बिजनेस स्टैंडर्ड - नकदी रहित लेनदेन से होगा वित्तीय समावेशन
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नकदी रहित लेनदेन से होगा वित्तीय समावेशन
नकदी रहित लेनदेन न केवल आर्थिक रूप से अधिक व्यवहार्य होगा बल्कि यह वित्तीय समावेशन की प्रक्रिया के लिए भी बेहद महत्त्वपूर्ण है
शुभाशिष गंगोपाध्याय /  September 16, 2012

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के डिप्टी गवर्नर एच आर खान ने हाल ही में एक समारोह में कहा कि अर्थव्यवस्था में भारी धन की मौजूदगी भ्रष्टïाचार समेत अनेक समस्याओं की वजह बनती है। उन्होंने इसका हल सुझाते हुए कहा कि हमें एक ऐसी व्यवस्था अपनानी चाहिए जहां भुगतान करने में नकदी का कम से कम इस्तेमाल हो। उनका मानना है कि ऐसा करने से भ्रष्टïाचार के मामलों में तो कमी आएगी ही, साथ ही बैंकिंग व्यवस्था में नकदी प्रबंधन और मौद्रिक नीति में प्रसार की समस्या भी दूर होगी। आईडीएफ द्वारा हाल में किए गए  एक अध्ययन के मुताबिक दलील दी गई कि कम नकदी का इस्तेमाल करने की व्यवस्था दरअसल वित्तीय समावेशन बढ़ाने में भी मददगार साबित होगी। इसके अलावा इसके जरिये लेनदेन का डिजिटल रिकॉर्ड रखा जा सकेगा और लेनदेन की लागत घटेगी तथा विकास को बढ़ावा मिलेगा।
आरबीआई के मुताबिक जून 2010 तक देश में परिचालित मुद्रा के अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक यह राशि तकरीबन 8,64,333 करोड़ रुपये थी जिसमें से केवल 5 फीसदी मुद्रा बैंक में है।

कहने का मतलब इस 5 फीसदी को छोड़कर सारी धनराशि का रोज लेनदेन होता है। अप्रैल 2006 से जून 2010 के बीच मुद्रा में सालाना 17 फीसदी की दर से विकास देखने को मिला। अनुमान लगाया गया कि वर्र्ष 2009-10 के दौरान आरबीआई को केवल मुद्रा छापने पर सालाना 2,800 करोड़ रुपये की लागत आई। यह कुल परिचालित मुद्रा का 0.4 फीसदी है। नकदी रहित भुगतान की ओर कदम बढ़ाने की आवश्यकता भारत जैसे देश में ज्यादा है क्योंकि यहां उसको छापने और वितरित करने की लागत बहुत ज्यादा आती है। इस लागत में भंडारण, परिवहन, सुरक्षा, नकली नोटों की जांच आदि का खर्च शामिल नहीं है। छपाई की लागत की बात की जाए तो अगर इसमें मुद्रा के भंडारण और एटीएम आदि के जरिये उसके प्रबंधन की लागत जोड़ दी जाए तो प्रति व्यक्ति मुद्रा की छपाई और उसके वितरण की लागत सालाना 70 रुपये हो जाएगी। जनवरी 2010 तक के अनुमानों के मुताबिक देश में तकरीबन 60,000 एटीएम हैं।

एक एटीएम मशीन की स्थापना करने में 700,000 रुपये का खर्च आता है। यही नहीं हर वर्ष उसके प्रबंधन पर भी तकरीबन इतना ही खर्च आता है। ऐसे में जब हमारी योजना हर साल 10,000 नए एटीएम स्थापित करने की है तो अकेले एटीएम के जरिेये बंटने वाले नोटों को छापने का खर्च 8,400 करोड़ रुपये का स्तर पार कर जाएगा। दूसरे शब्दों में नकदी की छपाई और उसके वितरण का खर्च देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.2 फीसदी है। अगर वैकल्पिक रूप से देश में नकदी रहित लेनदेन सालाना 5 फीसदी की दर से बढ़ता है तो इससे हर साल 500 करोड़ रुपये से अधिक की नकदी बचेगी। जाहिर है देश में नकदी रहित लेनदेन का रुख करने का सीधा फायदा है। लेकिन इसके कुछ अप्रत्यक्ष फायदे भी हैं जो देश के लिए अधिक फायदेमंद साबित होंगे खासतौर पर समावेशी विकास के लक्ष्य को मद्देनजर रखते हुए।

एक ओर जहां वित्तीय समावेशन के लिए यह आवश्यक है कि हर घर की पहुंच बैंक तक हो। यह बात इसलिए अधिक मायने रखती है क्योंकि देश के श्रमिक वर्ग का 90 फीसदी असंगठित क्षेत्र से आता है और अगर उसकी बैंकों तक आसान पहुंच होगी तो इसका उनको बहुत अधिक फायदा मिलेगा। विभिन्न स्थानों पर नकदी रहित भुगतान करने वाले बुनियादी ढांचे की गैरमौजूदगी के कारण इन लोगों को लेनदेन की लागत का वहन करना पड़ेगा और इसके अलावा उनको विभिन्न सेवाओं और उत्पादों की खरीद तथा बिक्री के लिए नकदी का इस्तेमाल भी करना होगा। एक ऐसी व्यवस्था जो नकदी रहित लेनदेन को बढ़ावा दे वो निश्चित तौर पर मौजूदा दौर की उन नीतियों के पक्ष में साबित होगी जो वित्तीय समावेशन की बात करते हैं। आगे हम बात करेंगे कुछ ऐसे विशिष्टï नकदी रहित उपायों की जिनकी मदद से वित्तीय समावेशन को आगे बढ़ाया जा सकता है।

वित्तीय लेनदेन की अधिकृत जानकारी रखने के कई फायदे हैं। पहली बात, इससे सरकार को समुचित कर राजस्व जुटाने में मदद मिलती है, दूसरी बात, इससे अवैध लेनदेन को चिह्निïत किया जा सकता है और उस पर लगाम लगाई जा सकती है, तीसरी बात, इससे हमें देश के भारी भरकम असंगठित क्षेत्र के बारे में सही अनुमान लगाने और समझ विकसित करने में मदद मिलती है। आखिरी बात यह कि इससे उन खामियों को दूर करने में मदद मिलेगी जिनकी वजह से विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों के लिए आवंटित धन राशि यूं ही नष्टï हो जाती है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) पर न्यायमूर्ति वाधवा समिति की रिपोर्ट में अनुशंसा की गई थी कि पीडीए संबंधी लेनदेन का रिकॉर्ड रखने के लिए एक कंप्यूटरीकृत व्यवस्था अपनाई जानी चाहिए।

समुचित तकनीक और उपायों का इस्तेमाल करके किसी भी लेनदेन के वक्त खुद मौजूद रहने की जरूरत से बचा जा सकता है। जाहिर सी बात है कि ऑनलाइन भुगतान, मोबाइल बैंकिंग, मोबाइल पर्स आदि इसके उदाहरण हैं। बहरहाल कई बार यह आवश्यक हो सकता है कि ऐसे लेनदेन के वक्त दोनों पक्ष भौतिक रूप से मौजूद हों लेकिन नकदी रहित लेनदेन की प्रक्रिया अपनाकर लेनदेन की लागत को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

जरूरत इस बात की है कि अर्थव्यवस्था को नकदी इस्तेमाल करने के दौर से आगे नकदी रहित व्यवस्था तक ले जाने के लिए समुचित व्यवस्था की जाए। बहरहाल, ऐसे बदलाव के लिए सघन प्रयासों की आवश्यकता होगी ताकि एक ऐसा नेटवर्क विकसित किया जा सके जहां लोग बिना नकदी के लेनदेन करने के अभ्यस्त हों। इस नेटवर्क का विकास आवश्यक है क्योंकि जितने अधिक लोग नकदी रहित लेनदेन की प्रणाली अपनाएंगे उनकी संख्या में उतना ही इजाफा होता जाएगा। लोगों की संख्या विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में अलग-अलग हो सकती है। एक बार व्यवस्था विकसित हो जाने के बाद यह लोगों को प्रेरित करती है कि वे मौजूदा नकदी वाली व्यवस्था से हटकर नकदी रहित लेनदेन का रुख करें। इस महत्त्वपूर्ण नेटवर्क का निर्माण करने के लिए यह आवश्यक है कि हम समन्वित प्रयास करें। इस प्रयास में आरबीआई और सरकार को एकजुट होकर काम करने की आवश्यकता है।

Keyword: Finance, Inclusion, RBI,
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Comments
 
Raju kumar
20-Mar-17
 
v nice
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