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असरदार होने के लिहाज से पर्याप्त हैं सुधार?
हाल ही में जो सुधार अपनाए गए हैं। वास्तविक निवेश और उत्पादन पर उनका क्या असर होगा, यह आकलन करना अभी बहुत जल्दबाजी होगी।
शंकर आचार्य /  October 12, 2012

तकरीबन चार सप्ताह पहले इस समाचार पत्र में मेरा आलेख, 'अर्थव्यवस्था रही कराह पर किसे है परवाह?Ó प्रकाशित हुआ था। इस आलेख में आर्थिक विकास, बाह्यï क्षेत्र में व्याप्त असंतुलन, राजकोषीय घाटे, वित्तीय दबाव, महंगाई और रोजगार आदि के संदर्भों में देश के आर्थिक प्रदर्शन में आ रही खतरनाक गिरावट को रेखांकित किया गया था। उसी शाम सरकार ने डीजल की कीमतों में 5 रुपये प्रति लीटर का इजाफा करने और हर घर को साल भर में केवल छह सब्सिडी वाले रसोई गैस सिलिंडर देने की घोषणा कर दी। अगले दिन सरकार ने आर्थिक सुधारों की घोषणा की जिसमें बहु ब्रांड खुदरा और घरेलू विमानन क्षेत्र में में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को अनुमति देना शामिल था। हालांकि सरकार के गठबंधन साझेदारों और विपक्षी दलों ने इसका भरपूर विरोध किया। तृणमूल कांग्रेस ने तो सरकार से नाता भी तोड़ लिया। लेकिन इस सबके बावजूद सरकार अपने फैसले पर अटल रही।

इस दौरान इस बात के स्पष्टï संकेत मिले हैं कि जनरल एंटी अवॉयडेंस रूल्स (गार) जिसका प्रस्ताव गत मार्च में पेश बजट में रखा गया था, वह अगले तीन सालों के लिए टाला जा सकता है। इसके अलावा उसी बजट में उल्लिखित पुरानी तारीख से लागू होने वाले कर उपायों की भी समीक्षा की जाएगी। राज्यों पर बिजली की बकाया राशि के मसले को हल करने के लिए एक जटिल योजना पेश की गई है। गत सप्ताह सरकार ने मंत्रिमंडल की मंजूरी के साथ बीमा संशोधन विधेयक (49 फीसदी एफडीआई के साथ), लंबे समय से लंबित पेंशन विधेयक और कंपनी संशोधन विधेयक, वायदा अनुबंध (विनियमन) संशोधन विधेयक एवं प्रतिस्पर्धा अधिनियम में संशोधन जैसे विधायी सुधारों को अनुमति दी। इससे पहले मंत्रिमंडल ने 12वीं पंचवर्षीय योजना को भी मंजूरी दी थी।

इसके अलावा राष्टï्रीय निवेश बोर्ड की घोषणा भी जल्दी की जा सकती है। सरकार की लंबी निष्क्रियता के बाद इस अचानक सक्रियता ने निश्चित तौर पर अल्पावधि में अनुमानों को महत्त्वपूर्ण गति दी  और विदेशी संस्थागत निवेशकों ने शेयर बाजार में 4 अरब डॉलर का निवेश किया। इससे सेंसेक्स में करीब 10 फीसदी की उछाल आई और डॉलर के मुकाबले रुपया 8 फीसदी मजबूत हुआ। प्रमुख रेटिंग एजेंसियों द्वारा रेटिंग में कमी की आशंका भी कम हुई। कारोबारी अखबार भारी भरकम सुधारों की सुर्खियों से भर गए और उद्योग जगत के प्रवक्ता उत्साहित नजर आने लगे। इन सब बातों से क्या निष्कर्ष निकाला जाए? क्या हम वाकई सुधारों के बल पर विकास और वृहद अर्थव्यवस्था के बेहतर प्रदर्शन के उसी दौर में वापस जा रहे हैं जैसा 1992-97 और 2003-08 में देखने को मिला था। आइए इसका आकलन करने की कोशिश करते हैं।

सबसे पहले राजकोषीय मोर्च की बात, सितंबर के मध्य में डीजल की कीमतों और रसोई गैस को लेकर जो उपाय अपनाए गए उनसे केंद्र का सब्सिडी बिल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के मुकाबले 0.2 फीसदी कम होगा। केलकर समिति की रिपोर्ट के मुताबिक अभी यह जीडीपी के 2.6 फीसदी के स्तर पर है। इस तरह यह बजट में जताई गई 2 फीसदी की सीमा से अधिक है। केलकर समिति की रिपोर्ट में विनिवेश बढ़ाने और योजनागत खर्च में कटौती की नई व्यवस्था अपनाने की अनुशंसा की गई। लेकिन इन पर जल्द अमल की उम्मीद नहीं नजर आती। केंद्र के राजकोषीय घाटे के लिए बजट में 5.1 फीसदी का अनुमान लगाया गया था लेकिन यह उसके मुकाबले 0.5 फीसदी अधिक रह सकता है। राज्यों और केंद्र का मिश्रित घाटा जीडीपी के 8 फीसदी के करीब रह सकता है। संक्षेप में, गत माह पेट्रोलियम कीमतों को लेकर जिन उपायों की घोषणा की गई है वे अच्छी शुरुआत हैं लेकिन उससे बहुत अधिक राजकोषीय मजबूती आने वाली नहीं है।

दूसरी बात, एफडीआई संबंधी कदम भी सुधार की दिशा में और निवेश बढ़ाने वाले हैं। लेकिन उससे वास्तविक निवेश में बहुत अधिक सुधार आने के लिए अभी और अधिक कदमों की आवश्यकता है। खासतौर पर यह देखते हुए कि पिछले कुछ सालों के दौरान परियोजनाएं रुकी रहीं और प्रमुख क्षेत्रों में घोटालों एवं नियामक गतिरोध के कारण समस्याएं बरकरार रहीं। इससे निवेश में भी कमी आई। बिजली, कोयला, खनन, सड़क, रेलवे और दूरसंचार आदि क्षेत्रों में नीतिगत और नियामक बाधाओं से निपटने का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए तत्काल वास्तविक निवेश और विकास दर में सुधार होने की उम्मीद बेमानी है।

तीसरी बात, हाल में पूंजी की आवक में जो इजाफा हुआ है उसका सही ढंग से प्रबंधन नहीं किया जा रहा। इस राशि के बड़े हिस्से का इस्तेमाल आरबीआई को विदेशी मुद्रा भंडार तैयार करने में करना चाहिए। इससे मुद्रा की कीमतों में सुधार की गति धीमी होगी और वर्ष 2009-10 की नीतिगत गलती से बचा जा सकेगा जब रुपये की वास्तविक प्रभावी विनिमय दर में तेज गति से इजाफा होने दिया गया था। चालू खाता घाटा भी अप्रत्याशित रूप से ऊंचा बना हुआ है और यह जीडीपी के 4 फीसदी के स्तर पर है। विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादन और रोजगार दोनों ठहरा हुआ है। जाहिर है यह रुपये को मजबूती देने का वक्त नहीं है।

चौथी बात, गत सप्ताह मंत्रिमंडल ने मुख्य रूप से वित्तीय क्षेत्र से संबंधित विधेयकों को मंजूरी दी। यह एक स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन बिल को मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलना एक बात है और उसे संसद में पारित कराना दूसरी बात। संसद के शीतकालीन सत्र में बीमा और पेंशन संशोधन विधेयक का पारित होना काफी हद तक भाजपा के समर्थन पर निर्भर करता है। ऐसे में किसी बात की गारंटी नहीं है। जहां तक प्रतिस्पर्धा अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन की बात है तो प्रतिस्पर्धा आयोग के दायरे का विस्तार कर बैंकों के विलय एवं अधिग्रहण को इसमें शामिल करने की सलाह सही प्रतीत नहीं हो रही। क्योंकि आरबीआई के रूप में एक विशेषज्ञ नियामक पहले से मौजूद है। लब्बोलुआब यह कि हाल में उठाए गए कदमों का सकारात्मक असर होगा लेकिन वास्तविक निवेश और उत्पादन पर उसके असर का आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी।

इस वर्ष का संयुक्त राजकोषीय घाटा जीडीपी के 8 फीसदी के उच्च स्तर पर रहने की आशंका है और सरकार द्वारा अभी मध्यावधि के राजकोषीय सुदृढ़ीकरण कार्यक्रम की घोषणा किया जाना शेष है। बाहरी व्यापार और चालू खाता घाटा भी बहुत अधिक बढ़ा हुआ है। जब तक प्रमुख बुनियादी क्षेत्रों में नीतिगत अनिश्चितता तथा गतिरोध दूर नहीं किए जाएंगे तब तक विकास, रोजगार और महंगाई को लेकर  सकारात्मक बदलाव की उम्मीद बहुत कम है।

ऐसे में गत माह की गई घोषणाओं ने वृहद आर्थिक प्रदर्शन के गिरावट के क्रम को थामा जरूर है लेकिन विकास लाने, राजकोषीय घाटे को कम करने, बाह्यï असंतुलन, महंगाई तथा बेरोजगारी से निपटने के लिए इतने कदम पर्याप्त नहीं होंगे। उसके लिए हमें अधिक स्थायित्व वाले और मजबूत नीतिगत कदमों की आवश्यकता होगी। जो राजकोषीय सुदृढ़ीकरण, बुनियादी ढांचे के प्रदर्शन और वास्तविक सुधारों के वाहक होंगे। तब देश की वृद्घि दर 5 से 7 फीसदी के बीच बनी रहेगी या फिर शायद 5 से 6 फीसदी। रोशनी अभी भी धुंधली नजर आ रही है।

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