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हिमाचल में हाथ को मिलेगा साथ या फिर खिलेगा कमल
सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  October 05, 2012

भाजपा में कोई एक नेता प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी के दावे को पुख्ता करेगा तो वह हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल होंगे, जिनकी अगुआई में राज्य 4 नवंबर को चुनाव का सामना करने जा रहा है। हिमाचल प्रदेश की राजनीति पर अमूमन ज्यादा चर्चा नहीं होती क्योंकि वह लोकसभा में केवल चार सांसद भेजता है, लेकिन इससे इसकी अहमियत कम नहीं हो जाती। चूंकि राज्य में 2 फीसदी से भी कम मुस्लिम हैं, इसलिए संतों और मंदिर की राजनीति काम नहीं करती। बेचारे शांता कुमार को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में मंत्रिपद गंवाना पड़ा था। नरेंद्र मोदी को 'राज धर्म' निभाने की वाजपेयी की सलाह पर कुमार ने इस गलतफहमी में कि वाजपेयी को नैतिक समर्थन की दरकार है, कुछ ज्यादा ही जोश दिखा दिया। वाजपेयी ने भी उनका इस्तीफा स्वीकार लिया। उस वक्त कुमार की टिप्पणियां मोदी के खिलाफ विद्वेष के तौर पर ली गई थीं।

भाजपा महासचिव के रूप में मोदी के पास हिमाचल का प्रभार भी रहा, जिसके तहत मोदी ने शांता कुमार की जगह लेने के लिए नेताओं की एक नई पीढ़ी तैयार की। ये नेता थे सुरेश चंदेल, कृपाल कुमार और प्रेम कुमार धूमल। ये अलग बात है कि चंदेल 'सवाल के बदले नोट' मामले में निलंबित हो गए थे। अपने स्वभाव के अनुसार मोदी ने भाजपा की राज्य इकाई में नए धड़े खड़े कर दिए जो आज भी एक दूसरे पर निशाना साधने में गुरेज नहीं करते। अब शांता कुमार राज्यसभा सदस्य हैं लेकिन वह राज्य की राजनीति के केंद्र में भी हैं। वह तड़क-भड़क और भारी खर्च के खिलाफ पार्टी के भीतर ही खामोशी से अभियान चलाए हुए हैं। मगर दूसरे अधिकांश राज्यों की तरह आगामी विधानसभा चुनावों में भी हिमाचल में सियासी समीकरण बदलने की संभावना नहीं है।

हिमाचल की राजनीति बागवानी और फलों से जुड़ी है-जहां सेब बनाम संतरा या यूं कहें की किन्नू की है। एक ओर जहां भाजपा के वैचारिक विरोध की वजह से राज्य सरकार खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का विरोध कर रही है वहीं राज्य के फल एवं सब्जी उत्पादक इसका स्वागत कर रहे हैं। राज्य में सेब के अलावा कई फलों और सब्जियों का कुल 13 लाख टन सालाना उत्पादन होता है, जिनमें गैर-मौसमी सब्जियां भी शामिल हैं जिनकी पूरे उत्तर भारत में भारी मांग होती है। इनके अलावा बादाम, आडू, नाशपाती, आलूबुखारा और चेरी का भी बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। मगर किसानों को इन्हें बाजारों तक भेजने के उचित इंतजाम और खासतौर से चेरी, खुबानी, आडू और आलूबुखारा जैसे फलों के लिए शीत गृहों की पर्याप्त संख्या न होने की चिंता सताती रहती है। वजह यही है कि न तो पर्याप्त शीत गृह हैं और न ही परिवहन के लिए उचित बुनियादी ढांचा। स्थानीय कारोबारियों का कहना है कि एफडीआई के जरिये भारी निवेश से इस मोर्चे पर स्थिति बदलेगी।

राज्य का परंपरागत सत्ता अभिजात वर्ग या तो ऊपरी हिमाचल (सेब उत्पादक लॉबी) से ताल्लुक रखता है या निचले हिमाचल (संतरा उत्पादक) से। चुनाव में किस लॉबी को क्या पेशकश की जाती है, इससे ही चुनावी नतीजा तय होता है। कुल्लू, मंडी, सिरमौर, सोलन, किन्नौर और शिमला जैसे छह जिले सेब उत्पादक लॉबी के दबदबे वाले हैं। वीरभद्र सिंह और विद्या स्टोक्स जैसे कांग्रेसी नेताओं का इस इलाके से संबंध है। यह कांग्रेस का गढ़ रहा है। निचले हिमाचल को मजबूरी में भाजपा का दामन थामना पड़ा। लेकिन ये सभी मसले अब किनारे होने वाले हैं। दोनों पार्टियों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा है, एक एफडीआई का वादा कर रही है जो कारोबारियों के लिए मुफीद है तो दूसरी पार्टी विकास पर जोर दे रही है। सरकारी मुलाजिमों को लुभाना भी अहम मसला है। हिमाचल प्रदेश का हर पांचवां शख्स सरकारी नौकरी में है, साक्षरता 90 फीसदी से ज्यादा है और प्रति व्याक्ति आय भी काफी ऊंची है।

स्थानांतरण-नियुक्ति उद्योग चुनाव के लिहाज से बेहद अहम है। चूंकि हमेशा मेज के नीचे लेदनेन होता है, इसलिए चुनाव में यह मसला केंद्र में होता है कि यह पुरानी सरकार से कम या अधिक भ्रष्टï है। धूमल कांग्रेस के वीरभद्र सिंह का मुकाबला कर रहे हैं। सिंह पांच बार राज्य के मुख्यमंत्री, दो बार केंद्र में राज्यमंत्री रह चुके हैं जो पहली बार 1962 में सांसद बने। इस साल की शुरुआत में उन्हें कांग्रेस के भीतर राजनीतिक विरोधियों द्वारा लगाए गए भ्रष्टïाचार के आरोपों की वजह से केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा था। बाद में उन्हें मालूम हुआ कि पार्टी की चुनावी तैयारी के तहत उन्हें केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा को रिपोर्ट करना पड़ेगा। बहरहाल कांग्रेस प्रबंधकों ने इस असंगति को खत्म किया। लेकिन सिंह अभी भी खीजे हुए हैं।

यहां तक कि भाजपा नेता भी सिंह को मुश्किल प्रतिद्वंद्वी मानते हैं। बतौर मुख्यमंत्री उनका प्रदर्शन अच्छा रहा। उनके कार्यकाल में ही राज्य का पूर्ण विद्युतीकरण हुआ। वर्ष 1988 में स्पीति का किब्बर आखिरी गांव था, जहां बिजली पहुंची। साथ ही यह दुनिया के उन सबसे ऊंचे गांवों में शामिल हैं,जहां सड़क की सुविधा है। अपने राजनीतिक करियर में सिंह ने हिमाचल के दूसरे नेताओं की निचला हिमाचल बनाम ऊपरी हिमाचल की राजनीति से खुद को दूर रखा। राज्य में कुछ ही नेता ऐसे हैं जिन्हें कांगड़ा और शिमला दोनों क्षेत्रों में बराबर स्वीकार्यता हासिल है। निचले हिमाचल के केंद्र कांगड़ा में विधानसभा की 16 सीटें हैं जबकि ऊपरी हिमाचल के केंद्र शिमला में महज छह, लेकिन फिर भी सत्ता में उसका ही दबदबा रहता है।

अगर सिंह ने ऊपरी हिमाचल में चार-लेन की सड़क बनवाई तो निचले हिमाचल में छह-लेन की। साक्षरता के मामले में केरल के बाद हिमाचल की बारी आती है। अपने कार्यकाल में सिंह ने यह सुनिश्चित किया कि हर गांव में प्राथमिक विद्यालय हो। अगर उनकी आलोचना होती है तो उनकी निरंकुश शैली की वजह से होती है। वह रामपुर-बुशेहर वंश के आखिरी राजा हैं, जो कांग्रेस के पिछले कार्यकाल में भी मुख्यमंत्री थे। उस वक्त उन्होंने कांगड़ा क्षेत्र के तीन मंत्रियों विजय सिंह मनकोटिया, चंद्रेश कुमारी और बृज बिहारी बुटेल को अपनी कैबिनेट (2004) से हटा दिया, जिससे यह संदेश गया कि वह इस इलाके के साथ भेदभाव कर रहे हैं। वास्तव में उन्होंने इन तीनों को अपने खिलाफ साजिश की आशंका में हटाया। उनका शक सही भी साबित हुआ। पार्टी छोडऩे के बाद ही मनकोटिया राज्य की बसपा इकाई के अध्यक्ष बन गए। ये लोग आगामी चुनाव में एक दूसरे पर हमले करते दिखेंगे। यह भिड़ंत दिलचस्प होनी चाहिए।

Keyword: BJP, NDA, Elections,
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