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आपात योजना के साथ तैयार है कृषि मंत्रालय
अनिंदिता डे / मुंबई July 05, 2012

बारिश में कमी से होने वाली समस्याओं से निपटने के लिए कृषि मंत्रालय ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के सहयोग से जिलेवार आपात योजना बनाई है। इस योजना की जानकारी राज्यों को पहले ही दे दी गई है और कहा गया है कि अगर सूखे, कम बारिश और बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो तो राज्य कम अवधि में परिपक्व होने वाले बीजों का उपयोग करें। आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि इसका मकसद प्रतिकूल मौसम के बावजूद फसलों की उत्पादकता आदि को बनाए रखना है।
आईसीएआर ने धान की ऐसी किस्म विकसित की है, जो बाढ़ के बावजूद समय पर फसल मुहैया करा सकती है। तिलहन की ऐसी किस्म विकसित की गई है जो सूखे की वजह से शुरुआती बुआई में नाकाम रहने के बाद भी उपज देने में सक्षम है। सभी फसलों के लिए ये किस्में विकसित की गई हैं और यह सभी क्षेत्रों के लिए भी है। देश के कुल 640 जिलों में से 285 जिलों के लिए आपात योजना बनाई गई है, जो मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, पंजाब, ओडि़शा, महाराष्ट्र, हरियाणा, केरल, कर्नाटक, गुजरात, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में हैं।
अधिकारियों ने कहा - उदाहरण के तौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश में मॉनसून के आगमन में दो हफ्ते की देरी हुई है, लिहाजा किसानों को कम अवधि में परिपक्व होने वाले धान के बीज की सीधी बुआई की सलाह दी गई है। इसके अलावा नर्सरी में धान की बुआई 15 दिन के अंतराल पर करने की भी सलाह दी गई है।
आंध्र प्रदेश के जिन इलाकों में कपास की बुआई पहले ही हो चुकी है और मॉनसून में देरी के चलते फसल पर असर पड़ा है, वहां इसे बचाने के लिए पॉट वॉटरिंग की जा सकती है और उर्वरकों का उपयोग मिट्टी में पर्याप्त नमी आने तक टाला जा सकता है। ऐसी सलाह किसानों को दी गई है। इसी तरह जहां भूजल पर्याप्त मात्रा में है, वहां नर्सरी में धान की बुआई की जा सकती है क्योंकि इससे जुलाई के महीने में धान की फसल लगाई जा सकती है।
कर्नाटक में किसानों को वैसे इलाकों में मध्यम अवधि में परिपक्व होने वाले लाल चने के बीजों का इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है, जहां बारिश में दो हफ्ते से ज्यादा की देरी हुई है। पहले से बुआई हो चुके इलाकों में अंर्तकृषि व मिट्टी के क्षरण के साथ-साथ नमी को बचाने आदि को रोकने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं। उत्तरी कर्नाटक में किसानों को हरा चना और काला चना लगाने से मना किया गया है और वैसे खेतों को खाली रखने को कहा गया है जहां दोहरी फसल (मूंग या ज्वार) लगाने की योजना बनाई गई है। साथ ही यह भी कहा गया है कि ऐसा तभी किया जाए जब जुलाई की शुरुआत में वहां मूंग की बुआई न हो पाए।
अधिकारियों ने कहा कि खरीफ फसलों पर बारिश के असर का आकलन महज एक महीने में नहीं किया जाना चाहिए बल्कि जून, जुलाई और अगस्त में हुई कुल बारिश के आधार पर की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि साल 2004 व 2009 में जून में कम बारिश हुई थी, लेकिन जुलाई में भारी बारिश के चलते बंपर पैदावार हुई थी। अधिकारियों ने कहा कि जुलाई के पहले हफ्ते में बुआई की शुरुआत भर हुई है। न सिर्फ सरकार ने बल्कि किसानों व राज्यों ने भी बारिश में कमी के चलते शुरुआती बुआई में नाकामी मिलने की स्थिति से निपटने के लिए आपात योजना बनाई है।

Keyword: Rain, Agriculture ministery, ICAR,
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