हैं। ओरेगन की नगरीय विधानसभा इसका जीता जागता उदाहरण है। ओरेगन में जब वालमॉर्ट ने शॉपिंग केंद्र को स्थापित करने की योजना बनाई तो वहां के लोगों ने इसके खिलाफ अपना मत दिया और कहा कि इससे कई दुकानें बंद हो जाएंगी। केजरीवाल बताते हैं कि भारत के लोगों के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है।
केजरीवाल के सहयोगियों ने दिल्ली में  'स्वराज अभियान' के तहत एक प्रयोग करते हुए शहर के सबसे निचले स्तर पर जन निकायों को प्रोत्साहित किया। पूर्वी दिल्ली के कुछ इलाकों में उन्होंने पार्षदों से मुलाकात की और उन्हें मोहल्ला सभा का आयोजन करने के लिए मनाया। सभा में लोगों से इस बात की सलाह ली गई कि वे स्थानीय फंड का किस तरह से इस्तेमाल करना चाहते हैं। नगर के प्रत्येक वार्ड में कम से कम 10 मोहल्ला सभा है जिसमें प्रत्येक की आबादी 4,000 है। पार्षदों को मतदाताओं की गंभीरता देखकर खुशी हुई और उन्होंने नगर निगम के स्थानीय अधिकारियों के साथ साप्ताहिक बैठक को लेकर सहमति भी जताई। इस अभियान का हिस्सा रहे मनीष सिसौदिया ने बताया कि फिलहाल ये योजनाएं जमीनी स्तर पर ठंडी पड़ी हुई हैं और यह तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि कानून में बदलाव नहीं कर दिया जाता है। मौजूदा समय में अधिकारी सरकार के प्रति जवाबदेह हैं न कि जनता के प्रति। उन्होंने कहा कि कानून में बदलाव किए बगैर किसी पार्षद के लिए बैठक में सभी अधिकारियों की मौजूदगी सुनिश्चित करना काफी कठिन काम है। केजरीवाल की योजना के मुताबिक ग्राम सभा और मोहल्ला सभा भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए पूरी तरह से पर्याप्त है। केजरीवाल बताते हैं कि स्वतंत्र कोष को पूरी तरह से प्रत्येक ग्राम सभा के हवाले किया जाना चाहिए और उन्हें इसका उपयोग करने की पूरी छूट होनी चाहिए। उन्होंने कहा, 'यह संभव है कि गांव वाले पैसे को अपने पास रखें लेकिन यह दलालों के जरिये लूटे जाने से बेहतर है। इसके साथ ही इस बात की अधिक संभावना है कि बच्चों की शिक्षा के लिए शिक्षा सचिव के मुकाबले गांव की एक मां शिक्षा कोष का अधिक सावधानी के साथ प्रबंधन करेगी।' जहां तक करों की बात है तो सरकारी अधिकारी इसके लिए अपर्याप्त हैं और उन्हें यह काम स्थानीय समुदाय को दे देना चाहिए। इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने दिल्ली से लगे कौशांबी में केजरीवाल के घर के निकट इस तरह के कर संग्रह का मॉडल भी पेश किया। जहां पर आरडब्ल्यूए (रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन) ने आवासीय करों का संग्रह किया और यहां तक कर का भुगतान नहीं करने वालों ने भी इसका भुगतान किया।
केजरीवाल जिस व्यवस्था की बात कर रहे हैं वह  नई अवधारणा पर आधारित नहीं है। यह  73 वें संशोधन के मुताबिक ही हैं जिसमें विकेंद्रीकरण की बात की गई है। केजरीवाल के मॉडल का जीता जागता नमूना केरल है जहां राज्य सरकार अपने फंड का 40 फीसदी हिस्सा पंचायतों को हस्तांतरित करती है। पंचायत के हाथों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई और पानी की आपूर्ति के साथ अन्य मसलों की जिम्मेदारी होती है। शिक्षक और चिकित्सक पंचायतों को रिपोर्ट करते हैं। केजरीवाल का कहना है कि कम से कम 50 फीसदी फंड पंचायतों को दिया जाना चाहिए।
केजरीवाल लिखते हैं, 'जो व्यक्ति अस्पताल में उपचार के लिए जा रहा है उसके पास चिकित्सकों की नियुक्ति और उसके निलंबन का अधिकार होना चाहिए। प्रशासन की जिम्मेदारी सीधे लोगों के हाथों में जानी चाहिए। सभी सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति, निलंबन और उसकी बर्खास्तगी का अधिकार ग्राम सभा के पास होना चाहिए। सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति और निलंबन का अधिकार निश्चित तौर पर ग्राम सभा के पास होना चाहिए।' वे बताते हैं, 'कानून में बदलाव करके  उन कदमों को उठाया जाना चाहिये जिसके जरिये ग्राम सभा के पास प्रखंड विकास पदाधिकारी और ग्रामीण स्तर के सरकारी कर्मचारियों को बैठक में शामिल होने के लिए बुलाया जा सके और साथ ही उन्हें ग्राम सभा के पारित आदेशों को लागू करना पड़े। जिला या प्रखंड स्तर पर लोग सरकारी कर्मचारियों को आदेश दे सकें। जनता को राशन इंस्पेक्टर, बीडीओ, तहसीलदार, सब डिविजनल मजिस्ट्रेट या जिला कलेक्टर को बुलाने का अधिकार होना चाहिए।' केजरीवाल कहते हैं, 'अगर केरल और मध्य प्रदेश ने इस दिशा में कुछ कदम उठाये हैं तो बाकी ऐसा क्यों नहीं कर सकते?'

Keyword: Arvind Kejriwal, Corruption, Activist,
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