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सियासत की फितरत और मुनाफे से है नफरत?
भूपेश भन्डारी /  October 30, 2012

अरविंद केजरीवाल ऐसे खामोश, मगर चतुर कार्यकर्ता हैं जिन्होंने भ्रष्टाचार और घोटालों पर से पर्दा उठाने का बीड़ा उठा रखा है। उनके विरोधी इस बात से खुश हैं कि कम से कम अभी तो देश में केजरीवाल की आंधी नहीं चल रही है और 2014 के आम चुनाव से पहले भी ऐसे हालात पैदा होने की गुंजाइश कम ही है। मगर गठबंधन सरकार के इस दौर में अक्सर छोटी पार्टियां सरकार पर भारी दबाव पैदा कर देती हैं। ऐसे में आर्थिक मामलों पर केजरीवाल की राय क्या है, यह जानने का समय आ गया है। बिजनेस स्टैंडर्ड में मेरी सहकर्मी ने कई दफा केजरीवाल का साक्षात्कार लिया है। वह अक्सर उन्हें ऐसे मसलों पर बोलने के लिए उकसाती हैं। मगर केजरीवाल लगातार टिप्पणी करने से बचते आए हैं। मगर अब तक के उनके साक्षात्कार, भाषण और हाल में जारी किए गए दृष्टिï पत्र से इस बारे में उनकी राय का अंदाजा हो जाता है। 
एक नजर कारोबार के प्रति उनके रवैये पर। मेरी एक दूसरी सहकर्मी वीनू संधू ने हाल में इस बारे में विस्तार से पता लगाया कि कैसे केजरीवाल 2014 के चुनाव से पहले स्वयंसेवकों की बड़ी फौज तैयार करना चाहते हैं। संधू ने जब इंडिया अगेंस्ट करप्शन हेल्पलाइन में फोन किया तो उन्हें एक स्वयंसेवक ने बताया कि उनके यहां किसी कंपनी से अनुदान नहीं लिया जाता है क्योंकि अगर अनुदान स्वीकार किया जाता है तो फिर ये कंपनियां 'बदले में उनकी पार्टी से कुछ फायदा उठाना चाहेंगी।' हालांकि यह सच है कि देश में पूंजीवाद पसरा हुआ है, मगर ऐसी सोच कारोबारियों के प्रति अविश्वास दर्शाती है। यह उन लाखों लोगों पर एक सख्त टिप्पणी की तरह है जो एक दिन कारोबारी बनने का ख्वाब देख रहे हैं। अगर आप भी कारोबारी हैं तो भूल जाइये कि आप कभी केजरीवाल और उनके साथियों की नजर में अच्छे बन पाएंगे।
कुछ और सबूत: पिछले हफ्ते दी टाइम्स ऑफ इंडिया में केजरीवाल ने हाल में दिल्ली में बिजली की दरें बढ़ाए जाने पर टिप्पणी में कहा कि शीला दीक्षित (दिल्ली की मुख्यमंत्री), रिलायंस और टाटा (इस शहर में बिजली वितरण का काम यही समूह करते हैं) कानून बना रहे हैं, आम आदमी नहीं। अखबार में छपे उनके बयान के मुताबिक, 'कानून कंपनियों को फायदा पहुंचाते हैं और हमसे लूटते हैं। ऐसे कानूनों को तोडऩा हमारी जिम्मेदारी है। अगर आप इस व्यवस्था को बदलना चाहते हैं तो आपको कानून तोडऩे होंगे।' केजरीवाल चाहते थे कि जुलाई से बिजली की दरों में 23 फीसदी की बढ़ोतरी का विरोध करने के लिए लोग बिल भरना बंद कर दें और दो मौकों पर तो उन्होंने काटे गए दो कनेक्शन भी जोड़ दिए। यकीनन उन्होंने यह मीडिया की मौजूदगी में किया। तो इस घटना में खलनायक कौन है? दीक्षित, रिलायंस और टाटा। बिजली की दरें दिल्ली विद्युत नियामक आयोग ने बढ़ाई थीं और इसमें इन तीनों की कोई भूमिका नहीं थी, मगर इससे केजरीवाल को कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके मुताबिक दोनों कंपनियों ने काफी मुनाफा कमाया है और बिजली की दरें बढ़ाने का कोई औचित्य ही नहीं है। उन्हें मुनाफा शब्द से ऐतराज है।
सन 1929 में (कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में) जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, 'मुझे पूरी ईमानदारी से स्वीकार करना चाहिए कि मैं एक समाजवादी हूं और राजा और रानी में मेरा कोई विश्वास नहीं है या फिर उस व्यवस्था में जो आधुनिक युग के उद्योगों के बादशाह तैयार करती है।' अरविंद केजरीवाल ने 2012 में (अपने दृष्टि पत्र में) कहा, 'हम अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए केवल पूंजी, बाजार तंत्र और मुनाफे पर आश्रित रहने को स्वीकार नहीं कर सकते।' ये दोनों ही बयान मिलते जुलते लगते हैं। शायद केजरीवाल का ध्यान इस ओर नहीं है कि कारोबारियों और नेताओं के बीच सांठगांठ को जन्म देने में नेहरू के समाजवाद और नियंत्रित बाजार की विचारधारा का ही हाथ है। जिसे वह उजागर करने में लगे हैं।
केजरीवाल का दृष्टि पत्र बीते युग की याद दिलाता है। गांधी का स्वराज उन्हें पसंद है, यह अलग बात है कि जब महात्मा गांधी जिंदा थे तब भी उसे अपनाने वाले कम ही थे। उन्होंने कहा 'आर्थिक एवं विकास नीतियां' 'सभी संदर्भों और जरूरतों के हिसाब से होनी चाहिए। लोगों को क्या चाहिए यह उन्हें खुद तय करना चाहिए।' ऐसा ही उन्होंने इकनॉमिक टाइम्स को बताया, 'सभी सरकारी योजनाएं दिल्ली में तैयार होती हैं और मोंटेक सिंह अहलूवालिया इन्हें बनाते हैं जो चुने हुए जन प्रतिनिधि नहीं हैं। वह देश भर के गांवों में इन योजनाओं को लागू करने के लिए 30,000 करोड़ रुपये आवंटित करते हैं।' ( जन लोकपाल के आंदोलन में केजरीवाल ने चुने हुए प्रतिनिधियों के खिलाफ आपत्ति जताई थी।) केजरीवाल के शब्दों में ग्राम सभा को यह अधिकार होगा कि वह यह फैसला खुद करे कि वह किस तरह विकास के पैसे को खर्च करना चाहती है। हालांकि ग्राम सभा को क्या करना चाहिए इसके लिए उनके पास एक सूची तैयार है: उन्हें बच्चों को 'मुफ्त, समान और गुणवत्ता युक्त शिक्षा' उपलब्ध करानी होगी और एक अस्पताल भी चलाना होगा।
ये फैसले लेने की ग्रामसभा की क्षमता पर थोड़ा संशय है। मैंने ग्रामीण जीवन को देखा है और मैं बता सकता हूं कि ग्राम समितियां भ्रष्टाचार, लिंग भेद और जातिगत भेदभाव का गढ़ हैं। केजरीवाल को अगर लगता है कि इन समितियों में सबकुछ बहुत सही है तो शायद वह सच्चाई से दूर हैं। दूसरी ओर वह आम लोगों की ईमानदारी को लेकर बहुत अधिक आश्वस्त नहीं हैं। उन्होंने इकनॉमिक टाइम्स को बताया कि नकद सब्सिडी देना सही नहीं है क्योंकि ऐसे में लोग 'फर्जी खाते खुलवा सकते हैं।' बाद में उन्होंने इससे भी गंभीर बयान दिया, 'नकद सब्सिडी देने के पीछे मकसद देश के मौजूदा बुनियादी ढांचे को पूरी तरह से बरबाद कर देना है।' वह क्या कहना चाहते हैं, यह स्पष्ट नहीं है। कर्नाटक और राजस्थान में पायलट परियोजनाओं से साबित हो चुका है कि इससे भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी। केजरीवाल को ध्यान देना चाहिए क्योंकि यदि उनकी सरकार बनती है तो उन्हें अधिक सब्सिडी की जरूरत होगी। मसलन वह चाहते हैं कि सरकारी अस्पताल सभी बीमारियों के लिए मुफ्त चिकित्सा मुहैया कराएं। मेरा सुझाव होगा कि सीआईआई और फिक्की को तत्काल केजरीवाल से संपर्क करना चाहिए।

Keyword: Arvind Kejriwal, Corruption, Activist,
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