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सियाचिन ग्लेशियर से जुड़ा विवादों का सफर
अजय शुक्ला /  June 17, 2012

भारत और पाकिस्तान के बीच कुछ ही ऐसे मसले हैं जो सियाचिन ग्लेशियर विवाद की तरह संवेदनशील हैं। इस विवाद को लेकर एक भ्रमित करने वाली अवधारणा यह है कि पूरे सियाचिन पर भारत का अधिकार है और पाकिस्तान इस पर अधिकार पाने के लिए तरसता रहता है। जब कभी सियाचिन पर चर्चा का मौका आता है तो भारतीय मीडिया में इस विषय पर लेख छपने शुरू हो जाते हैं जो यह तर्क देते हैं कि दोनों देशों के बीच परस्पर विश्वास पैदा करने के लिए इस इलाके से सैनिकों को वापस बुलाने की जरूरत है। या दूसरे शब्दों में कहें तो इस्लामाबाद से परस्पर शांति की उम्मीद में उन्हें यह तोहफा दिया जाए। सियाचिन में पाकिस्तान की स्थिति ठीक नहीं है और यही वजह है कि वह चाहता है कि वहां से जल्द से जल्द सेना को वापस बुला लिया जाए। वहीं एक वर्ग ऐसा भी है जिसका मानना है कि अगर सियाचिन से हमारी सेना नीचे आती है तो करगिल की तरह ही हस्ताक्षरित समझौते के बाद भी पाकिस्तान हम पर हमला बोल सकता है।
आज सियाचिन एक बार फिर से सुर्खियों में है। भूस्खलन में 127 पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने के बाद पाकिस्तानी सेना इस पर एक बार फिर से चर्चा के लिए जोर लगा रही है। द हिंदू अखबार में पिछले दिनों पहले पन्ने पर एक बड़ी खबर छपी जिसमें सियाचिन में रियायत देने की वकालत की गई है। इस खबर में कहा गया है कि 1992 में सियाचिन पर समझौता लगभग हो ही गया था। इस लेख में सर्वविदित और तथ्यों को विस्तार से पेश किया गया है। इस लेख में खुलासा किया गया है कि नवंबर 1992 में सियाचिन पर छठे दौर की वार्ता में एक पारस्परिक समझौता लगभग पूरा होने के कगार पर था। पर तब अचानक से भारतीय नेताओं ने इस समझौते के प्रति ठंडा रवैया अपना लिया और इस तरह वार्ताकारों को समझौते से पीछे हटना पड़ा था।
भारतीय प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख और तब रक्षा सचिव रहे एन एन वोहरा का बयान पेश करते हुए लेख में कहा गया है कि समझौते पर हस्ताक्षर करने के कार्यक्रम को रातोरात रद्द कर दिया गया क्योंकि भारत सरकार ने यह फैसला लिया कि इस मसले पर समझौता जनवरी 1993 में अगले दौर की बातचीत में लिया जाएगा।
सुनने में कितना भी अटपटा लगे मगर अखबारों को अपने विचार रखने की पूरी छूट है। पर यह समझ से परे है कि एक सर्वविदित घटना को अखबार के पहले पन्ने पर क्यों छापा जा रहा है। अपनी किताब सियाचिन: कनफ्लिक्ट विदाउट एंड में सैन्य गतिविधियों के तत्कालीन महानिदेशक और भारतीय प्रतिनिधिमंडल के एक प्रमुख सदस्य लेफ्टिनेंट जनरल वी आर राघवन ने बताया है कि आखिर क्यों भारतीय नेताओं का मन बदल गया। दरअसल उस समय बाबरी मस्जिद विवाद की वजह से कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच मतभेद बढ़ गए थे और ऐसे में कोई राजनीतिक एकराय बनाना मुश्किल लग रहा था। साथ ही पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में जिस तरह से हिंसा फैला रहा था उसे देखते हुए राजनीतिक नेता इस समझौता पर दोबारा से विचार करना चाहते थे। मगर हिंदू के लेख में कुछ ऐसी तस्वीर पेश की गई है मानो नई दिल्ली ने समझौते पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर के पाकिस्तान की पीठ पर छुरा घोंप दिया हो। निश्चित तौर पर कोई यह तर्क नहीं दे सकता कि जब तक कोई देश किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं कर देता तब तक वह उस पर दोबारा विचार नहीं कर सकता है।
लेख के मुताबिक, 'पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल ने एक प्रस्ताव रखा था जो भारत की उस मांग को पूरा कर रहा था जिसमें भारत का कहना था कि प्रस्तावित क्षेत्र से सेना को वापस बुलाने से पहले मौजूदा ग्राउंड पोजिशन को दर्ज कर लिया जाए', जो कि गलत है। भारत ने हमेशा से यह मांग की है कि एक्चुअल ग्राउंड पोजिशन लाइन (एजीपीएल), जो दोनों सेनाओं के बीच विभाजन रेखा का काम करती है, उसका समझौते में स्पष्ट उल्लेख किया जाए। हालांकि पाकिस्तान का प्रस्ताव था कि एजीपीएल को एक अनुलग्नक के तौर पर परिशिष्ट में जोड़ दिया जाए। साल 1992 में भारत की मांग को पूरा नहीं किया गया था, फिर भी वह पाकिस्तान के आवेदन पर विचार कर रहा था।एक पुनर्नियोजन अनुलग्नक को परिशिष्ट में जोड़ देना उचित नहीं होगा क्योंकि इस तरह हमारे पास कोई अधिकृत नक्शा नहीं बचेगा जिस पर स्पष्ट रूप से एजीपीएल का उल्लेख किया गया हो। हमें यह भूलना नहीं चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय, खासतौर पर अमेरिका करगिल युद्घ के दौरान पाकिस्तान के खिलाफ इसलिए हो गया था क्योंकि तब भारत के पास एक हस्ताक्षरित नक्शा था जिसमें दोनों ही देशों ने 1972 में नियंत्रण रेखा (एलओसी) को स्वीकार किया था।
साथ ही जब जम्मू में अखनूर से लेकर एनजे 9842 तक जहां सियाचिन की शुरुआत होती है, उस 700 किमी लंबी नियंत्रण रेखा की पहचान कर उसका चित्रण किया जा चुका है तो फिर 109 किमी लंबी एजीपीएल को दूसरे तरीके से चिह्नित करने की क्या जरूरत है। पाकिस्तान का तर्क है कि एजीपीएल का गठन शिमला समझौते के उल्लंघन के तौर पर किया गया था। मगर भारत भी अपनी ओर से यह तर्क दे सकता है कि नियंत्रण रेखा का गठन जम्मू-कश्मीर के इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन टू इंडिया के उल्लंघन के तौर पर किया गया है।नई दिल्ली को चाहिए कि वह साफ करे कि सियाचिन कभी भी पाकिस्तान को तोहफे में नहीं दिया जाएगा और न ही इसका इस्तेमाल रिश्तों को सुधारने के लिए किया जाएगा ताकि भारत-पाकिस्तान वार्ता आगे बढ़ सके। सियाचिन कश्मीर विवाद का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है और यही वजह है कि इसका इस्तेमाल महज विश्वास पैदा करने वाले हथियार की तरह नहीं किया जा सकता है।
साथ ही भारतीय सेना को अगर सियाचिन से हटाया जाता है तो करगिल से सेना वापसी की शर्तों को ध्यान में रखकर ऐसा किया जाना चाहिए जहां पाकिस्तानी विश्वासघात की वजह से 1999 में भारतीय सेना को तकरीबन 20,000 सैनिक वहां तैनात करने पड़े थे। शर्त इसलिए होनी चाहिए ताकि पाकिस्तानी सेना एक बार फिर से नियंत्रण रेखा का उल्लंघन न कर सके। भारतीय सेना सियाचिन के हालात की आदी हो चुकी है, मगर पाकिस्तान के साथ ऐसा नहीं है। वहीं करगिल में तो हालात हमारे लिए पाकिस्तान से अधिक विकट थे।
भारत में हर तरह के विचारों के लिए जगह है। ऐसा माना जाता है कि इस तरह के आदर्शवादी विचारों से हमें कोई खतरा नहीं है। पर जब एक वर्ग यह कहने लगे कि पाकिस्तान के साथ विश्वास पैदा करने के लिए कड़े मुकाबले में जीते गए हिस्से को पड़ोसी देश को सौंप दिया जाए, तो इसका विरोध किया जाना चाहिए।

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