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गैर-सरकारी अर्थशास्त्री की सेवाओं का लेखा-जोखा
ए के भट्टाचार्य /  April 24, 2012

वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार के तौर पर कौशिक बसु का कार्यकाल समाप्त होने वाला है। बसु ने यह पद दिसंबर 2009 में संभाला था। इसलिए अब शायद समय आ गया है कि गैर-सरकारी अर्थशास्त्री को आर्थिक नीति प्रशासन की अगुआई करने देने के संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के इस प्रयोग की समीक्षा की जाए।
बसु की नियुक्ति बेहद असाधारण थी। बसु ने इससे पहले किसी भी सरकार के साथ काम नहीं किया था। वैसे भी भारत सरकार की जटिल कार्यप्रणाली से सभी अच्छी तरह वाकिफ हैं। बसु से पहले यह पद अरविंद विरमानी संभाल रहे थे, जिनके पास सरकार के साथ काम करने का लंबा अनुभव था। बसु के सभी पूर्ववर्ती इस पद को संभालने से पहले सरकार के साथ काम कर रहे थे।
इस लिहाज से तो सरकारी तंत्र में बसु एक नौसिखिये जैसे ही थे, जिसके पास शिक्षाविद् होने के अलावा और कोई अनुभव नहीं था। विश्व बैंक के साथ भी बसु ने थोड़े समय तक काम किया लेकिन उस दौरान भी उन्हें अतिथि प्रोफेसर का शैक्षिक पद दिया गया। इसलिए बसु को मुख्य आर्थिक सलाहकार नियुक्त करने के लिए सरकार ने अपनी कोशिशों में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
लगभग इसी दौरान सरकार ने एक और गैर-सरकारी अर्थशास्त्री को भारतीय रिजर्व बैंक का डिप्टी गवर्नर नियुक्त किया। वह अर्थशास्त्री हैं सुबीर गोकर्ण, जिनके पास इससे पहले शैक्षिक जगत, थिंक टैंक और एक वैश्विक रेटिंग एजेंसी में काम करने का अनुभव तो था लेकिन सरकार में काम करने का नहीं। रिजर्व बैंक में गोकर्ण की नियुक्ति भी असाधारण बात थी।
कुछ समय बाद सरकार ने शिक्षा जगत के एक और अर्थशास्त्री को अपने साथ काम करने के लिए बुलाया और उन्हें मुख्य सांख्यिकीविद् का पद दिया। यह अर्थशास्त्री हैं टी सी ए अनंत, जो शिक्षण क्षेत्र से जुड़े थे और सीधे वहीं से सरकारी आंकड़ों की कमान संभालने के लिए आए। रिजर्व बैंक में गोकर्ण का अभी तक का कार्यकाल और उनकी नियुक्ति बेहद आसान रही है, जिस पर कोई भी विवाद नहीं हुआ। लेकिन दूसरी तरफ अनंत के अब तक के कार्यकाल में कई विवाद हुए हैं, जिनमें आंकड़ों में तेजी और यहां तक कि उनकी नियुक्ति की वैधता पर भी लोगों ने सवाल उठाए हैं। इसके अलावा उनके प्रदर्शन की समीक्षा करने का समय अभी नहीं आया है क्योंकि इन दोनों का कार्यकाल पूरा होने में कई महीने बाकी हैं।
वित्त मंत्रालय में बसु के कार्यकाल को दो विवादों के कारण याद रखा जाएगा। कुछ महीने पहले जब किशन बाबूराव हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी अभियान छेड़ा, तो सरकारी सेवाओं में बेहद गहरी पैठ बना चुकी रिश्वतखोरी से निपटने के लिए बसु ने नया फॉर्मूला दिया। बसु ने सुझाव दिया था कि भ्रष्टाचार कानून को बदलकर रिश्वतखोरी की सूचना कानून प्रवर्तन एजेंसियों को देने पर जन साधारण को पर्याप्त बढ़ावा देने का प्रावधान होना चाहिए।
अभी तक ऐसे मामले कानून के समक्ष नहीं आते हैं क्योंकि सरकार रिश्वत लेने और देने वाले, दोनों को ही कानून का उल्लंघन करने वालों के तौर पर देखती है। बसु का सुझाव कानून में ऐसा बदलाव करने का था, जिससे उत्पीडऩ और काम में देरी से बचने के लिए रिश्वत देने वालों को अपराधी मानने के बजाय उनकी शिकायतों की जांच अच्छे तरीके से की जाए। इस तरह रिश्वत लेना काफी जोखिम का काम हो जाएगा क्योंकि रिश्वत देने वाला कभी भी अधिकारी की शिकायत कर सकेगा। लेकिन इससे पहले कि बसु के इस सुझाव पर चर्चा हो पाती, भ्रष्टाचार के खिलाफ हजारे का अभियान देश भर में जोर पकड़ चुका था और बसु का विचार शुरुआती दौर से आगे ही नहीं बढ़ पाया।  पिछले हफ्ते  बसु एक और विवाद में फंस गए। भविष्य में आर्थिक सुधारों की रफ्तार और उलटी दिशा में चलती राजनैतिक हवाओं के टकराव पर उनके बयान से देश में काफी हो-हल्ला मचा। इसलिए बयान से उपजे इस राजनैतिक विवाद को निपटाने के लिए बसु द्वारा स्पष्टीकरण दिया जाना कोई हैरानी की बात नहीं थी।
अगर इन विवादों को छोड़ दिया जाए, तो वित्त मंत्रालय के मुख्यालय नॉर्थ ब्लॉक में बसु का कार्यकाल अपेक्षाकृत अच्छा ही रहा है। हर साल आम बजट से दो दिन पहले संसद में वित्त मंत्री द्वारा पेश की जाने वाली सालाना आर्थिक समीक्षा की पेशकश के तरीके में बसु के आने के बाद काफी बदलाव आया है। आर्थिक समीक्षा के आवरण को जटिल आर्थिक सिद्घांतों को समझाने वाले रेखाचित्रों से सजाने के साथ ही बसु ने समीक्षा की भाषा बेहद आसान बनाने पर काम किया है।
बसु ने समीक्षा में वृहद आर्थिक नीतियों के सूक्ष्म सिद्घांतों पर भी एक अध्याय जोड़ा। इस अध्याय में देश की वृहद आर्थिक समस्याओं से निपटने के लिए सरकार कौन-कौन से सूक्ष्म आर्थिक विकल्पों पर काम कर सकती है, उनकी जानकारी होती थी। बसु के कार्यकाल के दौरान उनकी अगुआई में तैयार की गई तीनों आर्थिक समीक्षाओं में जो बात हर बार देखने को मिली वह थी, तेज और दीर्घकालिक आर्थिक विकास सुनिश्चित करने के लिए भरोसे और करार के सामाजिक मूल्यों की अहमियत।
इसके अलावा बसु को और किन बातों के लिए याद रखा जाएगा? सॉवरिन संस्थाओं के लिए उन्होंने नए तुलनात्मक रेटिंग सूचकांक यानी क्रिस को लागू किया। इसके तहत वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज द्वारा दी गई रेटिंग के आधार पर विभिन्न देशों को तुलनात्मक रेटिंग दी जाएगी, जिससे निवेशकों के लिए फैसला लेना आसान होगा। इसका मतलब था कि अगर किसी देश की सॉवरिन रेटिंग स्थिर रहती है और अन्य देशों की रेटिंग में इजाफा हुआ है, तो उस देश का क्रिस घटेगा। बसु ने क्रिस को तैयार करने में मदद की। बसु की योजना इसे नियमित अंतराल पर जारी करने की थी, जिससे निवेशक ज्यादा बेहतर फैसले ले सकें। उन्हें उम्मीद थी कि इससे देशों को भी प्रभावी तरीके से अपना आकलन करने में मदद मिलेगी।
ये बदलाव कितने टिकाऊ हैं? इस सवाल का जवाब जानने के लिए बसु को अपने पूर्ववर्तियों से बात करनी चाहिए। हालांकि मुमकिन है कि उनकी प्रतिक्रिया सुनने के बाद बसु ज्यादा खुश नहीं दिखे।

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