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नियामकों का कोड़ा बना बैंकों की प्रगति में रोड़ा
आकाश प्रकाश /  July 31, 2012

एचडीएफसी बैंक का बाजार पूंजीकरण अभी हाल में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के मुकाबले अधिक हो गया है और इसके साथ ही यह देश की सर्वाधिक मूल्यवान (सूचीबद्घ) वित्तीय सेवा प्रदाता कंपनी बन गई है। आदित्य पुरी और उनकी टीम ने बीते वर्षों में इसके लिए कमाल की मेहनत की है और वह इस सफलता और ख्याति की हकदार है।
एचडीएफसी बैंक इस बात का भी सबूत है कि आप बेहतरीन तरीके से एक बढिय़ा कारोबार खड़ा करके सभी अंशधारकों के लिए काफी संपत्ति जुटा सकते हैं।
गत 20 वर्षों से भी कम समय में एचडीएफसी बैंक के शीर्ष प्रबंधन ने 25 अरब डॉलर का बाजार पूंजीकरण एकत्रित किया है। इससे भारतीय वित्तीय बाजारों की मजबूत स्थिति का पता तो चलता ही है, यह भी जानकारी मिलती है कि अगर यहां कारोबार खड़ा किया जाए तो परिसंपत्ति निर्माण की पर्याप्त संभावनाएं हैं। ऐसा इसलिए कि एचडीएफसी बैंक जैसी कंपनियों के चलते ही वैश्विक निवेशकों की रुचि भारत में बरकरार है। कुछ ही उभरते बाजारों के पास सफलता की ऐसी कहानियां हैं और भारत में ऐसी कई दास्तानें बिखरी पड़ी हैं। इससे हमारे बाजार को प्रतिष्ठा हासिल हुई है।
एक ओर जहां एचडीएफसी बैंक की सफलता की दास्तान काफी बड़ी है, वहीं यह भी हकीकत है कि अब उसे एसबीआई से अधिक मूल्यवान माना जा रहा है। एसबीआई की भारतीय वित्तीय बाजार में 20 फीसदी की हिस्सेदारी है। इससे यह भी पता चलता है कि सरकारी क्षेत्र के बैंकों को लेकर निवेशकों की धारणा किस कदर कमजोर पड़ रही है। सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकांश बैंक निचले स्तर पर कारोबार कर रहे हैं जबकि ठीक उसी समय एचडीएफसी बैंक का प्रदर्शन दमदार रहा है।
अधिकांश निवेशकों के मन में सार्वजनिक उद्यमों की परिसंपत्तियों की गुणवत्ता को लेकर तमाम तरह की चिंताएं हैं। उनका यह भी मानना है कि ऐसे संस्थान गैर निष्पादित परिसंपत्तियों की गणना छिपाते हैं। अनेक पूर्व बैंकर यह बात कहते भी रहे हैं। बैंकिंग व्यवस्था की समुचित आकलित तनावग्रस्त संपत्तियां पहले ही 8 फीसदी के स्तर पर पहुंच चुकी हैं जो कई दशकों का उच्चतम स्तर है। यह आकलन आधिकारिक एनपीए और ऋण पुनर्गठन आंकड़ों पर आधारित है। निवेशकों में ऐसी भी भावना है कि आरबीआई ने आमतौर पर बैंकिंग परिसंपित्तयों को लेकर प्रावधान और मानकों में ढील दे दी है। खासतौर पर उसने बुनियादी ढांचा और अचल संपत्ति क्षेत्र के लिए ऐसा किया है। ये दोनों क्षेत्र परिसंपत्तियों पर पड़ रहे दबाव के लिहाज से मायने रखते हैं। ग्रामीण इलाकों में बैंकों की कर्ज माफी का भी वहां की ऋण संस्कृति पर बुरा असर पड़ा है। राज्यों में भी स्थिति खराब है क्योंकि बैंकों को बिजली बोर्ड, वितरण कंपनियों तथा अन्य सरकार समर्थित संस्थाओं के प्रति जबरदस्त जोखिम है।
निश्चित तौर पर बैंकों की संपत्तियों की गुणवत्ता को लेकर 85 फीसदी मामले बुनियादी ढांचा क्षेत्र, अचल संपत्ति और प्राथमिकता आधारित क्षेत्रों से जुड़ी देनदारियों के हैं। इनमें से किसी क्षेत्र में सुधार होने की गुंजाइश कम ही है।
दरअसल बिजली क्षेत्र में ऋण की समस्या अभी भी हमारे सामने है। अब तक इसमें पुनर्गठन की संभावना भी बहुत कम है। यहां तक कि राज्य बिजली बोर्डों के मामले में भी अब तक कुल जोखिम के केवल 35 फीसदी का ही पुनर्गठन किया गया है। अनेक निवेशक सोचते हैं कि कुल ऋण का 10 से 12 फीसदी हिस्सा वास्तव में एनपीए हो चुका है। अगर यह सच है तो फिर आंकड़े भयावह हैं और नीति निर्माताओं की नींदें तक उड़ सकती हैं।
बैंकों के परिचालन में सरकार के हस्तक्षेप को लेकर भी हमेशा आशंका बनी रहती है। केंद्र से हमेशा ऐसी मांग आती रहती है कि कर्ज माफ कर दिया जाए या ऋण के पुनर्गठन की शर्तों को आसान बना दिया जाए। ग्रामीण ऋण माफ करने की घटनाएं अभी भी दिखती हैं। खराब मॉनसून का पहला संकेत मिलते ही कर्नाटक सरकार ने किसानों की कर्ज माफी की घोषणा कर दी। अन्य राज्य भी उसका अनुसरण कर सकते हैं। राजनेता भी बैंकों का इस्तेमाल लोगों को मुफ्त की सुविधाएं देने और अपने लिए वोट जुटाने के काम में करते हैं। चुनाव पास आ रहे हैं और इसकी संभावना बढ़ रही है। ऐसी घटनाओं से निवेशकों का विश्वास बहाल नहीं होगा। पीएसयू बैंक के सामने मानव संसाधन की चुनौती भी है क्योंकि उनके कर्मचारियों की औसत आयु 40 पार कर गई है।
पिछले कुछ वर्षों के दौरान नियामक नियमों से वित्तीय सेवा उद्योग के विभिन्न हलकों के मुनाफे पर असर पड़ा है और उनका मुनाफा घटा है। पहले हमने देखा कि किस तरह बाजार नियामक सेबी ने म्युचुअल फंड और बीमा क्षेत्र को आड़े हाथो लिया। उसने उनके मार्जिन पर असर डाला और तीसरे पक्ष के वितरण की अर्थव्यवस्था को जबरदस्त क्षति पहुंचाई।
इसके बाद गोल्ड लोन और सूक्ष्म वित्त आदि पर नियामकों की भृकुटियां तनीं और अब उनके कारोबारी मॉडल को नया रूप देना होगा। समूचा पूंजी बाजार रक्तिम हो चला है और वहां मुनाफे का कोई संकेत नहीं है। इस बीच आरबीआई ने जरूरी क्षेत्रों के मानकों को कड़ा बना दिया है। ऐसें में उनके लिए लक्ष्यों का हासिल करना खासा कठिन होगा। आने वाले दिनों में देश के बैंकिंग क्षेत्र की पूंजीगत जरूरतें बढऩे वाली हैं। यह जरूरत और उसे विकास के लिए भी पड़ेगी और नियामकीय वजहों से भी। आरबीआई इस बात को लेकर प्रतिबद्घ नजर आ रहा है कि हमारे बैंक बेसल3 मानक अपनाएं। अगर मूल्यांकन ऐसे ही कम स्तर पर बना रहा तो ये बैंक अपना परिचालन कैसे बढ़ाएंगे? पूंजीगत जरूरतों को देखते हुए सरकार अपनी हिस्सेदारी कैसे बरकरार रखेगी? ऐसी स्थिति में शायद ही कोई निवेशक इन बैंकों के पास फटके।
जब तक कि संपत्तियों की गुणवत्ता के मसले को नहीं हल किया जाता है तब तक मुझे नहीं लगता कि कोई बैंक अपने मौजूदा मूल्यांकन दायरे से बाहर निकलेगा। अगर वे शेयर के रूप में पूंजी जुटाने में नाकाम रहते हैं तो फिर तमाम विकास योजनाओं को धन की आपूर्ति कहां से होगी? अगली पंचवर्षीय योजना में जिस 10 खरब डॉलर के बुनियादी ढांचे के विकास की बात कही जा रही है उसकी आधी राशि निजी क्षेत्र से आनी है। अगर लंबी अवधि के दौरान एक सक्रिय बॉन्ड बाजार नहीं हुआ और विदेशी कर्ज के प्रवाह पर रोक नहीं लगी तो बैंकों को इसमें से अधिकांश धन की आपूर्ति करनी होगी।
आज जरूरत इस बात की है कि बैंक परिसंपत्तियों की गुणवत्ता के मामले में एकदम साफ-सुथरे सामने आएं जिससे कि निवेशकों का विश्वास दोबारा बहाल किया जा सके।

Keyword: Banks, HDFC, Market Capitalisation,
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