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न्यायमूर्ति अल्तमश करें सुधारों के साथ शुरुआत
अदालती आईना
एम जे एंटनी /  October 07, 2012

देश के नए मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अल्तमश कबीर ने ऐसे समय में अपना नया पद संभाला है जब उच्चतम न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या 63,749 है। उनसे पहले इस पद पर आसीन न्यायाधीशों ने लंबित पड़े मामलों की संख्या घटाने की कोशिश की, मगर उन्हें सफलता हाथ नहीं लगी। पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस एच कपाडिय़ा जब 2010 में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने थे तो 55,018 मामले लंबित थे, लेकिन वह मामलों की संख्या को लगातार बढऩे से रोक नहीं पाए थे।

साल 2007 में 41,730 मामले लंबित थे। 2008 में इनकी संख्या बढ़कर 46,374 और 2009 में 50,200 पर पहुंच गई। इन मामलों के अलावा ऐसे बड़े मामले जिन पर फैसला कम से कम पांच न्यायाधीशों के संविधान पीठ को करना है, उनकी संख्या 42 है। फिर कुछ ऐसे मामले भी हैं जिनमें न्यायाधीशों में मतभेद होने या फिर पुराने फैसलों की फिर से समीक्षा किए जाने की जरूरत की वजह से दो या तीन न्यायाधीशों के पीठों ने बड़े पीठों के पास भेजा है। दरअसल ऐसे मामलों में नए उभरते परिदृश्य की वजह से स्पष्टïता लाए जाने की जरूरत होती है। अगर यह मान लें कि नई याचिकाओं पर फिलहाल कोई फैसला नहीं होता है तो भी इन सभी पुराने मामलों में फैसला आने में कुछ दशक लग जाएंगे।

एक सालाना रिपोर्ट आया करती थी जो उच्चतम अदालतों मामलों की याचिकाओं के बारे में विस्तार से जानकारी मुहैया कराती थी। इसका प्रकाशन 2005 में शुरू हुआ था, हालांकि 2009 में इसे बंद कर दिया गया। ऐसे में एक विस्तृत विश्लेषण संभव नहीं है।

मगर हां, कानों को सुकून पहुंचाने वाले कुछ ऐसे शब्द हैं जिन्हें न्यायमूर्ति कपाडिय़ा ने दोहराना पसंद किया। उनके मुताबिक एक गहरे विश्लेषण से यह पता चलता कि तस्वीर इतनी भी चिंताजनक नहीं है। उदाहरण के लिए पिछले साल के अंत में लंबित पड़े 58,519 मामलों में से अगर एक दूसरे से जुड़े मामलों को छोड़ दें तो केवल 33,892 मामले ही लंबित हैं। एक दूसरे से जुड़े मामले वे हैं जिनमें एक सा कानूनी सवाल जुड़ा है। इसका मतलब है कि अगर एक प्रमुख मामले में फैसला आ जाता है तो बाकी के मामले खुद-ब-खुद निपट जाते हैं। दीवानी मामलों की सुनवाई में अधिक समय लगता है और इनकी संख्या 47,623 है। पिछले साल कुल 10,896 आपराधिक मामले थे।

अक्सर जिस लंबित शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, उसे भी नई परिभाषा दी गई है। ऊपर के उदाहरण में 58,519 मामलों में से केवल 21,134 मामले एक साल से अधिक पुराने हैं। इस तरह ऐसे मामले जो एक साल से अधिक समय से अटके पड़े हैं उनकी संख्या केवल 37,385 है। भले ही कोई भी दलील पेश की जाए, मगर ये आंकड़े भी कम डरावने नहीं हैं। नई याचिकाएं भी तो तेजी से दायर की जा रही हैं।

वहीं दूसरी ओर इस साल उच्चतम में इस साल 9 पद खाली हुए हैं, जिनसे समस्या और गंभीर हो गई है। इन नियुक्तियों को फिलहाल रोक कर रखा गया है और इनकी चर्चा जोर-शोर से बार पुस्तकालयों में चल रही है। इन नियुक्तियों को फिलहाल क्यों रोक कर रखा गया है इसका पता सूचना के अधिकार के जरिए भी नहीं लगाया जा सकता क्योंकि न्यायालय में चयन प्रक्रिया वरिष्ठï न्यायाधीशों द्वारा की जानी है और इसे गुप्त रखा गया है। अदालत ने बंद दरवाजे के भीतर फैसला लेने की इस प्रक्रिया को लोगों की नजर से बचा कर रखा है। यह अलग बात है कि यह पूरा मामला आम लोगों के लिए काफी महत्त्वपूर्ण है। वास्तव में अदालत ने चयन प्रक्रिया के बारे में सूचना के अधिकार के जरिए जानकारी हासिल करने संबंधी जनहित याचिकाओं पर कड़ी पाबंदी लगा रखी है।

यह धुंधली तस्वीर लंबे समय से कानूनी मामलों से जुड़े सम्मेलनों में छाई रहती है। कुछ न्यायाधीशों ने न्यायिक प्रणाली के ध्वस्त होने की आशंका के प्रति चेताया है। देश ने हर क्षेत्र में परिचालनरत गड़बडिय़ों को बनाए रखने में जबरदस्त लचीलापन दिखाया है। हालांकि कुछ सकारात्मक संकेत भी नजर आते हैं।

हाल के महीनों में 21 में से कुछ उच्च न्यायालयों ने दायर की गई याचिकाओं से अधिक संख्या में याचिकाएं निपटाई हैं। दिल्ली (-1.98), छत्तीसगढ़ (-1.49), गुजरात (-3.06), पटना (-3.65) और राजस्थान (-8.50) के उच्च न्यायालयों ने इस नकारात्मक विकास का दावा किया है। कुछ उच्च न्यायालय बिल्कुल सीमा रेखा पर हैं, जैसे कि आंध्र प्रदेश (0.94), बंबई (0.21), हिमाचल प्रदेश (0.59) और पंजाब और हरियाणा (0.79) के उच्च न्यायालय। सिक्किम में जो देखने को मिला, वैसा कहीं और नहीं हो सकता। यहां केवल दो न्यायाधीशों ने उतने मामले निपटा दिए जितने दाखिल किए गए थे। अब यहां केवल 60 मामले लंबित पड़े हैं। बेहतर बुनियादी ढांचा, कंप्यूटरीकरण और तनख्वाह में बढ़ोतरी की वजह से कई जिला और अधीनस्थ न्यायालय भी तेजी पकड़ रहे हैं। त्रिपुरा (-13.97) और नगालैंड (-13.30) की अदालतें इसमें सबसे आगे है। केंद्रशासित प्रदेश चंडीगढ़, आंध्र प्रदेश, महाराष्टï्र, पश्चिम बंगाल और सिक्किम की भी अच्छी रैंकिंग है। इससे पता चलता है कि अगर पर्याप्त फंड और सुविधाएं उपलब्ध हों तो अधीनस्थ न्यायपालिका भी आम चलन को बदल सकती हैं। योजना आयोग और बजट निर्माताओं को इस वास्तविकता का ध्यान रखना चाहिए।

भले ही न्यायमूर्ति कबीर के पास नौ महीनों का छोटा कार्यकाल है, पर वह सुधारों की शुरुआत कर अच्छा उदाहरण पेश कर सकते हैं। एक ही मामले में महीनों से जारी आरोप प्रत्यारोप पर लगाम लगाई जा सकती है। दलीलें खत्म होने के तत्काल बाद फैसला सुना दिया जाए। पंजीकरण में भ्रष्टïाचार को समाप्त करने के लिए और पूरी प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए कंप्यूटरीकरण की व्यवस्था। जितनी जल्दी हो सके खाली पदों को भरा जाए। हो सकता है कि यह मांगों की एक लंबी सूची हो, मगर न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा इसी पर निर्भर करता है।

Keyword: Altamash Kabir, CJI, Court,
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