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जीत पक्की करने के लिए जुगत भिड़ाते अजित
आदिति फडणीस /  December 16, 2011

अजित सिंह भारतीय राजनीति में हर किसी को जानते हैं और सभी उनसे भी अच्छी तरह वाकिफ हैं। वजह क्या है? वह तकरीबन हर किसी के पाले में रह चुके हैं-कांग्रेस के साथ, कालातीत हो चुके राष्ट्रीय मोर्चे के साथ और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ। अब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सिंह ने कांग्रेस के साथ एक बार फिर गठजोड़ किया है।
दिलचस्प बात है कि कांग्रेस ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर अपने उम्मीदवारों के नामों का ऐलान कर दिया है। यह इलाका जाटों में अजित सिंह की पैठ और उनके पिता चौधरी चरण सिंह की मजबूत विरासत की वजह से उनका प्रभाव क्षेत्र माना जाता है। उनकी जाति वाले उन्हें अपनी जाति का रहनुमा मानते हैं कि नहीं, यह विवादास्पद सवाल हो सकता है क्योंकि 22 जिलों में फैले इस इलाके में विधानसभा की 125 सीटें आती हैं और 2007 में हुए पिछले चुनाव में सिंह की पार्टी उनमें से महज 10 पर ही जीत पाई थी। लेकिन 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में उनके खाते में 5 सीटें आईं जो यह दर्शाता है कि उत्तर प्रदेश के जाट राज्य की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर एक दलित नेता से आजिज आ चुके हैं और इसे लेकर पछता रहे हैं। अब लगभग तीन साल बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जमीन अधिग्रहण और गन्ने की कीमतों को लेकर उठे विवाद तथा जाट और जाटवों (दलितों) में बढ़ता वैमनस्य यही इशारा करता है कि जाटों में मायावती की बहुजन समाज पार्टी के खिलाफ असंतोष और गहरा ही हुआ है।
लेकिन यह सब बेहद रहस्यमय है। कांग्रेस पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई सीटों पर पहले ही अपने प्रत्याशियों का ऐलान कर चुकी है। जैसे कि उसने शामली से निवर्तमान विधायक पंकज मलिक को फिर से मौका दिया है। यह सीट भारतीय किसान यूनियन का गढ़ है और पूर्व में इस पर सिंह परिवार का भी कब्जा रहा है। अलीगढ़, मेरठ और अतरौली भी सिंह के प्रभाव वाले इलाके हैं। लेकिन इन सभी सीटों के लिए कांग्रेस ने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। अब पार्टी को इन प्रत्याशियों से सिंह की राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के समर्थन में बैठने की अपील करनी होगी। तब स्वाभाविक रूप से उनकी रालोद के समर्थन में उतरने की उम्मीद कम है बल्कि वे उनके खिलाफ पूरा जोर आजमाएंगे। लेकिन यह वही कीमत है जो दुविधा के लिए चुकानी पड़ती है।
साथ ही यह भी बड़ी अबूझ पहेली है कि जब भट्टा-पारसौल गांव में जमीन अधिग्रहण को लेकर हुई नाइंसाफी के खिलाफ आवाज बुलंद कर राहुल गांधी खुद के लिए इतनी लोकप्रियता बटोर चुके थे तब क्यों इन इलाकों को सिंह की पार्टी के हवाले कर दिया गया। निश्चित रूप से वह उनकी मांग करते। कांग्रेस उन्हें ये सीट देती या नहीं, यह एक खुला सवाल होता। लेकिन यह काफी हद तक सच है। अतीत में जाट और मुस्लिम लोकदल के समर्थक रहे हैं। यही वजह है कि कांग्रेस-रालोद गठबंधन पर समाजवादी पार्टी ने गुस्सैल प्रतिक्रिया दी: उसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी संभावनाएं खराब होती नजर आईं। अजित सिंह यह जानते हैं। मार्च 2009 में उन्होंने ऐलान किया था कि वह भाजपा के साथ एक 'अजेय गठजोड़' की कोशिश कर रहे हैं जो केंद्र और उत्तर प्रदेश में सरकार में बदलाव लाने की दिशा में काम करेगा। यह गठजोड़ राजनाथ सिंह ने किया था जो गाजियाबाद से चुनाव लड़ रहे थे जिन्हें अजित सिंह की जरूरत थी। यह गठबंधन जल्द ही टूट गया।
सत्ता की राजनीति वाले समाज में अजित सिंह का मामला प्रतिभा के जाया होने वाला मामला है। भारतीय राजनीति के असल 'कंप्यूटर ब्वॉय' राजीव गांधी नहीं बल्कि अजित सिंह थे। उनके पिता चरण सिंह किसान राजनीति के शिखर पुरुष रहे हैं। अजित सिंह इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए अमेरिका गए और उत्तर प्रदेश की धूल धूसरित राजनीति में आने से पहले तकनीशियन के तौर पर काम कर चुके थे। वह 2001 में कृषि मंत्री बने लेकिन भारतीय कृषि में उनका कोई उल्लेखनीय योगदान नहीं रहा-वह भी ऐसे समय में जब उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी।
बहरहाल राजनीति में तमाम उतार-चढ़ाव (चढ़ाव से ज्यादा उतार) के बावजूद अजित सिंह को श्रेय देना ही होगा कि वह अभी तक खेल में बने हुए हैं। अक्सर वह अपने साथ हुई नाइंसाफी का जिक्र करते हैं। वह कहते हैं, 'इंदिरा गांधी ने राजीव गांधी को एक नेता के तौर पर विकसित किया। यह एक तरह से राजकाज की दीक्षा थी। मैं सॉफ्टवेयर कंपनी शुरू करने के मकसद से भारत आया था। मेरे पिताजी कोमा में चले गए। मैं इकलौता बेटा था। उन्होंने मुझसे कभी भी राजनीति के बारे में बात नहीं की। मैंने खुद फैसला किया कि मुझे राजनीति में आना चाहिए। मेरे पिता चल बसे। जब मुलायम सिंह, बहुगुणा और देवीलाल जैसे मेरे पिता के सहयोगियों ने कहा कि वे मेरा ख्याल रखेंगे। मैंने खुद इसमें कूदने का फैसला किया।'
शुरुआती दिन विश्वासघात और कड़वे अनुभवों भरे रहे जहां ऐसे लोगों से सामना हुआ जो 'आपसे कहते कुछ और करते उसका एकदम उलट।' उन्होंने कई नीतिगत गलतियां कीं और उनके पिता का राजनीतिक आधार उन लोगों के बीच में बंट गया जो एक ओर उन्हें चौधरी का बेटा होने के नाते आश्रय देते और वहीं चरण सिंह की विरासत पर दावा भी ठोकते। जरा उनसे उन पर लगने वाले 'राजनीतिक असंगति' के आरोप के बारे में पूछिए। मुस्कराते हुए वह यही कहेंगे, 'मुलायम सिंह हर राजनीतिक खेमे के साथ रहे हैं लेकिन वह ऐसे नहीं हैं- लेकिन मैं हूं। वी पी सिंह कांग्रेस से निकाले गए, भाजपा के साथ हाथ मिलाया और तीसरा मोर्चा बनाया। वह ऐसे नहीं हैं। मैं हूं।' सिंह के पास अब एक और मौका है। उनके साथ एक सांसद बेटा जयंत भी है जिन्होंने अपनी मर्जी से यह राह चुनी है। वह इस मौके का कैसे इस्तेमाल करेंगे यह देखने वाली बात होगी।

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