बिजनेस स?टैंडर?ड - बॉस को समझना है जरूरी तभी मिटेगी आपस की दूरी
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बॉस को समझना है जरूरी तभी मिटेगी आपस की दूरी
श्यामल मजूमदार /  November 01, 2012

कई साल पहले मुझे एक युवा अधिकारी और उसके कुछ वरिष्ठ सहयोगियों की बातचीत सुनने का मौका मिला। बातचीत का केंद्र था उन सभी का बॉस। यह युवा अधिकारी अपने बॉस से खासा नाराज था और उसकी खामियां गिना रहा था कि कैसे वह किसी का ध्यान नहीं रखता है, बॉस में उसके नए विचारों को सुनने का धैर्य नहीं हैं, बॉस का बौद्घिक स्तर बेहद कम है वगैरह वगैरह। वह बॉस के बारे में अपने इन विचारों को जाहिर कर ही रहा था कि एक वरिष्ठï सहयोगी ने उसे रोकते हुए कहा, 'हम सभी को जिंदगी में कई विकल्प मिलते हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश अपना बॉस चुनना उसमें शामिल नहीं है। इसलिए तुम्हारे पास स्पष्टï विकल्प हैं- या तो नौकरी छोड़ दो या एक ऐसा बॉस ढूंढ लो, जो हमेशा तुम्हारी बात से सहमत हो, जो एक सपना ही है या फिर अपने मौजूदा बॉस के व्यवहार के साथ तालमेल बिठा लो।' यह एक सामान्य सी सलाह थी लेकिन कड़वी सच्चाई।
जैसा कि मैंने बाद में पाया कि यह महज एक अधिकारी की समस्या नहीं है। कॉर्पोरेट गलियारों में बॉस से जुड़े सवालों से अटे पड़े हैं। कुछ बॉस के साथ काम करना इतना मुश्किल क्यों होता है? मेरा बॉस आत्ममुग्ध है। अब क्या? ये सवाल कभी खत्म होते नहीं दिखते।
मैनेजमेंट गुरु राम चरण ने इस मसले पर रोशनी डाली है। वह कहते हैं, 'जब बॉस और उसके अधीनस्थ कर्मचारी के संबंधों की बात आती है, तो आने वाले प्रबंधक अक्सर गंभीरता से ज्यादातर समय यही सोचते रहते हैं कि कंपनी और बॉस की उनके प्रति क्या जिम्मेदारी है? उनका ध्यान इस बात पर कम ही रहता है कि कंपनी के प्रति उनकी क्या जिम्मेदारी है?'
टाटा संस के निदेशक आर गोपालकृष्णन की चौथी किताब का यही विषय है- व्हाट द सीईओ रियली वॉन्ट्स फ्रॉम यू, जिसका विमोचन 26 अक्टूबर को किया गया। दो कारणों से यह किताब बेहद दिलचस्प बन जाती है- पहली, प्रबंधन की दुनिया ऐसी किताबों से अटी पड़ी है, जो यह बताती हैं कि आप महान नेता कैसे बने या सफल नेतृत्व क्या है? लेकिन एक अच्छा सहयोगी बनने और आपका बॉस आपसे क्या चाहता है, इसे अपने काम का अहम हिस्सा बनाने के बारे में बेहद कम ही लिखा गया है। यह बेहद जरूरी है क्योंकि नेता भी अपने बॉस के अधीनस्थ कर्मचारी ही होते हैं। दूसरा, प्रबंधन ज्ञान से ज्यादा गोपालकृष्णन ने केस स्टडीज पर भरोसा किया है। इस बहाने गोपालकृष्णन ने उन दो सवालों के जवाब दिए हैं, जो 30 साल पहले हार्वर्ड बिजनेस समीक्षा में दो प्रोफेसरों ने पूछे थे।
मैनेजिंग यॉर बॉस में जॉन गबारो और जॉन कोटर ने बॉस-अधीनस्थ संबंध को देखने के लिए दमदार नया नजरिया दिया था, जिसमें दोनों की एक-दूसरे पर निर्भरता को पहचाना गया था। अगर दोनों के बीच संबंध सौहार्दपूर्ण नहीं हैं, तो अधीनस्थ कर्मचारी को इसे सुधारने की कोशिश करनी चाहिए बशर्ते बॉस शैतान का साक्षात अवतार नहीं हो। जब आप अपने बॉस के गुण, उसकी कमजोरियां, प्राथमिकताएं और कार्यशैली को समझने की कोशिश कर अच्छे कामकाजी संबंध बनाने के लिए समय निकालते है, तो सभी को फायदा होता है। शोध में दिखाया गया है कि प्रभावी नेतृत्वकर्ता क्यों अपने अधीनस्थ कर्मचारी ही नहीं बल्कि अपने बॉस के साथ भी संबंध सुधारने के लिए समय निकालते हैं। लेकिन कुछ प्रबंधक जो सक्रिय और प्रभावी तरीके से अपने अधीनस्थ कर्मचारी, उत्पाद, बाजार और तकनीक पर नजर रखते हैं, वे अपने बॉस के समक्ष कोई प्रतिक्रिया नहीं देने का रवैया अपना लेते हैं। इस रवैये से हमेशा अधीनस्थ कर्मचारियों और कंपनियों को नुकसान पहुंचता है।
यह किताब दिखाती है कि किस तरह आप बॉस के असाधारण अधीनस्थ बन सकते हैं। इस नजरिये में 4 बातें प्रमुख हैं- उपलब्धि, भद्रता, समर्थन और प्रामाणिकता, जिनका ध्यान प्रत्येक अधिकारी को रखना चाहिए।
उपलब्धि : प्रत्येक अधीनस्थ कर्मचारी से अपेक्षा की जाती है कि वह सक्षम तरीके से काम करे और नतीजे दे। लेकिन सिर्फ इतना काफी नहीं है क्योंकि ये नतीजे बेहद स्वीकार्य तरीके से हासिल करना बेहद जरूरी है। मसलन किताब में दी गई एक केस स्टडी में ऐसे व्यक्ति का जिक्र किया गया है, जिसके पास शानदार विचार हैं और वह उन्हें अच्छे से लागू करने में भी सक्षम है लेकिन उसकी जबान बहुत तेज चलती थी और वह अपने सहयोगियों को अक्सर अपने रवैये से नाराज कर देता था।
भद्रता : यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरह बिना प्रतिकूल प्रतिक्रिया देते हुए अपने बॉस की राय से असहमति जताते हैं, किस तरह आप खुले दिमाग से सुन सकते हैं और आप अपने विरोधी के नजरिये को उसके प्रति अपनी भावनाओं से अलग रखते हैं?
समर्थन :करियर की शुरुआत में आपको निर्देश दिए जाते हैं और आप उन्हीं के अनुसार काम करते हैं। करियर के मध्यम दौर में आपको उन लोगों को भी प्रेरित करना होता है, जो प्रत्यक्ष रूप से आपको रिपोर्ट नहीं करते हैं। वरिष्ठï भूमिका में उन लोगों पर आपका कोई अख्तियार नहीं भी हो सकता है, जिन्हें आप प्रेरित करना चाहते हैं। इसी तरीके से आपके समर्थन कौशल का विकास होता है।
प्रामाणिकता : सीखने और व्यवहार में लाने में यह शायद सबसे मुश्किल विशेषता है। प्रामाणिक लोग वे होते हैं, जो अपनी गलती तुरंत स्वीकार कर लेते हैं। वे सच्चाई का सामना करते हैं और हालात सुधारने के लिए जरूरी कदम उठाते हैं। कई लोगों का मानना है कि शीर्ष अधिकारियों को अधीनस्थ कर्मचारियों में प्रामाणिकता सबसे ज्यादा पसंद आती है। लेकिन तथ्य यह है कि जब तक आप में ऐच्छिक स्तर की प्रामाणिकता नहीं है, तब तक आप अच्छे अधीनस्थ कर्मचारी नहीं हो सकते हैं।
अगर यह सब सैद्घांतिक लग रहा है, तो किताब पढ़ें जिसमें काफी केस स्टडी दी गई हैं। इसे के बाद ज्यादातर अधीनस्थ कर्मचारियों को लगेगा कि प्रबंधन विशेषज्ञता महज बॉस के लिए ही जरूरी नहीं है। इन के अलावा सामान्य सूझबूझ की भी दरकार होती है। अधीनस्थ कर्मचारी को यह पता होना चाहिए कि वे क्या कर रहे हैं और उन्हें अपने बॉस से सीखना चाहिए। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो काम और उन लोगों को सम्मान दीजिए, जो अच्छे से काम करने में आपकी मदद कर रहे हैं।

Keyword: Boss, officers, company,
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