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लोकसभा अध्यक्ष पद के बहाने उठते ढेरों सवाल
ए. के. भट्टाचार्य /  August 05, 2008
लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने प्रस्ताव रखा है कि अगर किसी सांसद को लोकसभा अध्यक्ष के रूप में चुन लिया जाता है, तो उसे अस्थायी रूप से पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे देना चाहिए।
जब वह अध्यक्ष पद का कार्यकाल पूरा कर लेता है, तो वह फिर से राजनीतिक पार्टी में शामिल होने पर विचार कर सकता है। यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब इससे पहले माकपा ने चटर्जी का नाम उन वामपंथी सांसदों की सूची में शामिल कर लिया, जिन्होंने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार से समर्थन वापस ले लिया था।

वह सूची राष्ट्रपति को भेजी गई थी और लोकसभा अध्यक्ष की स्थिति को लेकर एक विचित्र स्थिति पैदा हो गई। इस मसले पर उस समय विवाद और गहरा गया, जब माकपा नेताओं ने चटर्जी से लोकसभा अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर उन्हें विश्वास प्रस्ताव पर सरकार के खिलाफ मतदान करने को कहा। चटर्जी ने ऐसा नहीं किया और गुस्से से तमतमाए वामपंथी नेताओं ने विश्वास प्रस्ताव में मतदान के एक दिन बाद उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

क्या चटर्जी का प्रस्ताव राजनीतिक पार्टी और अध्यक्ष पद के बीच होने वाले मतभेद आने जैसी स्थिति को रोकने में मदद करेगा? यह सवाल सरकार और कुछ पार्टियों के बीच बहस का मुद्दा बन चुका है। यह सही है कि लोक सभा का अध्यक्ष अपने निर्वाचन के बाद अगर उस पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है, जिसके टिकट पर वह चुनाव जीतकर संसद में पहुंचा है तो जुलाई के आखिरी सप्ताह में चटर्जी जिस हालात से गुजरे हैं, वैसी स्थिति दोबारा नहीं आएगी। वह इस तरह के मतभेदों और विवादों से पूरी तरह मुक्त हो जाएगा।

ऐसा होने पर उस राजनीतिक दल को भी कोई भ्रम नहीं रहेगा, जिसकी पार्टी से वह सदस्य लोकसभा में पहुंचा है। इसके साथ ही वह संविधान और लोक सभा के प्रति अधिक वफादार रहेगा। चटर्जी के इस प्रस्ताव से एक और मुद्दा उभरकर सामने आया है। क्या इसे भी जरूरी बनाया जाना चाहिए कि यदि कोई व्यक्ति किसी राज्य का राज्यपाल बनाया जाता है तो वह अपनी पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दे? सामान्यत: पहले ऐसा होता था कि जब कोई व्यक्ति राजनीति से संन्यास ले लेता था, तब उसे किसी राज्य का राज्यपाल बनाए जाने के बारे में सोचा जाता था।

लेकिन पिछले एक-दो दशकों से देखा जा रहा है कि सक्रिय राजनीतिक नेताओं को राज्यपाल बनाकर भेजा जाने लगा है। तमाम ऐसे गवर्नर भी हैं, जो अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद फिर से सक्रिय राजनीति में लौट आए। अभी कुछ ही महीने बीते हैं, महाराष्ट्र के गवर्नर पद का कार्यकाल पूरा करने के बाद एस. एम. कृष्णा फिर से कर्नाटक की राजनीति में सक्रिय हो गए। मदनलाल खुराना राजस्थान के राज्यपाल रहे और जैसे ही वह पदमुक्त हुए, दिल्ली की सक्रिय राजनीति में आ गए और पूरे जोर-शोर से भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हो गए।

गवर्नर पद का कार्यकाल पूरा करने के बाद उनके सक्रिय राजनीति में वापस लौटने से तमाम ऐसे सवाल उठते हैं, जिससे चिंता पैदा होती है। केंद्र में सत्तासीन राजनीतिक दल ही अंतिम फैसला करते हैं कि राज्य का राज्यपाल कौन होगा। इस तरह से ऐसे लोग, जो राजनीति या सरकार में वापस लौटने की इच्छा रखते हैं वे उन लोगों की तुलना में ज्यादा लाभदायक होते हैं जो राज्यपाल बनने के बाद सक्रिय राजनीति से दूर होना चाहते हैं।

इस लिहाज से देखें तो वे व्यक्ति जो लोकसभा के अध्यक्ष पद पर चुने जाते हैं, उनका अस्थायी रूप से राजनीतिक दल से इस्तीफा दे देने का तरीका बहुत प्रभावी नहीं लगता। लोक सभा का अध्यक्ष, पदानुक्रम में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पद के बाद होता है, जिसका लाभ उसे मिलता है। राजनीतिक दल से अस्थायी रूप से हटने का तरीका पर्याप्त नहीं होगा। अगर कोई व्यक्ति इस पद पर चुना जाना है तो उसे स्वत: सक्रिय राजनीति से कुछ साल के अलग होने का नियम होना चाहिए।

लोकसभा अध्यक्ष पद से हटने के बाद कुछ साल के लिए सक्रिय राजनीति से हटने के नियम का राजनीतिक पार्टियां विरोध करेंगी। अगर 2009 में कार्यकाल पूरा होने के बाद सोमनाथ चटर्जी सक्रिय राजनीति से संन्यास लेते हैं तो वे इसका एक अपवाद हो सकते हैं। बहरहाल शिवराज पाटिल और बलराम जाखड़, दो ऐसे लोकसभा अध्यक्ष हैं जो बाद में केंद्र सरकार में मंत्री बने। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के समय में कुछ समय के लिए लोक सभा अध्यक्ष रहे मनोहर जोशी भी सक्रिय राजनीति में वापस लौट गए।

अब सवाल यह उठता है कि अगर लोक सभा अध्यक्ष, अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद कुछ सालों के लिए सक्रिय राजनीति से संन्यास लेते हैं, तो राज्यपाल के मामले में ऐसा क्यों न हो। विभिन्न नियामकों, वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों और सार्वजनिक क्षेत्र के आला अधिकारियों से उम्मीद की जाती है कि वे सेवानिवृत होने के बाद किसी क्षेत्र विशेष में काम न करें, क्योंकि वे उस संस्थान के विभिन्न हितों को प्रभावित कर सकते हैं।

तो आखिर में राजनीतिक दलों से पूछा जाना चाहिए कि क्यों नीति नियंता और राजनीतिक लोग इस नियम का पालन क्यों नहीं कर सकते। राजनीतिक दलों को भले ही सोमनाथ चटर्जी का प्रस्ताव रास नहीं आए लेकिन यह बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण होगा अगर बगैर उचित विचार के उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया जाए।
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