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मणिपुर: वो सुबह कब आएगी?
अक्षत कौशल /  December 29, 2011

मणिपुर के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग अहम हैं। आप इन्हें मणिपुर की जीवनरेखा भी कह सकते है। रेल संपर्क न होने की वजह से ये राजमार्ग ही इस राज्य को भारत के मुख्य भाग से जोड़ते हैं। पिछले दशक में कई गुप्त संगठनों और जनजातीय समूहों ने सरकार से अपनी मांग पर मंजूरी का ठप्पा लगवाने के लिए इन राजमार्गों को अवरुद्घ किया है। पिछले साल राजमार्गों का जाम चार महीने से ज्यादा वक्त तक चला। राजमार्ग पर नाकेबंदी करने की पहली वजह राज्य की स्वायत्त परिषद् के कानून में संशोधन से जुड़ी थी। दूसरा विवाद नैशनल सोशलिस्ट काउंसिल नगालिम के महासचिव टी मुवैया के मणिपुर के दौर से बनने लगा। उच्चतम न्यायालय की आलोचना और अब जब विधानसभा चुनाव में एक महीने से भी कम वक्त बचा है तो मणिपुर सरकार ने सक्रियता दिखानी शुरू कर दी है। सरकार ऐसी नाकेबंदी को खत्म करने के लिए तात्कालिक कदम भी उठा रही है। हालांकि दिलचस्प बात यह है कि जल्द ही किसी दूसरी नाकेबंदी की संभावनाओं से जुड़ी अपनी इस आशंका को सरकार स्वीकार करती है।
क्या है विकल्प
राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) 39 के जरिये मणिपुर से ज्यादातर सामान आता-जाता रहता है जो नगालैंड में दिमापुर से होकर मणिपुर और असम को जोड़ता है। इस राजमार्ग का एक बड़ा हिस्सा नगालैंड से होकर गुजरता है। मणिपुर पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक इस इलाके में भूमिगत नगा समूह से सहानुभूति रखने वाले ज्यादातर लोग हैं। मणिपुर के दूसरे वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों का दावा है कि एनएच 39 के जरिये मणिपुर जाने वाले सभी ट्रकों से जबरन वसूली की जाती है।
मणिपुर सरकार के एक प्रमुख अधिकारी का दावा है, 'दिमापुर से मणिपुर तक जाने वाले सभी ट्रकों को 10,000-20,000 रुपये का भुगतान करना पड़ता है जो उनसे जबरन वसूला जाता है। आखिर यह पैसा कहां जाता है? इससे मणिपुर के खिलाफ बगावत और बढ़ती है।' सरकार का कहना है कि इसे खत्म करने के लिए सरकार के पास एक वैकल्पिक योजना है जिसके जरिये वह एनएच 39 के इस्तेमाल को पूरी तरह कम करने और एनएच 53 के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की कोशिश करेगी।
हालांकि आमतौर पर परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोग इस रास्ते को नजरअंदाज करते हैं क्योंकि यह सड़क खराब है और यह आर्थिक रूप से व्यावहारिक भी नहीं है। मणिपुर के जरिये असम जाने के लिए इस राजमार्ग के कई फायदे हैं। सरकार का कहना है कि इस सड़क की मरम्मत का काम शुरू हो चुका है और राज्य पुलिस ने इस राजमार्ग से जाने वाले सभी ट्रकों को सेना सुरक्षा की गारंटी दी। राज्य पुलिस का दावा है कि जबरदस्ती पूंजी वसूली के स्रोत को खत्म कर भूमिगत समूहों तक पूंजी की आपूर्ति में कटौती करना है। हालांकि मणिपुर में एक प्रमुख पुलिस अधिकारी का कहना है, 'हम मणिपुर में सुरक्षा की गारंटी दे सकते हैं। लेकिन हम दिमापुर में जबरदस्ती वसूली नहीं रोक सकते हैं क्योंकि यह मणिपुर पुलिस क्षेत्र के दायरे से बाहर है। दूसरे राज्यमार्ग की ओर जाने के लिए यह जरूरी होगा कि अतिवादियों के खिलाफ जारी लड़ाई जीती जाए।'इंफाल फ्री प्रेस के संपादक प्रदीप फनजोबम का कहना है, 'ज्यादातर ट्रकों से जबरदस्ती वसूली की घटनाएं दिमापुर में ही होती हैं। लेकिन राजमार्ग में बदलाव में कुछ वक्त लगेगा क्योंकि सड़क की अच्छी मरम्मत की जरूरत है।' पूर्व गृह सचिव जी के पिल्लई का पूर्वोत्तर राज्य में काम करने का लंबा अनुभव है। उनका कहना है, 'मणिपुर की सरकार के लक्ष्य लंबी अवधि के हो सकते हैं लेकिन वक्त की जरूरत यह है कि एनएच 39 पर ट्रकों का सुरक्षित आवागमन हो।'
राजमार्ग के अलावा मणिपुर की सरकार जिरीबाम और इंफाल के बीच की रेलवे लाइन के निर्माण के बारे में सोच रही है। इस रेलवे लाइन के निर्माण का काम वर्ष 2016 तक पूरा हो जाएगा जो सिल्चर के रास्ते मणिपुर को देश के बाकी हिस्से से जोड़ेगी। यह रेलवे लाइन ट्रांस एशिया रेलवे नेटवर्क का हिस्सा है। हालांकि यूनाइटेड नगा परिषद् ने दावा किया है कि दो सालों तक रेलवे लाइन के काम को रोका है। सरकार गुवाहाटी से इंफाल तक एक तेल पाइपलाइन तैयार करने की योजना बना रही है। खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री एन वीरेन सिंह का कहना है, 'हम भविष्य में असम और मणिपुर को जोड़ते हुए एक पेट्रोल पाइपलाइन बनाना चाहते हैं।'
कुछ पल की शांति?
पूर्वोत्तर के सभी लोग इस बात को लेकर अपनी सहमति जता रहे हैं कि मौजूदा नाकेबंदी का खत्म होना भी क्षणिक ही है। उनका कहना है कि सशस्त्र सैन्य बल विशेषाधिकार अधिनियम (एएफएसपीए) को रद्द करने के मुकाबले इस क्षेत्र में शांति का माहौल बनना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। ग्रेटर नगालैंड की मांग का हल भी निकालना पड़ेगा। यूनाइटेड नगा काउंसिल (यूएनसी) और दूसरे नगा समूह काफी लंबे समय से एक अलग राज्य के निर्माण की मांग कर रहे हैं जिसमें मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और म्यांमार के नगा बहुल क्षेत्र शामिल हों। वैसे मौजूदा आर्थिक नाकेबंदी की वजह यह प्रतिरोध है कि नगा सेनापति जिले को नगालैंड का हिस्सा समझते हैं। उनका मानना है कि जिले के विभाजन की कुकियों की मांग दरअसल नगा समूहों के खिलाफ यह एक साजिश है ताकि उनके अभियान को कमजोर बनाया जा सके।  यूएनसी का कहना है कि वह एक अलग राज्य की मांग को पूरा करने के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार हैं। यूएनसी के सूचना एवं प्रचार सचिव एस मिलन का कहना है, 'औपनिवेशिक शासन के दौरान नगाओं की जमीन का विभाजन बिना उनकी जानकारी के कर दिया गया। हमारी जनजाति के लोग बर्मा, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और नगालैंड में हैं। नगाओं की युवा पीढ़ी के ऊपर यह जिम्मेदारी है कि वे अपने जनजाति के इतिहास को संरक्षित करें। नगाओं से सलाह लिए बिना सदर हिल्स को एक जिले में तब्दील नहीं किया जाएगा।'

Keyword: manipur, national highway,
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