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सरकारी बनाम अ-सरकारी
श्रीलता मेनन /  February 28, 2012

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले सप्ताह यह संदेह जाहिर किया कि गैर सरकारी संगठन(एनजीओ) विदेशी एजेंडा पर काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री के इस आशय के वक्तव्य के बाद एक ओर देशभर में ये संगठन एकजुट हो गए जबकि दूसरी ओर सरकार के भीतर इस पर अलग-अलग स्वर सुनाई दे रहे हैं। प्रधानमंत्री ने कहा था कि दूसरे देशों से फंड पाने वाले एनजीओ परमाणु उद्यमों और जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनुसंधान में रोड़ा डालने के लिए विदेशी एजेंडा पर चल रहे हैं।
प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर गैर लाभकारी संगठनों ने ही आपत्ति नहीं की है बल्कि ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश की ओर से भी इस पर असहमति के स्वर सुनाई पड़े हैं। हालांकि रमेश ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्होंने एनजीओ के प्रभाव में आकर बीटी बैगन पर रोक नहीं लगाई है। उनका कहना था कि उन्होंने राज्यों, वैज्ञानिकों और लोगों के विचारों को ध्यान में रखकर ही यह फैसला किया।
इन टिप्पणियों से सरकार और सिविल सोसाइटी के बीच एक बड़ा फासला बन रहा है और देश के प्रशासन के बीच प्रमुख मुद्दों पर मतभेद जगजाहिर हो रहे हैं। ऐसा लगता है कि सरकार का एक हिस्सा एनजीओ की असहमति को गंभीरता से ले रहा है जबकि कई सक्रिय कार्यकर्ता राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् का हिस्सा हैं। वहीं सरकार का दूसरा धड़ा जिसका नेतृत्व खुद प्रधानमंत्री कर रहे हैं, ऐसे संगठनों को विकास की योजनाओं में बाधा डालने के लिए आड़े हाथों ले रहे हैं।
केरल की कंपनी 'थानल' ने रमेश का बचाव करते हुए प्रधानमंत्री पर हमला बोला है। कोएलिशन फॉर जीएम फ्री इंडिया (400 एनजीओ का एक नेटवर्क) के संयोजक श्रीधर राधाकृष्णन का कहना है कि एनजीओ के खिलाफ यह टिप्पणी महज एक चाल है ताकि परमाणु संयंत्रों और संवर्धित (जीएम) फसलों के मसले को हल्के में लिया जाए। उनका कहना है, 'जीएम पर प्रधानमंत्री ने एक बड़ी प्रमाणों वाली संस्था बना रखी है जिसमें वैज्ञानिकों द्वारा दिए गए सबूत भी शामिल हैं। इन वैज्ञानिकों में एम एस स्वामीनाथन भी शामिल हैं।' संसद की स्थायी समिति ने 5,000 याचियों की बातों पर ध्यान दिया है। इस समिति को जल्द ही संवर्धित फसलों पर एक रिपोर्ट देनी है। राधाकृष्णन का कहना है कि एक सार्वजनिक चर्चा की वजह से ही जयराम ने जीएम परीक्षण को टाल दिया है और स्थायी समिति का गठन किया गया है।
राधाकृष्णन का कहना है कि एनजीओ की फंडिग एक सरकारी नीति है। उनका कहना है, 'यह आपातकाल के दौरान भी था। यह कुछ ऐसा ही है कि किसानों की हत्या के लिए विदेशी फंडों पर आरोप लगाया जा रहा हो। अगर एक एनजीओ इन आत्महत्याओं से जुड़े आंकड़े दे रहा है तो सरकार को उस संगठन पर निशाना साधना चाहिए या आत्महत्याएं बंद करानी चाहिए?'  वह पूछते हैं, 'अगर मॉनसैंटो बॉयो पाइरेसी में शामिल है और एक एनजीओ इस मसले को राज्य जैवविविधता बोर्ड के पास ले जाता है तो क्या सरकार को उसी पर आरोप लगाना चाहिए जिसने याचिका दाखिल की है।'
वन अधिकार के कार्यकर्ता शंकर गोपालकृष्णन का कहना है कि एनजीओ एस पी उदय कुमार का समर्थन करता है क्योंकि वह आम लोगों के हक में कुडनकु लम परियोजना का विरोध कर रहे हैं। जनजातियों और स्थानीय निवासियों के हितों के लिए आंदोलन करने वाले एक स्वयंसेवक जिन्होंने उड़ीसा और दूसरे राज्यों के जंगल में खनन परियोजना का विरोध किया है, का कहना है, 'केवल पैसे देकर ही लोगों को अपनी जिंदगी में जोखिम लेने के लिए प्रेरित नहीं किया जा सकता है।'
एनजीओ का दावा है कि प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी केवल मुद्दों पर लीपापोती करने के लिए है और इससे सरकार के दोहरे चरित्र का अंदाजा मिलता है। इन एनजीओ में से एक का कहना है, 'हम एक हैं, चाहे वह परमाणु संयंत्रों का विरोध हो, विकास की परियोजनाओं से स्थानीय लोगों की जिंदगी पर पड़ रहे विपरीत असर या फिर संवर्धित फसल का विरोध हो।'
कार्यकर्ता साबु जॉर्ज, कन्या भ्रूणहत्या के खिलाफ किए जा रहे आंदोलन का हिस्सा रहे हैं और उन्होंने कथित नक्सल कार्यकर्ता विनायक सेन की रिहाई को लेकर भी प्रदर्शन किया था। उनका दावा है कि सरकार इन मसलों पर जिस तरह का रवैया अपनाए हुए है इससे देश में गैर-कानूनी कामों को बढ़ावा मिलेगा। उनका कहना है, 'यह नैतिकता का सवाल है। समाज में हाशिये पर जी रहे लोगों के अधिकारों की मांग भी सुनी जानी चाहिए। अगर सरकार एनजीओ पर आरोप लगाकर इन आवाजों को दबाना चाहती है तो अराजकता फै लेगी।' जॉर्ज कहते हैं, 'सरकार एफडीआई और विदेशी तकनीक चाहती है वहीं दूसरी ओर इनका इरादा है कि अन्याय सह रहे गरीब लोगों को एनजीओ (विदेशी समर्थन के बिना और साथ) से मदद नहीं मिलनी चाहिए।' सामाजिक कार्यकर्ता अमेरिका के अलावा अन्य देशों में परमाणु विरोध की ओर इशारा करते हैं। उनका कहना है कि कई दशकों तक अमेरिकियों ने इस मुद्दे के विरोध और असहमति का सम्मान किया और देश में ऐसे किसी भी संयंत्र के न बनने की इजाजत दी। शंकर कहते हैं, 'लेकिन अब अमेरिका चाहता है कि भारत में निवेश कर रही कंपनियों के लिए लाइबलिटी कैप हो। लेकिन हमारी सरकार ने नाभिकीय कानून में उन मांगों को पूरा करने के लिए ढीला रवैया अपनाया।'
तमिलनाडु के एक व्यक्ति का कहना है, 'जब लोग विरोध करते हैं तब कहा जाता है कि परमाणु संयंत्र सुरक्षित हैं। लेकिन जब कंपनियां किसी जोखिम की स्थिति में जिम्मेदारी से बचती हैं तो सरकार उनकी जिम्मेदारी की सीमा (लाइबलिटी कैप )तय करती है। यह कैसा दोहरा मानक है।' सरकार ने आम जनता के आंदोलनों के खिलाफ अपना मोर्चा खोल दिया है। पिछले साल सरकार ने विदेशी अंशदान नियमन कानून में संशोधन किया ताकि कथित तौर पर सभी एनजीओ को विदेशी पूंजी की मदद न मिले। हाल ही में हेल्पेज इंडिया और एकलव्य जैसे एनजीओ को आयकर नोटिस भी भेजा गया।
मानवाधिकार, भूमि विस्थापन, बॉयोटेक्नोलॉजी और परमाणु संयंत्र जैसे मसलों पर कई बड़े आंदोलन नियमित तौर पर हो रहे हैं। हाल के दिनों में ऐसा आंदोलन तब देखा गया जब डॉ सेन को माओवादियों की मदद करने के आरोप में करीब 2 साल तक रायपुर जेल में रखा गया था। यह अभियान राज्य से बढ़कर पूरे देश में फैला हालांकि इस आंदोलन के वित्तीय स्रोत का रहस्य बरकरार है। बीटी बैगन के खिलाफ आंदोलन भी व्यापक था। ऐसे सभी आंदोलनों का नेतृत्व किसी न किसी एनजीओ ने ही किया। इस कड़ी में हाल का आखिरी आंदोलन भ्रष्टïाचार के खिलाफ छेड़ा गया था। आलोचना उन वन कार्यकर्ताओं को भी झेलनी पड़ी जो ग्रामीणों के साथ खड़े होकर विस्थापन के अलावा उड़ीसा और झारखंड में संसाधनों की क्षति के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे।
हालांकि कुछ एनजीओ का कहना है कि सरकार की कुछ चिंताएं सही हैं। एक कार्यकर्ता कहते हैं, 'लेकिन विदेशी साझेदारी या स्वामित्व वाले ऊर्जा संयंत्रों/खानों के बारे में सरकार क्यों नहीं कुछ कहती जो विरोधों का केंद्र रही है?'
पीआरआईए के संस्थापक राजेश टंडन का कहना है, 'एनजीओ को मिली पूंजी भले ही विदेशी हो लेकिन लोग तो हमारे समाज के ही हैं? ऊर्जा संयंत्र भी एक विदेशी इकाई है। कुडनकुलम में रूसी संयंत्र है। ऐसे में आप किसके हितों को तरजीह दे रहे हैं?' टंडन कहते हैं कि पोस्को एक विदेशी कंपनी है और आंदोलन करने वाले लोग उड़ीसा के गांवों से जुड़े हैं। वह कहते हैं, 'अगर कोई विदेशी एजेंसी उनके विरोध के लिए फंड भी दे रही है तो लोग बेमन से जान जोखिम में डालकर विरोध नहीं करेंगे। सरकार उनकी बात सुनेगी तो वे विरोध नहीं करेंगे।' एनजीओ साइबर दुनिया से भी जुड़कर अपनी ताकत को बुलंद कर रही हैं।
नैशनल फिशवर्कस फोरम के प्रमुख थॉमस कोचेरी का कहना है, 'प्रधानमंत्री का कहना है कि ये एनजीओ देश में परमाणु ऊर्जा की आत्मनिर्भरता के खिलाफ हैं। वर्ष 1962 से ही परमाणु ऊर्जा कानून के बनने के बाद आखिर भारत ने कितनी परमाणु ऊर्जा का उत्पादन किया है? उस वक्त से लेकर अब तक देश में परमाणु ऊर्जा संस्थानों में कुल कितना निवेश किया गया है? आखिर किसने देश को परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने से रोका था?'

Keyword: NGO, PM, Rural Development minister,
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