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सेवानिवृत्ति से जोड़कर न देखा जाए पंचाट को
अदालती आईना
एम जे एंटनी /  October 14, 2012

अद्र्घ न्यायिक पंचाटों का गठन हमेशा से उनकी शक्तियों और सदस्यों की नियुक्ति को लेकर विवादों में रहा है। संविधान के गठन के ठीक बाद इस पर गतिरोध शुरू हो गया था। सबसे पहला गतिरोध औद्योगिक पंचाटों की प्रकृति और उनके कर्तव्यों को लेकर था। उच्चतम न्यायालय ने 1950 में फैसला सुनाया कि भले ही पंचाट न्यायिक गतिविधियों में शामिल इकाइयों की तरह हैं, मगर तकनीकी रूप से इन्हें अदालत नहीं कहा जा सकता।

तब से ही अदालतों पर से काम का दबाव कम करने के लिए अधिक संख्या में पंचाटों का गठन किया जाने लगा। पिछली गणना के मुताबिक तकरीबन 60 से ऊपर पंचाट हैं। पंचाटों का गठन तमाम क्षेत्रों में किया जा चुका है जिनमें 24 मंत्रालय और विभाग शामिल हैं। हाल के वर्षों में संवैधानिक चुनौतियों के जरिये कुछ महत्त्वपूर्ण पंचाटों का गठन रोका गया है। उच्चतम न्यायालय ने प्रशासनिक पंचाटों, कंपनी कानून पंचाटों और कुछ दूसरे पंचाटों के सिलसिले में बड़े फैसले सुनाए हैं। प्रतिस्पद्र्घा अपीली पंचाट कई सालों तक विवादों में घिरा रहा था। इन पंचाटों का गठन जिस तरह से हुआ है, अदालत के सामने सबसे बड़ी चुनौती वही है।

विभिन्न मंत्रालयों के ड्राफ्टमेन ने इन पंचाटों से न्यायाधीशों को दूर रखा और उसमें अपने ही खेमे के लोगों को शामिल कर लिया। जब इस असंतुलन को अदालत के सामने पेश किया गया तो न्यायाधीशों ने कानून के दुरुपयोग का खतरा भांपते हुए इसमें सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को शामिल करने का फैसला सुनाया। अगर दूर से देखें तो ऐसा लगता है जैसे यह पूरा मामला सिर्फ इस बात को लेकर है कि सेवानिवृत्ति के बाद किसे यह पद मिलेगा- नौकरशाहों को या न्यायाधीशों को?

यही मसला तब उठा जब सूचना का अधिकार कानून को चुनौती देती हुई एक याचिका दायर की गई। दरअसल यहां ड्राफ्टमेन ने न्यायाधीशों को दरकिनार करते हुए स्पष्ट तौर पर नौकरशाहों को वरीयता दी थी। उच्चतम न्यायालय ने अपने पुराने फैसलों में जिन सिद्घांतों का पालन किया था उन्हीं के आधार पर सूचना आयोग में एक न्यायिक सदस्य को शामिल किया जाना अनिवार्य कर दिया। नमित शर्मा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में कुछ पन्ने इस ओर इशारा कर रहे थे कि कैसे सतही स्तर पर कानून बनाया गया है। उदाहरण के लिए कोई भी कारोबार करने वाला या किसी भी पेशे को अपनाने वाला आयोग का सदस्य नहीं हो सकता है। तो फिर आखिर कोई अपनी रोजी रोटी कैसे कमाएगा?

भले ही अदालत ने महज उन बुनियादी सिद्घांतों को लागू किया जिनकी पहले घोषणा की गई थी, मगर टीकाकारों और मीडिया ने आश्चर्यजनक रूप से इस बार नौकरशाहों की वकालत की। आम लोगों की नजर में न्यायाधीशों की छवि नौकरशाहों से काफी बेहतर है, फिर भी नौकरशाहों को टीकाकारों से समर्थन मिला जिसकी उम्मीद तक नहीं थी। जो न्यायाधीश आमतौर पर मीडिया के संपर्क में नहीं रहते या फिर मीडिया पर जिनकी पकड़ नहीं है, वे अपने ओहदे के कारण अपने बचाव में कुछ कह भी नहीं पाते और लोगों को एक बार फिर से उनके फैसले को पढ़कर समझना पड़ता है कि दरअसल वे कहना क्या चाहते हैं।

जैसा कि औद्योगिक पंचाट और एक दशक के दौरान सुनाए गए कई और फैसलों के बारे में देखने को मिला, पंचाट दोहरी जिम्मेदारी उठाते हैं। वे न केवल मंत्रालयी फैसले लेते हैं बल्कि दीवानी अदालतों की भूमिका भी निभाते हैं। सूचना आयोग किसी विवाद पर फैसला सुनाने से पहले दोनों पक्षों को बुलाकर उनकी दलीलें सुनता है। यहां मामला ठीक वैसे ही चलता है जैसे दूसरी अदालतों में चलता है। यहां प्रक्रिया आमतौर पर दीवानी अदालतों की तरह ही चलती हैं। वह एक तर्कसंगत फैसला सुनाता है। अगर कोई पक्ष पंचाट के फैसले से संतुष्टï नहीं है तो वह उच्चतम न्यायालय तक इसकी अपील कर सकता है। उसे जांच और पर्यवेक्षण का काम भी करना पड़ता है। वह पेनाल्टी भी लगा सकता है। पंचाट को बुनियादी अधिकारों जैसे कि संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(ए) और धारा 21 की व्याख्या करनी पड़ती है। दरअसल उसे सूचना के अधिकार और निजता के अधिकार के बीच संतुलन बिठाना पड़ता है।

अगर कोई आयोग यह सब और इससे भी कहीं ज्यादा करता है तो वह महज एक मंत्रालयी इकाई नहीं है। सेवानिवृत्त मुख्य सचिव और विशेषज्ञ सदस्य, चाहे वे कितने भी प्रतिभावान क्यों न हों, इस तरह की न्यायिक जिम्मेदारी के लिए पूरी तरह से सक्षम नहीं होते। इसके अलावा नौकरशाहों के साथ कुछ दूसरे तरह के हित भी जुड़े हो सकते हैं। सूचना आयोग के लिए अदालत के पिछले फैसलों और विचारों को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। वह भी तब जबकि बाकी का पैनल उनका अनुसरण कर रहा हो। ऐसे न्यायाधीश जो इन दिनों अपेक्षाकृत जल्दी सेवानिवृत्त हो रहे हैं, जनहित में उनकी प्रतिभा का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो वे अपनी प्रतिभा बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों को बेच देंगे और संपत्ति बनाने में जुट जाएंगे। वह संपत्ति जो वह अब तक अपनी जिंदगी में बनाने से चूक गए और उन्होंने अपनी आंखों के सामने वकीलों को मोटा पैसा बनाते देखा।

मीडिया ने इस फैसले के गंभीर परिणाम की बात कही है। अदालत यह साफ कर चुकी है कि यह नया ढांचा आने वाले समय में लागू होगा, मगर कई बड़े राज्य जैसे कि महाराष्टï्र, पश्चिम बंगाल और राजस्थान के आयोगों ने तो काल्पनिक शंकाओं को लेकर काम करना बंद कर दिया है। फैसले को पढ़े बिना ही यह कहा जाने लगा कि इस देश में सूचना आयोग में न्यायाधीश ही बैठते हैं। न्यायाधीशों ने अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा के सूचना कानूनों का अध्ययन किया है। इन सभी लोकतांत्रिक देशों ने इन आयोगों के सदस्यों के न्यायिक योग्यता और अनुभव को तवज्जो दी है।

ऐसा कहा जा रहा है कि सरकार एक समीक्षा याचिका लेकर आएगी। उम्र जैसे मसले पर स्थिति स्पष्टï करने का यह एक बेहतर मौका है। आयोग के सदस्य 65 साल की उम्र में सेवानिवृत्त होते हैं और न्यायाधीश भी इसी उम्र में सेवानिवृत्त होते हैं। यह एक बड़ी अड़चन है। ऐसे मसलों पर स्थिति स्पष्टï होगी, पर इस बीच सूचना आयोग का काम शुरू होना चाहिए।

Keyword: SC, Appeal, Court,
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