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गरीबी हटाने के लिए कई मोर्चों पर करने होंगे प्रयास
सुबीर रॉय /  August 29, 2012

भारत 2003 से 2008 के बीच तेज विकास की राह पर चलता रहा मगर अब उसकी गाड़ी पटरी से उतरती नजर आ रही है। ऐसे में अर्थशास्त्रियों ने ऊंचे विकास के लिए आवश्यक शर्तों पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। ऐसा क्या किया जाए ताकि भारत एक बार फिर से वैश्विक स्तर पर दमदार प्रदर्शन करने वाला बन कर उभरे। विकास दर तकरीबन 6.5 फीसदी रहने की संभावना है और ऐसे में कुछ विशेषज्ञ कह रहे हैं कि सही नीतियां देश को वापस से 8 से 9 फीसदी की विकास दर हासिल करा सकती हैं।
ऊंचे विकास के सहारे देश बहुत कम समय में गरीबी से बाहर निकल सकता है क्योंकि विकास से अच्छा खासा कर राजस्व हासिल होता है और गरीबों के पास इसका हिस्सा पहुंचता है। जो लोग इस बात को मानते हैं उन्हें पता है कि अगर इसका फायदा सबसे पहले ऊपरी ढांचे को पहुंचे तो भी यह लुढ़कता हुआ आखिरकार नीचे तक आएगा ही। साथ ही, ऊंचे विकास से एक खुली मानसिकता तैयार होती है जो आधुनिक नीतियों को बढ़ावा देती हैं। जब ऊंचे विकास के दम पर ऊंचा प्रतिफल मिलता है तो विदेशी निवेश खुद-ब-खुद देश की ओर बढऩे लगता है जिससे एक बार फिर से विकास की रफ्तार बनी रहती है।
उच्च विकास महत्त्वपूर्ण तो है, पर क्या इसे अपने आप में परिपूर्ण माना जाए या फिर बढ़ावा देने वाला कारक समझा जाए। क्या ऊंचे विकास के ऐसे पहलू हो सकते हैं तो अंतिम लक्ष्य को पूरा न करते हों। भारत जैसे देश में जहां गरीब तबका गंभीर रूप से वंचित है, यहां मुख्य लक्ष्य सभी लोगों के लिए उद्देश्यपूर्ण जीवन उपलब्ध कराना है। ऐसा जीवन जहां सभी के लिए खाने के लिए पर्याप्त भोजन हो, सबका स्वास्थ्य बेहतर हो, लोगों के पास रोजगार पैदा करने की न्यूनतम प्रतिभा हो और रोजगार के पर्याप्त अवसर हों। और इस क्रम में पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। मगर  दुर्भाग्यपूर्ण रूप से भारत प्रशासन और सार्वजनिक जीवन में न्यूनतम स्तर के रूप में एक अत्यंत गंभीर गैर-भौतिक घाटे से गुजर रहा है। भारत अब मध्य आय वाले देशों के समूह में कदम रख चुका है मगर वैश्विक भ्रष्टाचार की सूची में उसका प्रदर्शन खासा निराशाजनक है। अगर सार्वजनिक कार्यक्रमों का लाभ शायद ही गरीबों तक पहुंच पाता है तो एक रुपये की चोरी को रोक पाना एक रुपये के कर संग्रह के बराबर है। ऊंचे विकास से ऊंची आय हासिल होती है, पर अगर कमजोर विकास भी बेहतर आपूर्ति के साथ उतना ही बढिय़ा प्रभाव छोड़े और ऊंचे विकास के कुछ जोखिम भी इसके साथ न रह जाएं तो फिर क्या ये ज्यादा उपयुक्त नहीं रहेगा।
प्रशासन की समस्या केवल सरकारी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है। सरकारी मदद प्राप्त स्वास्थ्य बीमा योजनाओं को इसलिए शुरू किया गया ताकि सरकारी फंडिंग से निजी डिलिवरी को जोड़ा जा सके। मगर अनावश्यक सिजेरियन डिलिवरी और हिस्टेरेक्टोमीज की कई सूचनाएं हैं। ऐसा माना जाता रहा है कि ऊंचा विकास मूल रूप से निजी क्षेत्र की देन है, मगर निजी और सरकारी क्षेत्र अक्सर एक साथ मिलकर काम करते हैं। तमिलनाडु और केरल में निजी चिकित्सा मूल्य सबसे अधिक हैं और इन्हीं दोनों राज्यों में सबसे बेहतरीन सरकारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली भी है। सुचारू तरीके से काम कर रही सरकारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली निजी स्वास्थ्य देखभाल खर्च पर निगरानी रखती है। इन दो राज्यों में किफायती स्वास्थ्य देखभाल के जरिये बेहतर गुणवत्ता वाली जिंदगी जी जा सकती है और इस तरह कम आय के साथ भी काम चलाया जा सकता है। शिक्षा के साथ भी यही तर्क लागू है। चीन और पूर्वी एशिया ने ऊंचे विकास के रास्ते पर कदम रखने से पहले ही कम सार्वजनिक खर्च के दम पर ऊंची सामाजिक पूंजी जुटा ली थी। वास्तव में स्वस्थ्य शिक्षित नागरिकों ने उन्हें ऊंचे विकास के पथ पर आगे बढ़ाया। भारत में शिक्षित अर्थव्यवस्था की बुनियाद साठ और सत्तर के दशक में रखी गई यानी कि ऊंचे विकास के दौर से पहले। बांग्लादेश की एक स्कूल शिक्षिका भारत में अपने समकक्ष शिक्षिका से कम आय प्राप्त करती है, पर फिर भी वह समान सामाजिक मूल्य प्रदान करती है। हालांकि भारत के मुकाबले बांग्लादेश मानव विकास के मोर्चे पर आगे बढ़ चुका है जबकि वह भारत से गरीब है।
भारत और चीन में कार रखना लोगों के लिए शौक की बात है, मगर इससे प्रदूषण फैलता है और कई लोगों को इससे सांस संबंधी बीमारियां होती हैं। उदारवाद के बाद के युग में दोनों ही देशों में स्वास्थ्य देखभाल और आवासीय खर्च वास्तविक आय में बढ़ोतरी से काफी अधिक बढ़ी है। प्रति व्यक्ति वास्तविक आय का 5 फीसदी या इससे अधिक की दर से बढऩा अच्छी बात है पर क्या जरूरी है कि इससे जीवन स्तर में भी सुधार हो।
भारत और चीन में ऊंचे विकास ने आय की असमानता को जन्म दिया है जबकि आय की असमानता निम्र रहने से भाईचारे को बढ़ावा मिलता है। जापान और पूर्वी एशिया अपेक्षाकृत निम्र असमान आय को ऊंचे विकास के साथ हासिल कर पाए हैं और इस तरह उन्हें काफी फायदा पहुंचा है। उन्होंने जो सामाजिक लाभ कमाया है वह लैटिन अमेरिका के ऊंचे विकास से हासिल लाभ से कहीं अधिक है। तो क्या हम कह सकते हैं कि बहुत जल्द ऊंचा विकास हासिल करने से अत्यधिक असमानता पैदा होती है। सबसे आखिर में ऊंचे विकास पर पर्यावरण के संरक्षण ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है। संसाधनों के दम पर हासिल विकास की तरह ही अत्यधिक प्रदूषण फैलाकर प्राप्त किया जाने वाले विकास का चलन नहीं रह गया है। जिंस की कीमतों का चक्र शायद वैश्विक विकास की वैसी लंबी अवधि को जगह न दे जैसा 2009 में पूरा हुआ।
भारत के ऊंचे विकास का दौर वैश्विक तेज रफ्तार के साथ चला और तब जाकर खत्म हुआ जब 2008 में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं। फिर शुरू हुआ ऊंची महंगाई का दौर इस तरह ऊंचा विकास हासिल करना अच्छी बात है, मगर यह न तो अत्यावश्यक है और न ही बेहतर जीवन का कोई पैमाना तय करता है।

Keyword: poverty, policy, goverment, development,
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