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केजरीवाल के उठाए मुद्दों पर दें ध्यान तो बनें काम
ए के भट्टाचार्य /  November 08, 2012

क्या नौकरशाहों का यह मानना सही है कि अरविंद केजरीवाल के हाल के अभियान से सरकार की फैसले लेने की प्रक्रिया प्रभावित होगी? केजरीवाल ने पिछले कुछ महीनों में जो खुलासे किए हैं उनके जवाब में सरकार में शामिल कुछ लोगों ने ऐसे अनुमान जताए हैं।
केजरीवाल के अभियान से नाराज लोगों का कहना है कि वह जो खुलासा कर रहे हैं उनमें कुछ नया नहीं है। रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ के बीच संबंध, नितिन गडकरी का कारोबारी साम्राज्य या फिर रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के बीच के संबंधों के बारे में मीडिया के एक वर्ग में पहले ही लिखा जा चुका है। मगर खुलासों के बावजूद इन मसलों को राजनीतिक पार्टियां और ज्यादातर मीडिया समूह दरकिनार करते रहे हैं। केजरीवाल ने जो अंतर पैदा किया है वह यह है कि वह एक बार फिर इन मसलों को सामने लाकर उन्हें राजनीतिक चर्चा का विषय बना रहे हैं। इस तरह यह कहना कि केजरीवाल के आरोप नए नहीं हैं, एक तरह से दिखावटी दलील पेश करने जैसा है क्योंकि जैसा वह कह रहे हैं, उसे अगर मान भी लिया जाए तो महज नयापन का न होना सभी अनियमितताओं को खारिज नहीं कर देता।
कुछ लोगों के मुताबिक अर्थव्यवस्था में  तेजी के लिए आक्रामक रवैया अपनाने की जरूरत है। ऐसे लोगों का मानना है कि केजरीवाल के आरोपों से इन प्रयासों को चोट पहुंच रही है क्योंकि इससे नकारात्मक माहौल पैदा हो रहा है। हालांकि इस बात में थोड़ी सच्चाई तो है कि केजरीवाल के आरोपों ने 'सब कुछ ठीक है' के एहसास को बिगाड़ जरूर दिया है। मगर यह मानना कि एक व्यवस्था तभी सुखद माहौल बना सकती है जब सभी खुश हों तो शायद यह बहुत बड़ी बेवकूफी है। अगर आप चाहते हैं कि आप बेहतर महसूस करें तो इसके लिए पहले आपको खुद अच्छा बनना होगा। केजरीवाल ने कुछ ऐसे खुलासे किए हैं जिनसे यह पता चलता है कि प्रशासन की सेहत ठीक नहीं है। तो फिर आखिर सुखद एहसास कैसे हो सकता है?
यह कहना गलत होगा कि केजरीवाल ने जो खुलासे किए हैं उनसे सरकार की नीतियां बनाने की क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। याद रहे कि दूरसंचार स्पेक्ट्रम घोटाला और कोयला ब्लॉकों के आवंटन को लेकर पैदा हुए विवादों की वजह से ही मौजूदा सरकार अपने पहले तीन सालों में नीतिगत पंगुता की शिकार रही। कड़े प्रयास और आंतरिक विवादों को सुलझाने के बाद आखिरकार इस साल सितंबर में मनमोहन सिंह सरकार ने नीतियों के मोर्चे पर कदम बढ़ाया।
यहां भ्रमित होने की जरूरत नहीं है। सरकार ने जो कदम उठाए हैं उनसे सुधार के संकेत नहीं मिलते हैं। सरकार के प्रयासों को आधे अधूरे मन से किए गए प्रयास कहा जा सकता है जिनके दम पर पिछली गलतियों और लापरवाही को कुछ हद तक सुधारने की कोशिश की गई। डीजल की कीमतें बढ़ाई गईं, मगर डीजल की कीमतों को सरकार के नियंत्रण से मुक्त नहीं किया गया। बहु-ब्रांड खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दी गई, मगर एक शर्त के साथ। यह एक फैसला था जिसे लगभग एक साल तक टाला गया। सब्सिडी वाले घरेलू गैस सिलिंडरों की आपूर्ति सीमित कर दी गई, मगर अब इसमें भी ढिलाई बरती जा सकती है। एक नई वित्तीय सुदृढ़ीकरण योजना तैयार की गई है, हालांकि कई विशेषज्ञ इस योजना के क्रियान्वयन की व्यवहारिकता को लेकर आशंकित हैं। यहां तक कि भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव भी इससे पूरी तरह प्रभावित नहीं थे और उन्होंने ब्याज दरों में कटौती को मौद्रिक नीति की अगली समीक्षा तक के लिए टाल दिया है। केजरीवाल के अभियान से वित्तीय सुदृढ़ीकरण के मोर्चे पर सुधारवादी उपायों में सुस्ती आने का डर नहीं होना चाहिए। पेंशन और बीमा क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की शर्तों में नरमी बरतने के लिए सरकार की योजना पटरी से उतरने की क्या वजह हो सकती है? यहां तक कि बहु-ब्रांड खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को दी गई मंजूरी को भी केजरीवाल ने अपने अभियान में निशाना नहीं बनाया था। अगर भारतीय प्रतिस्पद्र्घा आयोग के नियंत्रण के अधिकार को मजबूत और पारदर्शी बनाया जाए तो भी क्या केजरीवाल का अभियान सरकारी नीति निर्माताओं पर असर डालेगा? शायद नहीं।
यही वजह है कि आर्थिक सुधार के सुरक्षित रहने की संभावना है। मगर समस्याएं रियल एस्टेट और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में पैदा हो सकती है जहां पिछले कुछ सालों में सरकार ने या तो नीतिगत बदलावों के जरिए अधिक निवेश को बढ़ावा दिया है या फिर कई सारी सार्वजनिक-निजी पहल को मंजूरी दी है। इन्हीं क्षेत्रों में केंद्र और राज्यों में सत्तारूढ़ पार्टियों ने खास कारोबारी घरानों को फायदा पहुंचाने के लिए नीतियों में बदलाव किया और इस तरह खुद को भी फायदा पहुंचाया। कोयला ब्लॉक आवंटन पर पहले से ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकारें जमीन के सौदों की अब गहराई से जांच कर रही है। ऐसी जांच का अगला लक्ष्य विशेष आर्थिक क्षेत्र हो सकते हैं।
इसीलिए ऐसे क्षेत्रों में फैसला लेते वक्त नौकरशाहों को सतर्क रहने की जरूरत है। केजरीवाल के अभियान ने पहले ही सरकार से यह आश्वासन हासिल कर लिया है कि वह 2014 से पहले केजी-डी6 गैस कीमतों की समीक्षा नहीं करेगी। अगर केजरीवाल अपने अभियान में इस मसले का जिक्र नहीं करते तो गैस कीमतों की समीक्षा को मंजूरी मिलने की संभावना थी। उद्योगों को जमीन हस्तांतरित करने की प्रशासनिक प्रक्रिया अब और सुस्त और जटिल हो सकती है क्योंकि अब नौकरशाह किसी तरह के विवाद में नहीं फंसना चाहते।
तो क्या फैसले लेने की प्रक्रिया प्रभावित होगी? हां। पर अगर सरकार केजरीवाल के अभियान से सही सबक लेती है और नीतियों के मोर्चे पर उपजे खालीपन को दूर करती है तो समय के साथ प्रशासन की व्यवस्था में सुधार आएगा। यहां तक कि फैसले लेने की प्रक्रिया भी त्वरित और सुचारु बन जाएगी। तो केजरीवाल को दोष क्यों दिया जाए? बेहतर होगा कि नौकरशाह व्यवस्था को दुरुस्त बनाने पर ध्यान दें। यह बदलाव का एक मौका है क्योंकि नेता पहले से ही दबाव में हैं और इस तरह के सुधारवादी कदमों की राह में वे रोड़ा अटकाएंगे, इसकी संभावना कम ही है।

Keyword: Arvind Kejriwal, Corruption, Activist,
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