बिजनेस स्टैंडर्ड - लेखा मानदंडों के पालन में न हो धोखा
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लेखा मानदंडों के पालन में न हो धोखा
आशीष के भट्टचार्य /  July 21, 2008
हाल ही में कोलकाता में एक सेमिनार के दौरान इंस्टीटयूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (आईसीएआई) के पूर्व अध्यक्ष पी एम नरेलवाला ने एक महत्त्वपूर्ण बयान जारी किया।
नरेलवाला ने कहा कि एकाउंटिंग(लेखा) नीतियों का पालन करने और कानून का पालन करने में फर्क होता है। उन्होंने कहा कि एकाउंटिंग के पैमानों के अनुसार जब आप चलते हैं तो वह काफी हद तक नीति आधारित होता है। यह आपके स्वविवेक पर निर्भर करता है कि आप किस तरह एकाउंटिंग नियमों का पालन करते हैं।

इस वजह से लोगों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे एकाउंटिंग पैमानों में खामियों का फायदा अपने निजी हित के लिए न करें। यानी वे डिसक्लोजर से बचने के लिए कुछ ऐसी तिकड़में न भिडाएं जो एकाउंटिंग नियमों को तैयार करते वक्त उनमें निहित खामियों को उजागर करती हों। यह वित्तीय रिपोर्ट तैयार करने वालों के विवेक और चेतना पर निर्भर करता है कि वे इन्हें तैयार करते वक्त पूरी निष्पक्षता बरतें। वहीं नरेलवाला ने कहा कि अगर कानून में कुछ ऐसे दाव पेंच हैं जहां किसी को लगता है कि उसका फायदा अपने हित में उठाया जा सकता है तो यह अपेक्षाकृत उतना बड़ा अपराध नहीं है।

और कोई भी व्यक्ति चाहे तो इनका फायदा उठा सकता है। पर एकाउंटिंग मानदंडों के पालन की स्थिति में कतई ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। कानून के मामले में भले ही आप थोड़ा बहुत फायदा उठा सकते हैं पर यहां भी यह विवाद का विषय है कि क्या आप किसी धोखे से यह फायदा उठाना चाह रहे हैं। क्या यह सही होगा या नहीं यह खुद में एक बड़ी बहस का विषय है और इस पर अभी चर्चा करना उचित नहीं होगा। फिलहाल हम उस मुद्दे पर चर्चा करते हैं जिसकी ओर नरेलवाला हमारा ध्यान खींचना चाह रहे थे।

मेरा मानना है कि अपने वक्तव्य के दौरान नरेलवाला निदेशक मंडली के सदस्यों के उस दायित्व की ओर इशारा कर रहे थे जो निवेशकों और दूसरे शेयरधारकों के प्रति उनका बनता है। यह बोर्ड की जिम्मेदारी है कि वह वित्तीय रिपोर्ट तैयार कर उसे पेश करे। सीएफओ की ओर से तैयार की गई वित्तीय रिपोर्ट को मंजूरी देने के साथ ही उस रिपोर्ट की जिम्मेदारी बोर्ड के कंधों पर पड़ जाती है। बोर्ड को चाहिए कि वह एकाउंटिंग मानदंडों को सहजता के साथ स्वीकार करे और उसका पालन करे।

बोर्ड का रवैया यह नहीं होना चाहिए कि वह कुछ ऐसे दाव पेंच खोजे जिसके जरिए सूचनाओं को छुपाया जाता है या फिर निवेशकों और शेयरधारकों को बरगलाया जा सकता है। बोर्ड ने वित्तीय रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया में खुद को अधिक सक्रियता से शामिल करने के लिए ऑडिट कमिटी का गठन किया है। इस तरीके से रिपोर्ट को तैयार करने और उसे पेश करने में बोर्ड की हिस्सेदारी बढ़ाने की योजना है। इस तरह बोर्ड अब पहले की तुलना में बेहतर स्थिति में है कि वह अपने नीतिगत और कानूनी दायित्वों का भार उठा सके।

इस सेमिनार में आए प्रतिनिधियों ने एकाउंटिंग मानदंडों के अनुपालन में कमियों का जिक्र किया। जहां प्रबंधकों ने इन कमियों के लिए ऑडिटरों को दोषी ठहराया तो वहीं ऑडिटर्स का कहना था कि इसके लिए शीर्ष स्तर का प्रबंधन जिम्मेदार है। पर मेरे विचार से एकाउंटिंग मानदंडों को मानने में अगर कमियां दिखती हैं तो इसके लिए दोनों ही बराबर के जिम्मेदार हैं। हालांकि यह तो मानना ही होगा कि भारत में वित्तीय रिपोर्ट तैयार करने के स्तर में सुधार आया है। प्रबंधक और ऑडिटर्स दोनों ही कारोबारी वित्तीय रिपोर्ट का स्तर सुधारने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

यह सेमिनार इंटरनेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड (एफआईआरएस) विषय पर था। आमतौर पर एकाउंटिंग मानदंडों पर जिन कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है उनमें इतनी अधिक संख्या में प्रतिनिधि शामिल नहीं होते हैं जितना इस बार देखा गया था। इस सेमिनार को आईसीएआई की ओर से मान्यता नहीं दी गई थी। दरअसल आईसीएआई अपने सिद्धांतों के अनुसार कंटीन्यूइंग प्रोफेशनल एजुकेशन (सीपीई) क्लासेज को मान्यता नहीं देता है और न ही खुद ऐसी कक्षाएं आयोजित कराता है। इस सेमिनार को संयुक्त रूप से एक औद्योगिक एसोसिएशन और आईसीएआई के क्षेत्रीय काउंसिल की ओर से आयोजित किया गया था।

सीपीई क्लासेज नहीं होने के बावजूद जितनी बड़ी संख्या में इस सेमिनार में प्रबंधकों और ऑडिटर्स ने हिस्सा लिया उससे साफ होता है कि भारतीय जीएएपी से लेकर आईएफआरएस तक ट्रांजिशन के अनुपालन को समझने में इनकी दिलचस्पी बढ़ रही है। यह निश्चित तौर पर एक अच्छी खबर है। भारत का कारोबारी जगत और एकाउंटिंग पेशेवर खुद को ट्रांजिशन के लिए तैयार कर रहे हैं। भारत 2011 से आईएफआरएस को अपनाने जा रहा है और सेमिनार में कई प्रतिनिधियों का ऐसा मानना था कि कानून निर्माता इसमें आवश्यक बदलावों को समायोजित नहीं कर पाएंगे।

साथ ही यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि अगर इसमें कोई भारी बदलाव की कोशिश की गई तो इससे विदेशी निवेशकों को गलत संकेत जा सकता है। इससे देश में विदेशी पूंजी निवेश को भी नुकसान पहुंच सकता है। मुझे उम्मीद है कि इस मसले पर सरकार की भी नजर होगी। कुछ लोगों का मानना है कि आईएफआरएस के तहत एसेट्स और लाइबिलिटीज को निष्पक्ष रूप से मापा जाता है। लेकिन मेरे विचार से यह सही नहीं है। विभिन्न संपत्तियों को मापने के लिए अलग अलग पैमाने तैयार किए जाते हैं। फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स के मामले में भी कंपनियों के बीच इसके पैमाने को लेकर गतिरोध है।

हो सकता है कि भविष्य में इन गतिरोधों को दूर कर लिया जाए। ऐसा माना जा रहा है कि आईएफआरएस फाइनेंशियनल इंस्ट्रूमेंट्स को मापने के लिए निष्पक्ष तरीकों को अपनाएगी, हालांकि इसमें कुछ समय लग सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि कई ऐसे मसले हैं जिनपर अभी विवाद है और उन्हें सुलझाने में समय लगने की संभावना है। खासतौर पर ऐसे फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स जिनका सक्रिय बाजार में कारोबार नहीं किया जा रहा है, उनको लेकर निष्पक्षता बरतने में थोड़ी परेशानी हो सकती है। हम दूसरे देशों के साथ मिलकर इस समस्या को सुलझा सकते हैं। मैं इसे एक अवसर की तरह देखता हूं।

अब तक हम एकाउंटिंग प्रैक्टिसों को समझने के लिए पश्चिमी देशों की ओर नजर टिकाए रखते थे। अब हमारे पास यह मौका है कि हम उन्हें प्रभावित कर सकें। भारतीय कंपनियां और एकाउंटिंग पेशेवरों में इतनी क्षमता है कि वे इन चुनौतियों का सामना कर सकें। मुझे याद है कि जब काफी कम अंतराल में आईसीएआई सेकेंड जेनरेशन एकाउंटिंग स्टैंडड्र्स जारी कर रहा था तो उस समय इस बात को लेकर बहस हो रही थी कि आईसीएआई जल्दबाजी में यह कदम उठा रहा है और इस परिवर्तन को अपनाने में भारतीय कंपनियों और एकाउंटिंग पेशेवरों को थोड़ा समय लगेगा।
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