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सुधार से रोशन होगा बिजली क्षेत्र
ज्योति मुकुल और संजय जोग / नई दिल्ली/मुंबई September 23, 2012

केंद्र सरकार इस हफ्ते अगले चरण के सुधार शुरू करने की योजना बना रही है। इसके तहत सरकार बिजली वितरण कंपनियों के लिए वित्तीय पुनर्गठन योजना की घोषणा कर सकती है। लेकिन केंद्र के इस कदम को लेकर राज्य उत्साहित नहीं हैं। मध्य प्रदेश पहले ही अपने राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों के ऋण का पुनर्गठन कर चुका है और उम्मीद है कि कांग्रेस शासित हरियाणा भी केंद्र की इस योजना का लाभ उठाएगा। हालांकि अभी तक राज्य ने इस मसले पर अपनी बिजली वितरण कंपनियों के साथ चर्चा नहीं की है।
माना जा रहा है कि आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति इस हफ्ते इसे मंजूरी दे सकती है। शुरुआत में राजस्थान, तमिलनाडु, हरियाणा और उत्तर प्रदेश को मदद दी जाएगी। इस पुनर्गठन का हिस्सा बनने के लिए राज्यों को कुछ अनिवार्य शर्तों का पालन करना होगा मसलन बिजली दरों में सालाना बढ़ोतरी, ऋण को इक्विटी में तब्दील करना और निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी को बढ़ावा देना। इसके बदले केंद्र, राज्यों को वित्तीय प्रोत्साहन देगा।
विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों और राज्यों के साथ करीब एक साल तक चले विचार-विमर्श के बाद पुनर्गठन योजना तैयार की गई है। सरकारी नियंत्रण वाली वितरण कंपनियों के 1.9 लाख करोड़ रुपये मूल्य के ऋण पुनर्गठन करने की दिशा में इसे बड़ा कदम माना जा रहा है। हालांकि राजनीतिक नजरिये से देखा जाए, तो निजी निवेश आकर्षित करना और सालाना शुल्क बढ़ोतरी जैसी अनिवार्य शर्तें लागू करना काफी मुश्किल हो सकता है। हालांकि राज्यों के लिए राजकोषीय जिम्मेदारी एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) सीमाओं का अनुपालन करना काफी मुश्किल साबित हो रहा है, खासतौर पर जबकि वितरण कंपनियों के 50 फीसदी ऋण का बोझ कुछ समय के लिए उन्हें उठाना है।
इस योजना के तहत, जब तक छोटी अवधि के 50 फीसदी ऋण का भुगतान नहीं हो जाता, तब तक राज्य सरकार ऋणदाताओं को चरणबद्घ तरीके से विशेष प्रतिभूतियां जारी कर अगले दो से पांच साल के लिए ऋण की जिम्मेदारी उठाएगी। यह पूरी प्रक्रिया एफआरबीएम लक्ष्य के दायरे में ही रहकर की जाएगी, जिसके तहत राज्यों की उधारी उनके सकल घरेलू उत्पाद के एक निश्चित हिस्से तक सीमित रखने का प्रावधान है।
हरियाणा सरकार अपनी बिजली वितरण कंपनियों के साथ इस मसले पर 26 सितंबर को बैठक करेगी। नाम नहीं छापने की शर्त पर हरियाणा सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, 'प्रस्तावित ऋण पुनर्गठन योजना से बिजली वितरण कंपनियों को फायदा होगा। हालांकि एफआरबीएम के तहत मौजूद जगह के अनुसार ही राज्यों को विभिन्न दिशानिर्देशों का पालन करना होगा।'
इसके अलावा राज्यों ने शुल्क और बिजली खरीद लागत के बीच तेजी से बढ़ते अंतर की भरपाई की खातिर सब्सिडी देने के लिए लगातार बजटीय प्रावधान मुहैया कराने में असमर्थता जाहिर कर दी है। कुछ राज्यों में बिजली नियामक आयोग ने शुल्क में 60 फीसदी तक की बढ़ोतरी कर दी है जबकि बिजली खरीद की लागत में 70 से 150 फीसदी इजाफा हुआ है।
बिजली वितरण में करीब 11,491 करोड़ रुपये का घाटा उठाने वाला मध्य प्रदेश भी पहले उन राज्यों की सूची में था, जिसे केंद्र की मदद की दरकार है लेकिन राज्य ने हाल में ही ऋण पुनर्गठन की प्रक्रिया पूरी की है। राज्य की तीनों सार्वजनिक बिजली वितरण कंपनियों का नियंत्रण करने वाली मध्य प्रदेश पावर मैनेजमेंट कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'हमारे राज्य की बिजली
वितरण कंपनियों पर बैंकों का छोटी अवधि का कोई ऋण बकाया नहीं है। हमने केवल पावर फाइनैंस कॉर्पोरेशन से ही ऋण लिया है। '
ऊर्जा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि अगर राज्य ऋण पुनर्गठन नहीं करते हैं, तो उनके पास पुनर्गठन के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है क्योंकि बैंक और वित्तीय संस्थान उन्हें ऋण देना बंद कर सकते हैं। पिछले साल तक राजस्थान पर 37,200 करोड़ रुपये का बकाया था व हाल में बैंकों द्वारा और ऋण देने से मना करने पर राज्य काफी मुश्किल में आ गया था।
बिहार की नजर भी केंद्र के इस पैकेज पर है। बिहार के मुख्य सचिव अजय नायक ने कहा, 'यह प्रस्ताव शुल्क और वास्तविक लागत के बीच बढ़ते अंतर को कम करने की दिशा में कदम है, जिसका बोझ ग्राहकों को ही उठाना पड़ता है।'

Keyword: electricty, consumer, goverment,
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