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सहभागी लोकतंत्र बन रहा है नया मंत्र
दीपक लाल /  December 19, 2011

राजनीतिक दलों के साथ हाल में हुई अन्ना हजारे पक्ष की एक बैठक में हजारे पक्ष के एक सदस्य ने दावा किया कि 'नागरिक समाज' का सदस्य होने के नाते वे संसद के लिए विधायी कानून पेश करेंगे और अपने लोकपाल आंदोलन के जरिये दबाव बनाएंगे कि संसद उन्हें स्वीकार करे। इस बीच हजारे ने यह धमकी भी दी है कि यदि संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में उनकी मर्जी का लोकपाल विधेयक पारित नहीं किया गया तो वह अपने समर्थकों के साथ सोनिया गांधी, राहुल गांधी और लोकपाल का विरोध करने वाले हर एक सांसद के घर के बाहर धरना और सांकेतिक गिरफ्तारियां देंगे। हम इन दावों का क्या करें, और देश कैसे इस स्थिति में पहुंचा?
देसी और विदेशी गैर सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) के कार्यकर्ताओं का दावा है कि चूंकि वे 'नागरिक समाज' की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं इस नाते विधिनिर्माता उनकी आकांक्षाओं का अवश्य ध्यान रखें। लेकिन यह दावा स्पष्टत: गलत लगता है। किसी भी देश की सबसे बड़ी खासियत उसकी प्रतिरोधी शक्ति का एकाधिकार होती है। लोकतंत्रों में यह शक्ति चुनी हुई सरकारों को हासिल होती है। केवल चुनी हुई सरकार ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के लिए जिम्मेदार होती है। किसी निजी हित की सीधे तौर पर जबरन पैरवी करना किसी संवैधानिक लोकतंत्र की भावना को कितना आहत करता है। यदि इन कार्यकर्ताओं का 'नागरिक समाज' की नुमाइंदगी करने का दावा सच होता तो उनके विचार के समर्थक केंद्रीय सत्ता की कमान संभाल रहे होते।
इन एनजीओ के दावों और उनकी लोकलुभावन छवि के स्रोत के पीछे अंतर्निहित सिद्घांत सहभागी लोकतंत्र की सर्वथा उदारवादी अवधारणा ही है। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने उदारवादी लोकतंत्र का जो पश्चिमी प्रतिरूप अंगीकार किया है वह जनप्रतिनिधि लोकतंत्र पर आधारित है। अमेरिकी लोकतंत्र के संस्थापकों से लेकर इमैनुअल कांट जैसे उदारवादी विचारकों तक का मानना है कि ग्रीक शहर-राज्य प्रतिरूप पर आधारित प्रत्यक्ष या सहभागी लोकतंत्र की जड़ें काफी अनुदार होती हैं।
लोकलुभावन दबाव और बहुसंख्यकों की बदलती आकांक्षाएं अल्पसंख्यकों के लिए विषाद का विषय बन सकती हैं। जरूरी नहीं कि व्यापक लोकप्रिय सहभागिता आजादी को नुकसान पहुंचाती है। इसलिए महान उदार विचारकों ने कई फायदों और नुकसानों का आकलन कर अप्रत्यक्ष प्रतिनिधि लोकतंत्र की वकालत की है ताकि बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों का दमन करने से रोका जा सके। जेम्स मेडिसन और इमैनुअल कांट दोनों ने जनप्रतिनिधि सरकारों पर आधारित अपने वरीय राजनीतिक तंत्र को लोकतंत्र के बजाय गणतंत्र कहना ज्यादा मुनासिब समझा। जनप्रतिनिधि लोकतंत्र में नागरिक सीधे-सीधे कानून तैयार करने और उसे मूर्त रूप देने के बजाय अपने कानून बनाने के लिए अपने जनप्रतिनिधियों को चुनते हैं। जनप्रतिनिधि लोकतंत्र के आदर्श आमतौर पर चलन में नहीं अपनाए जाते-इसका बेहतर निष्कर्ष आयरिश विद्वान राजनेता एडमंड बुर्के ने ब्रिस्टल में दिए एक भाषण में निकाला, 'आपके जनप्रतिनिधि आपके आभारी हैं, केवल उनके वर्ग के लोग ही नहीं बल्कि उसके फैसले भी और यदि वह आपकी राय के हिसाब से अपने पद का त्याग कर दे तो वह आपकी सेवा के बजाय आपके साथ विश्वासघात करेगा। वास्तव में आप एक सदस्य चुनते हैं लेकिन जब आप उसे चुनते हैं तो वह ब्रिस्टल का नहीं बल्कि संसद का सदस्य होता है।'
हालांकि इसे कोई नहीं नकार सकता कि जनप्रतिनिधि लोकतंत्र के ब्रिटेन और अमेरिका जैसे मजबूत गढ़ों में भी सहभागी लोकतंत्र की ओर झुकाव बढ़ा है, साथ ही राजनीतिक दलों के समर्थन में कमी आई है और जन भावनाओं को प्रदर्शित करने के लिए 'लक्षित समूहों' पर भरोसा बढ़ा है, यह ऐसा चलन है जिसे बुर्के ने निशाने पर लिया। कैलिफोर्निया की राजनीति से बेहतर इसकी उम्दा मिसाल कहीं और मिले जहां कराधान और सार्वजनिक व्यय से जुड़े विधायी कामकाज चुने हुए जनप्रतिनिधियों के बजाय जनमत संग्रहों से किए जाने का चलन बढ़ रहा है। व्यापक पड़ताल और जवाबदेही के लिए विधायी कार्य को बनावटी रूप से अधिक खोलने की प्रक्रिया ने विरोधाभासी तरीके से दबाव समूहों द्वारा प्रभावित होने की गुंजाइश अधिक बढ़ा दी है।
कुछ विद्वानों का मत है कि जिन दबाव समूहों को पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध होते हैं वे लगातार घरेलू राजनीति को अपने हिसाब से प्रभावित करने लगतेे हैं। लोगों के लिए रोजाना अपने जनप्रतिनिधि के कामकाज पर निगाह रखना और विभिन्न कानूनों से रूबरू होने के लिए वक्त नहीं है जबकि बेहतर रूप संगठित दबाव समूह जिनका काम का दायरा बेहद छोटा होता है, सरकार को अपनी मनमर्जी के मुताबिक काम करने पर मजबूर कर सकते हैं। बहुसंख्यक राज के बजाय ऐसा सहभागी लोकतंत्र सीमित दायरे का शासन मुहैया कराता है। 'नागरिक समाज' के नाम पर हजारे आंदोलन से भी ऐसी ही डरावनी आशंकाएं उपज रही हैं।
लेकिन, यह स्थिति कैसे बनी? गड़बड़ी की जड़ें कांग्रेस अध्यक्ष की अगुआई में बनी राष्ट्रीय विकास परिषद (एनएसी) के गठन से जुड़ी हैं जो एनजीओ कार्यकर्ताओं की ऐसी संस्था है जिसने न केवल सरकार में बैठे सुधारकों का मुखर विरोध किया बल्कि एक चुनी हुई सरकार के वैधानिक कामकाज के रास्ते में भी बाधा उत्पन्न की। यह तर्क दिया जा सकता है कि एनएसी महज कांग्रेस अध्यक्ष का 'थिंक टैंक' है बिलकुल ब्रिटेन में कंजरवेटिव शोध विभाग और उसके जैसी लेबर पार्टी की तरह। लेकिन जब भी उनमें से कोई भी पार्टी सत्ता में होती है तब वे किसी भी अन्य थिंक टैंक के माफिक जन नीतियों को शायद प्रभावित कर सकते हैं लेकिन वे खुद ही कानून बनाने नहीं बैठ जाते जिसे बनाने का जिम्मा सरकार पर
होता है।
एनएसी ने 'नागरिक समाज' के कार्यकर्ताओं के लिए जो सर्वथा अनुचित राह खोली है, ऐसे में सरकार के लिए हजारे आंदोलन में 'नागरिक समाज' के दूसरे कार्यकर्ताओं पर नकेल कसना मुश्किल हो गया। इससे अधिक अहिंसक होते हुए भी उनकी मर्जी के लोकपाल का विरोध करने वाले सांसदों के घरों के बाहर धरना प्रदर्शन करने की उनकी धमकी भी उससे कम जबरन नहीं कि पशु अधिकारों की मुहिम चलाने वाले उन दवा कंपनियों के अंशभागियों को निजी तौर पर जाकर परेशान करें जो कंपनियां दवाएं बनाने में पशुओं का इस्तेमाल करती हैं। विदेशी औपनिवेशिक शक्तियों को देश से बाहर खदेडऩे और यहां तक कि आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक मूल्यों की लड़ाई और स्वयंभू 'नागरिक समाज' के लोगों द्वारा अपनी मर्जी के कानून बनाने की मांग को लेकर किए जाने वाले सत्याग्रह में बड़ा अंतर है।
उन सब पर अवश्य ही काबू पाना होगा। इसकी बढिय़ा शुरुआत एनएसी को समाप्त कर की जा सकती जो यह संकेत भी देगा कि अब सरकार किसी अन्य जनप्रतिनिधि लोकतंत्र की तरह खुदमुख्तार होगी। इससे सरकार को हजारे आंदोलन के जरिये बढ़ रहे सहभागी लोकतंत्र के चलन से बचने के लिए भी कारगर रास्ता मिल सकेगा।

Keyword: anna hajare congress,
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