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मरहम बनने वाली हल्दी बनी उत्पादकों के लिए नासूर
श्रीलता मेनन /  January 03, 2012

जमीन पर फैली हल्दी की जड़ें सोने की शिराओं का सा आभास कराती हैं, जो उत्पादकों को उनके पसीने का मोल समझाती हैं। लेकिन बीता साल तमिलनाडु के इरोड में 15 हल्दी उत्पादकों के लिए बड़ा भारी साबित हुआ। देवशिखामणि जैसे किसान जो इरोड में अपनी सात एकड़ जमीन पर हर साल हल्दी उगाते हैं, उनके लिए बीता साल बेहद दुखदायी साबित हुआ। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि हल्दी के उत्पादन में 40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है लेकिन कीमतें इतनी तेजी से नीचे गिरी हैं, जितनी पहले कभी नहीं गिरीं।
हल्दी आमतौर पर किसानों को हलकान करती आई है। देसी नुस्खे में हल्दी जख्म पर मरहम का काम करती है लेकिन यहां तो एकदम उल्टा हो रहा है। जो किसान हल्दी उगा रहे हैं, उनके लिए ही यह नासूर बन गई है। हल्दी का उत्पादन पांच राज्यों के कुछ जिलों तक ही सीमित हो गया है जो वैश्विक उत्पादन का 78 फीसदी तक उत्पादन करते हैं। हालांकि कुछ अफ्रीकी और एशियाई देशों से आयात बहुत ज्यादा खतरे की बात भी नहीं है। साल 2010 में हल्दी के भाव आश्चर्यजनक रूप से उछलकर 18,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गए जो उसके सामान्य भाव से दोगुना स्तर था। हालांकि वर्ष 2011 के दौरान इसके भाव महज 3,500 रुपये प्रति क्विंटल के दायरे में रहे।
देवशिखामणि ने करीब 140 क्विंटल से अधिक हल्दी घर पर ही जमा करके रखी और इंतजार करते रहे कि कब दाम कुछ बेहतर हों। लेकिन सभी इंतजार नहीं कर सके। यहां तक कि वह भी लंबा इंतजार नहीं कर सके। निराशा साफ तौर पर नजर आने लगी। दक्षिण भारतीय किसान आंदोलन समन्वय समिति के एस कान्नाईयन का कहना है कि अब किसानों को लोभी कमीशन एजेंटों के यहां फसल गिरवी रखकर 30 फीसदी तक की ऊंची दरों पर कर्ज लेना पड़ रहा है। इससे उन्हें भंडारण में मदद मिल रही है और साथ ही पैसा भी मिल रहा है। कान्नाईयन यह भी कहते हैं कि उन्हें एजेंटों द्वारा बताई गई कम कीमत पर फसल बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है। तमिलनाडु के इरोड, कोयंबटूर, सेलम और करूर में कमोबेश ऐसे ही हालात हैं। बाहरी लोग तो इरोड में भंडारण करने से ही बच रहे हैं। कान्नाईयन का कहना है कि उन्हें जो भी औने-पौने दाम मिल रहे हैं, वे उसी भाव पर फसल बेच रहे हैं।
किसानों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन सरकार फिर भी उन तक कोई राहत नहीं पहुंचा पा रही है। मसाला बोर्ड हल्दी और अदरक को लेकर अपने हाथ झाड़ रहा है और उसका कहना है कि राज्य के कृषि विभाग को इसमें दखल देना चाहिए। बोर्ड स्वीकार करता है कि कटाई के बाद की गतिविधियां उसके अधिकार क्षेत्र में आती हैं लेकिन उसके पास कोई कारगर 'योजना' नहीं है और ऐसे में वह कुछ नहीं कर सकता। मसाला बोर्ड के सचिव सुरेश कुमार का कहना है, 'हम पूर्व में उन्हें हल्दी बॉयलर्स मुहैया करा चुके हैं। अब हम अगली पंचवर्षीय योजना के तहत प्रसंस्करण और उत्पाद विकास के लिए नई योजनाएं तैयार कर रहे हैं।' कम कीमत के मौजूदा संकट पर कुमार कहते हैं कि बोर्ड नए बाजारों में निर्यात की संभावनाएं तलाशेगा। लेकिन उसमें लंबा इंतजार ही करना होगा।
पिछले महीने देवशिखामणि और उड़ीसा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश के उनके जैसे दूसरे किसानों ने महाराष्ट्र के सांगली में बैठक कर राष्ट्रीय हल्दी उत्पादक संघ के गठन पर विचार किया। वे जिंस के भाव तय करने में अपनी आवाज को भी शामिल कराना चाहते हैं। वे जनवरी में फिर बैठक करने जा रहे हैं जिसमें नई कीमत का ऐलान किया जाएगा जो एमएस स्वामीनाथन के लागत कीमत और 50 फीसदी मुनाफे के सिद्घांत पर आधारित होगी। जब कोई खरीद और समर्थन मूल्य अस्तित्व में नहीं है तब किसानों को मामला
अपने हाथ में लेना ही ज्यादा मुनासिब लगा।
संघ का कहना है कि उन्हें वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया से आश्वासन मिला है कि सरकार आयात पर पाबंदी लगाएगी। लेकिन कन्नाईयन को डर इस बात का है कि यदि सरकार ने दखल नहीं दिया तो हालात बद से बदतर हो जाएंगे। उनका कहना है कि हल्दी उत्पादक भी शायद वही राह अपनाएं जो वायनाड में अदरक किसानों ने अपनाई। वर्ष 2011 में वायनाड में अदरक किसानों की आत्महत्या के 10 मामले सामने आए।
हल्दी उत्पादन में अग्रणी जिलों के तकरीबन 15 लाख किसानों को अपने उत्पादन पर बैंक कर्ज और भंडारण के लिए सुविधाओं की दरकार है। जब किसान संघों ने हाल में कृषि मंत्री शरद पवार से मुलाकात की तो उन्होंने पवार से हल्दी उत्पादकों की भंडारण और प्रसंस्करण की आवश्यकताओं की समीक्षा करने की बात की। कन्नाईयन का कहना है कि अभी तक कोई प्रगति नहीं हुई है। हालांकि मसाला एवं कृषि विभाग ने अदरक, धनिया और हल्दी उत्पादकों को ढाढस बंधाया है लेकिन हल्दी उत्पादक कम से कम नाग देवता का तो आह्वान कर सकते हैं और उम्मीद कर सकते हैं कि ईश्वर को चढ़ाने वाला भोजन कभी पर्याप्त नहीं हो सकता। न ही उनका दखल।

Keyword: food crop farmer, turmeric,
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