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खाते का रहस्य और मिस्टर 'एक्स'
एन सुंदरेश सुब्रमणयन / नई दिल्ली May 28, 2012

यूएसबी के पूर्व कर्मचारी सचिन कार्पे के खिलाफ एक मामले में ब्रिटेन की फाइनैंशिल सर्विसेज अथॉरिटी (एफएसए) के सामने एक रहस्यमय मिस्टर 'एक्स' का नाम सामने आया है। ट्रिब्यूनल द्वारा मिस्टर 'एक्स' करार दिए गए व्यक्ति ने इस बात से इनकार किया है कि उसका यूबीएस वेल्थ मैनेजमेंट में ग्राहक 'ए' के नाम से कोई खाता है। इस खाते के जरिये व्यापक स्तर पर अनधिकृत लेनदेन करने का मामला सामने आया है। दो हफ्ते पहले ब्रिटेन के न्यायाधिकरण के फैसले के मुताबिक, मिस्टर 'एक्स' ने भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की मौजूदगी में ब्रिटेन के एफएसए के समक्ष साक्षात्कार में खाता नहीं होने की बात कही है। इस मामले में हर कोई चुप्पी साधे है लेकिन सेबी की मौजूदगी से स्पष्ट है कि मिस्टर 'एक्स' निश्चित ही कोई भारतीय है।
एफएसए की ओर से यूबीएस वेल्थ मैनेजमेंट के पूर्व प्रबंध निदेशक पर जुर्माना लगाने के फैसले को सही ठहराते हुए न्यायाधिकरण ने कहा, 'मिस्टर 'एक्स' ने सेबी की मौजूदगी में एफएसए को बताया कि ग्राहक 'ए' के खाते से उसका कोई संबंध नहीं है।' इस बारे में जानकारी के लिए सेबी को ईमेल भेजा गया लेकिन कोई जवाब नहीं आया। कार्पे पर आरोप है कि इस खाते के जरिये उसने फरवरी 2007 से जनवरी 2008 के बीच 321 सौदे किए हैं। ट्रिब्यूनल ने कहा, 'इनमें से 192 सौदे डॉलर (1.5 अरब डॉलर) मद में और 129 सौदे पाउंड (63.54 करोड़ पाउंड) मद में किए हैं।' कार्पे ने कहा, 'मुझे इस तरह के किसी सौदे से व्यक्तिगत तौर पर कोई लाभ नहीं हुआ है।' ग्राहक ए के खाते में प्लूरी सेल ई खाते से कई अनधिकृत भुगतान किए गए हैं। ट्रिब्यूनल ने कहा कि ई सेल खाते में रिलायंस एडीएजी समूह का पैसा था। प्लूरी सेल ई मॉरीशस का कारोबारी संगठन है, जिसका पूरा नाम प्लूरी इमर्जिंग कंपनीज पीसीसी सेल ई इमर्जिंग मार्केट्स ग्रोथ फंड है। ट्रिब्यूनल के मुताबिक, कार्पे ने 6 अनधिकृत भुगतान की व्यवस्था की और रिलायंस एडीएजी के फंड से पैसा ग्राहक ए के खाते में हस्तांतरित किया, जबकि उसे पता था कि यह पैसा ग्राहक ए का नहीं बल्कि एडीएजी का था। साथ ही रिलायंस एडीएजी को भी इस भुगतान का पता नहीं था। फैसले में यह भी कहा गया कि सेल ई या रिलायंस एडीएजी और ग्राहक ए खाते में कोई संबंध नहीं है।
पिछले हफ्ते ट्रिब्यूनल के फैसले की रिपोर्ट आने पर रिलायंस एडीएजी के प्रवक्ता ने इस घटनाक्रम को यह कहते हुए नकार दिया कि यह पुराना मसला है जो पहले ही निपट चुका है। प्रवक्ता के अनुसार, 'पांच साल पुराना यह मसला 2007 का है और जहां तक रिलायंस की कंपनियों का संबंध है, जनवरी 2011 में ही भारतीय नियामक इसे सहमति व्यवस्था के तहत बंद चुके हैं, जिसके बारे में उस समय काफी लिखा गया था।'

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