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बनारस का काम चंदेरी का नाम
सिद्धार्थ कलहंस / लखनऊ April 30, 2012

बनारसी साड़ी बनाने वाले कारीगरों और बेचने वाले कारोबारियों का दम चीनी रेशम के फंदे से लगातार घुट रहा था। लेकिन उन्हें पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश से ताजा हवा का झोंका मिला है। दरअसल मध्य प्रदेश की पहचान चंदेरी अब गंगा किनारे लहरा रही है। महंगे चीनी रेशम से परेशान वाराणसी के 80 फीसदी रेशम व्यवसायी अब चंदेरी बनाने में जुट गए हैं।

 

दिलचस्प बात तो यह है कि मध्य प्रदेश से बाहर बनने वाली इस चंदेरी को हाथोहाथ लिया जा रहा है। चंदेरी को गर्मियों का खास कपड़ा माना जाता है और इसकी मांग इतनी ज्यादा है कि वाराणसी में पावरलूम के कारीगरों को इस साल अक्टूबर तक फुर्सत ही नहीं है। पारंपरिक तौर पर चंदेरी सादा ही होती है, लेकिन बनारसी रेशम में इस्तेमाल होने वाली जरी, बूटी, रुपहले किनारे, पल्लू और जकार्ड ने इसमें चार चांद लगा दिए हैं। यह कपड़ा सस्ता और कम वजन का है। इसलिए बाजार में इसके कद्रदानों का जमावड़ा लग रहा है।


सिनर्जी फैब्रिक्राफ्ट के रजत मोहन पाठक बताते हैं कि पिछले 2-3 साल में चंदेरी ने वाराणसी के कपड़ा उद्योग को बहुत सहारा दिया है। कई पीढिय़ों से रेशम के कारोबार में लगे पाठक ने बताया कि मध्य प्रदेश में टसर सिल्क के साथ सूती धागा मिलाकर चंदेरी तैयार की जाती है। लेकिन वाराणसी में टसर सिल्क के बजाय चीनी रेशम का धागा इस्तेमाल होता है, जिसे मलबरी कहा जाता है। पड़ोसी राज्य बिहार के भागलपुर में भी चंदेरी का काम होता है। यहां चांपा सिल्क (जंगली रेशम) के साथ सूती धागा मिलाकर चंदेरी बनाई जाती है। लेकिन पाठक के मुताबिक चीनी रेशम के इस्तेमाल से चंदेरी अधिक आकर्षक हो जाती है।
पाठक ने यह भी बताया कि कुछ साल पहले तक गर्मी के मौसम में वाराणसी में बनने वाले 'सुपर नेटÓ के कपड़े की जबरदस्त मांग रहती थी। लेकिन अब उसकी जगह चंदेरी ही छा गई है। बनारसी कारीगरों के नायाब हुनर को चंदेरी ही मध्य वर्ग से लेकर अभिजात्य परिवारों तक लेकर जा रही है। उनके मुताबिक चंदेरी की मांग का यह हाल है कि दीवाली नजदीक आते-आते तमाम कारोबारी पावरलूम वालों के दरवाजे पर नकद की थैलियां लेकर खड़े हो जाते हैं और माल बनवाने की होड़ वहां लग जाती है। हालांकि चंदेरी से वाराणसी की मुहब्बत बहुत पुरानी बात नहीं है। यहां चंदेरी का दखल भी इत्तफाकन हुआ। दरअसल कुछ साल पहले गुडग़ांव और दिल्ली के कुछ व्यापारी बनारस चले आए। मध्य प्रदेश से उन्हें मांग के मुताबिक चंदेरी नहीं मिली, इसलिए उन्होंने वाराणसी के कारीगरों से उसकी फरमाइश की। कारीगरों ने प्रयोग के तौर पर चंदेरी बनाई और आज यही बनारसी कपड़ा उद्योग की जान है।


वाराणसी की जानी-मानी ड्रेस डिजाइनर माधुरी का कहना है कि चंदेरी का किफायती होना ही उसकी लोकप्रियता का अहम कारण है। उनके मुताबिक चंदेरी में आकर्षक और कारीगरी भरा कपड़ा भी 150 से 250 रुपये प्रति मीटर मिल जाता है। लेकिन असली रेशम का ऐसा ही कपड़ा कई गुना महंगा बिकता है। माधुरी भी मानती हैं कि चीनी रेशम महंगा होने के बाद से चंदेरी ने वाराणसी को काफी सहारा दिया है। माधुरी ने कहा कि रेशम महंगा होने पर वाराणसी में सूरत से तैयार होकर आए कपड़े पर ही कारीगरी का काम होने लगा था। लेकिन चंदेरी ने इस कारोबार को फिर खड़ा कर दिया है। हालांकि इस कारोबार में भी नक्कालों की कमी नहीं है। दाम कम रखने और तगड़ा मार्जिन कमाने के फेर में कुछ लोग चंदेरी में नायलॉन के धागे का इस्तेमाल भी करने लगे हैं। यह महज 30-40 रुपये प्रति मीटर में तैयार हो जाता है, लेकिन ज्यादा मांग तो असली रेशम से बनी चंदेरी की ही होती है।

Keyword: banarasi, Chanderi, powerloom,
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