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सही समय
टी. एन. नाइनन /  March 02, 2012

अब वक्त आ गया है कि सरकार अपने बीते तीन वर्षों के पापों का प्रायश्चित करे। दो सप्ताह से भी कम समय के भीतर बजट पेश किया जाना है। देखना यह होगा कि सरकार उसमें अपनी गलतियों की पहचान कर उनको सुधारने की मनोदशा दिखाती है या नहीं। आर्थिक विकास दर के 6.1 फीसदी तक गिरने में कुप्रबंधन का काफी योगदान है। मुद्रास्फीति का लगातार तीन वर्षों तक 10 फीसदी से ऊपर बने रहना महज संयोग नहीं हो सकता। भारी भरकम राजकोषीय घाटा लोक लुभावन कदमों और ऊर्जा कीमतों पर जरूरी निर्णय नहीं लिए जाने के कारण बढ़ा है। अब उसका स्तर उतना ही है जितना 20 वर्ष पूर्व सुधारों को लागू किए जाने के वक्त था। इसके लिए और भी चीजें जिम्मेदार हैं और अब उनकी गणना का वक्त आ गया है। मसलन प्रत्यक्ष कर संहिता अथवा वस्तु एवं सेवाकर पर सीधा निर्णय लेने में घोर असफलता हाथ लगी और विदेशी मोर्चे पर हमारी नाकामी को चालू खाता घाटे में महसूस किया जा सकता है। कारोबारी मनोदशा भी कुलमिलाकर निराशाजनक बनी हुई है। कारोबारी अपना पैसा बाहर धीमी विकास दर वाले बाजारों में लगा रहे हैं जबकि घरेलू स्तर पर निवेश का सूखा पड़ा हुआ है। कोयले की आपूर्ति और बिजली क्षेत्र में वित्तीय सहायता की समस्या बनी हुई है। कारोबार के प्रतिकूल माहौल बनाने में आवेग में काम करने वाले कर अधिकारियों और क्षेत्रीय नियामकों के साथ-साथ विदेशी निवेशकों के साथ मनमौजी से किया गया व्यवहार भी जिम्मेदार है। इसके अलावा भूमि अधिग्रहण तथा खनन अधिकार पर बना गतिरोध, विशेष आर्थिक क्षेत्र के मसले पर नियमों को पलटना भी इसके कारण है। इन सबसे बढ़कर राजनेताओं और कारोबारियों की सांठगांठ वाला विकृत पूंजीवाद उफान पर है। ऐसे तमाम कारणों तथा कुछ अन्य विफलताओं ने अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। हमारी अर्थव्यवस्था जिस ऊंचाई पर थी, उस पर वापसी का कोई आसान रास्ता नहीं है लेकिन गिरावट को रोका जाना चाहिए और वापसी का सफर निश्चित तौर पर शुरू किया जाना चाहिए।
अगला वर्ष चुनावों के ऐन पहले वाला साल होगा, जाहिर है वह उपचारात्मक उपायों के लिए माकूल वक्त नहीं होगा। कुछ कदम प्रशासनिक भी होंगे और उनका बजट से कोई लेनादेना नहीं होगा लेकिन वित्त मंत्री अपने बजट भाषण के जरिए उन क्षेत्रों की प्राथमिकता का उल्लेख तो कर ही सकते हैं जिनमें कदम उठाए जाने की जरूरत है। वह इनके क्रियान्वयन के तरीके का उल्लेख भी कर सकते हैं। अब तक सरकारी प्रवक्ता विकास और मुद्रास्फीति संबंधी पूर्वानुमानों के मामले में काफी आशावादी रहे हैं और अगर वे इस संबंध में स्वीकारोक्ति कर लें कि कारोबारियों के मोहभंग की पर्याप्त वजह मौजूद थी और इससे सबक लिए गए हैं तो यह भी मददगार साबित होगा। महत्त्वपूर्ण बात है दिशा बदलने का संकेत करना क्योंकि आत्मविश्वास को बहाल करना होगा।
थोड़ा विशिष्टï होकर बात करें तो कर के मोर्चे पर वह सेनवैट को 10 फीसदी बढ़ाकर दोबारा 12 फीसदी कर सकते हैं और सेवा कर को सार्वभौमिक कर सकते हैं। इन दोनों कदमों से राजस्व को गति मिलेगी। खर्च की बात करें तो बेतहाशा सब्सिडी पर लगाम लगानी होगी जिसका मतलब हागा पेट्रोलियम उत्पादों और उर्वरक के मूल्य में इजाफा किया जाना। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सरकार को नई खर्च योजनाओं पर तब तक रोक लगा देनी चाहिए जब तक राजकोषीय स्थिति दुरुस्त नहीं हो जाती। इसके अलावा उसे लक्षित नकद सब्सिडी के लिए आधार योजना के साथ आगे बढऩा चाहिए क्योंकि सरकार द्वारा अपनाया जाने वाला तरीका अब पुराना पड़ चुका है और  वह इस काम को समुचित ढंग से अंजाम देने में भी सक्षम नहीं है। इतना ही नहीं इसमें भ्रष्टïाचार के कारण सही लोगों तक लाभ पहुंच भी नहीं पाता। वित्त मंत्री सब्सिडी के अधिकतम स्तर की कानूनी सीमा तय करने की पेशकश भी कर सकते हैं, जिसके लिए बजट में प्रावधान किया जाएगा। यह राशि कर राजस्व अथवा जीडीपी के प्रतिशत में हो सकती है। ये सारे कदम उठाने के लिए उस साहस और यकीन की आवश्यकता होगी जो पिछले तीन वर्षों से नदारद है। 

Keyword: Budget, Economic Development, Fiscal Deficit, Inflation,
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