बिजनेस स्टैंडर्ड - बिजली क्षेत्र को राहत की ऊर्जा
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बिजली क्षेत्र को राहत की ऊर्जा
बीएस संवाददाता / नई दिल्ली September 24, 2012

देश में निवेश को आकर्षित करने और कई सुधारवादी कदम उठाने के बाद सरकार ने आज बिजली वितरण कंपनियों के कर्ज पुनर्गठन प्रस्ताव को हरी झंडी दिखा इस क्षेत्र को बड़ी राहत दी है। करीब एक दशक पहले भी केंद्र सरकार इसी तरह की पहल करते हुए राज्य बिजली बोर्डों के बकाया के लिए एक बारगी निपटान योजना लाई थी। 
आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के कर्ज पुनर्गठन प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इसके तहत वितरण कंपनियों का आधा कर्ज राज्य सरकार को लघु अवधि ऋण के तहत वहन करना होगा जबकि कर्जदाता शेष ऋण का पुनर्गठन करेंगे। इस योजना के तहत राज्य सरकार को अनिवार्य तौर पर बिजली दरों में इजाफा करना होगा, साथ ही ऋण को इक्विटी में बदलना होगा और वितरण के क्षेत्र में निजी भागीदारों को शामिल
करना होगा।
राज्य सरकार के नियंत्रण वाली बिजली वितरण कंपनियों पर 31 मार्च 2011 तक करीब 1.9 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था। दरअसल, बिजली दरों में इजाफा नहीं होने के कारण कंपनियों का घाटा काफी बढ़ गया है। 2009-10 में आपूर्ति लागत और औसत बिजली शुल्क में प्रति यूनिट करीब 1.45 रुपये का अंतर आ गया है, जो 1998-99 में 76 पैसा था। केंद्र सरकार राज्यों के लिए ट्रांजिशनल फाइनैंस प्रणाली लागू करेगी। केंद्र सरकार के इस कदम का बिजली कंपनियों ने स्वागत किया है। बिजली उत्पादक संघ के महानिदेशक अशोक खुराना ने कहा, 'घाटा कम करना और बिजली दरों में बढ़ोतरी की योजना की सख्ती से निगरानी करने की जरूरत है, ताकि बिजली  वितरण कंपनियां अगले 3 से 4 साल में घाटा न मुनाफा (ब्रेक इवन) की स्थिति में आ सकें।'
योजना के तहत राज्यों को सबसे पहले कर्ज को बॉन्डों में बदलना होगा, जिसे डिस्कॉम की ओर से जारी किया जाएगा और राज्य सरकार इसके लिए गारंटी मुहैया कराएगी। इस योजना के तहत, जब तक छोटी अवधि के 50 फीसदी ऋण का भुगतान नहीं हो जाता, तब तक राज्य सरकार ऋणदाताओं को चरणबद्घ तरीके से विशेष प्रतिभूतियां जारी कर अगले दो से पांच साल के लिए ऋण की जिम्मेदारी उठाएगी। यह पूरी प्रक्रिया एफआरबीएम लक्ष्य के दायरे में ही रहकर की जाएगी, जिसके तहत राज्यों की उधारी उनके सकल घरेलू उत्पाद के एक निश्चित हिस्से तक सीमित रखने का प्रावधान है।
शेष आधे कर्ज को पुनर्गठित किया जाएगा, जिसके मूलधन भुगतान पर अगले 3 साल तक की छूट दी जाएगी। हालांकि इसके लिए राज्य सरकार को गारंटी मुहैया करानी होगी। ट्रांजिशनल फाइनैंस के तहत बर्बादी कम करने पर बचने वाली बिजली के मूल्य के बराबर केंद्र सरकार वित्तीय अनुदान मुहैया कराएगी। हालांकि राज्यों को यह अनुदान तभी मिलेगा जब वह बिजली आपूर्ति की लागत और शुल्क दरों के अंतर को 2010-11 से एक साल के बाद करीब 25 फीसदी कम करेंगे। वित्तीय सेवा विभाग प्रत्येक राज्य या डिस्कॉम के लिए एक नोडल बैंक नामित करेगा।
31 मार्च 2011 तक करीब 1.9 लाख करोड़ रुपये के घाटे को देखते हुए पुनर्गठन योजना के तहत बॉन्ड जारी करने के बाद राज्य सरकारों पर करीब 24,000 करोड़ रुपये का बोझ बढ़ेगा। इस योजना का मकसद बिजली वितरण कंपनियों को घाटे से उबारना और औसत आपूर्ति लागत और शुल्क दरों में अंतर को कम करना है।

Keyword: electricty, consumer, goverment,
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