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वैश्विक फलक पर चीन का समय पूर्व वर्चस्व?
अन्य महाशक्तियों के विपरीत चीन किस तरह बगैर तकनीक अथवा आर्थिक मोर्चे पर अग्रणी हुए भी वैश्विक महाशक्ति का दर्जा हासिल करने की ओर अग्रसर है, बता रहे हैं अरविंद सुब्रमण्यन /  November 01, 2011

क्या एक ऐसा देश जो न तो दुनिया के सबसे धनाढ्य मुल्कों में शामिल हो और न ही आर्थिक अथवा तकनीकी मोर्चे पर दिग्गज हो, वह महाशक्ति हो सकता है? यह उन सबसे आम सवालों में से एक है जो मेरी नई किताब के मुख्य बिंदु के विरुद्घ उठाए गए हैं जिसमें मैंने कहा है कि चीन का आर्थिक प्रभुत्व आसन्न है। उसके बारे में अभी जो कल्पना की जा रही है, वह उसके मुकाबले कहीं अधिक व्यापक और प्रभावी है। मेरे अनुमान के मुताबिक 2030 तक चीन गरीब नहीं रहेगा। निश्चित तौर पर उसकी प्रति व्यक्ति जीडीपी अमेरिका के मुकाबले आधी से अधिक हो जाएगी और वह विश्व के औसत जीडीपी से ज्यादा होगी।
इसके बावजूद चीन का आर्थिक दबदबा अनूठा होगा क्योंकि ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो प्रभावशाली शक्तियां(ब्रिटेन और अमेरिका) समृद्घ रही हैं। उनके प्रभावशाली दिनों में भी अन्य प्रतिस्पर्धियों से तुलना की जाए तो वे अपेक्षाकृत अधिक अमीर रही हैं। चीन के मामले में ऐसा नहीं होगा। लेकिन यह कुछ ऐसा भी नहीं होगा कि किसी गरीब देश ने ताकत हासिल कर ली हो। चीन एक मध्य आय अथवा उच्च मध्य आय वर्ग वाला देश होगा। ऐसे में अगर मार्टिन वुल्फ के शब्दों का इस्तेमाल करें तो संभवत: चीन के भविष्य के आर्थिक दबदबे को ध्यान में रखते हुए उसे अपरिपक्व के बजाय 'समय से पहले तैयार' महाशक्ति कहा जा सकता है। क्या चीन एक समयपूर्व तैयार महाशक्ति है? अगर ऐसा है तो क्या यह संभव भी है? निश्चित रूप से इतिहास उन लोगों के पक्ष में है जो यह मानते हैं कि दबदबा कायम करने के लिए उच्च जीवनशैली जैसी बातें आवश्यक हैं। ऐसा क्यों होना चाहिए?
सबसे पहले, एक गरीब देश का ध्यान अपनी आंतरिक गतिविधियों पर केंद्रित रहता है क्योंकि आंतरिक स्थिरता बनाए रखना और उच्च जीवनस्तर तय करना सरकार की मुख्य प्राथमिकताओं में शुमार बाते हैं। इस मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शक्ति प्रदर्शन के साथ-साथ घरेलू चुनौतियों को दबाने का काम भी करना होगा क्योंकि बाहरी दबदबे के साथ आंतरिक अस्थिरता समुचित प्रतीत नहीं होती।
दूसरी बात, कम से कम एक गरीब देश वैश्विक स्तर पर शक्ति प्रदर्शन के लिए लगातार संसाधन नहीं एकत्रित कर सकता। इसका एक बेहतरीन उदाहरण है सैन्य संसाधन। इसके लिए वित्तीय सहायता मुहैय करानी होगी। लेकिन अगर कोई देश गरीब होगा तो उसे अपने लोगों पर संसाधन जुटाने के लिए कर लगाने में उतनी ही कठिनाई होगी। उदाहरण के लिए आमतौर पर विकास के स्तर कर राजस्व में इजाफा होता है। रूस अपनी आर्थिक स्थिति में गिरावट के बावजूद कुछ हद तक सैन्य दबदबा कायम रखने में सफल रहा लेकिन ऐसा ज्यादा समय तक नहीं चला। उत्तर कोरिया बाहरी ताकत और आंतरिक स्थिरता और संपत्ति के बीच बिगड़ते अनुपात का सटीक उदाहरण है। उत्तर कोरिया एक ऐसा देश है जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समस्याएं खड़ी कर सकता है लेकिन उसके दबदबे की बात को शायद ही कोई स्वीकार करे। कोई गरीब देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबदबा कायम क्यों नहीं कर सकता, इसकी तीसरी वजह यह है कि  हो सकता है उसमें दबदबा कायम करने के लिए 'सॉफ्ट पॉवर' के लोकतंत्र, खुले समाज और बहुलतावाद जैसे गुण न हों। दूसरी तरह से कहें तो शक्ति संपन्न नेतृत्व तभी संभव है जबकि वह अनुयायियों को प्रेरित करे और अनुयायी तभी बनते हैं जबकि शक्तिशाली देश किसी ऐसी वजह के लिए खड़ा हो जिसका वैश्विक असर हो।
चौथी वजह यह है कि केवल अमीर देश (पारिभाषिक रूप से आर्थिक और तकनीकी मोर्चों पर अव्वल) ही उन विचारों, तकनीक, संस्थाओं और कार्य व्यवहार का सृजन कर सकते हैं जिनका अनुसरण अन्य राष्ट्र करें। गरीब देश अन्य राष्ट्रों के लिए प्रेरणा के ऐसे स्रोत नहीं हो सकते।
ऐसे में साफ है कि एकदम गरीबी और प्रभुत्व का आपस में सीधा संबंध नहीं है लेकिन कुछ अपवादों के साथ देखें तो प्रभुत्व के लिए हमेशा अमीर होना भी आवश्यक नहीं है। चीन ने अपने अधिशेष का इस्तेमाल अफ्रीका में वित्तीय निवेश के काम में किया है। उसने अपने आकार का इस्तेमाल एशिया और लैटिन अमेरिका में मजबूत वित्तीय और कारोबारी रिश्ते कायम करने में किया है (इसमें चीन की वह पेशकश शामिल है जिसमें उसने पनामा नहर का विकल्प तैयार करने की बात कही है ताकि कोलंबिया की कारोबारी संभावनाओं का विस्तार हो)। अभी हाल की बात करें तो यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं की लगातार बिगड़ती स्थिति में भी उनको उबारने के लिए दुनिया को चीन की बाट जोहनी पड़ सकती है। याद कीजिए अप्रैल 2011 में चीन के राष्ट्रपति की स्पेन यात्रा के दौरान किस तरह स्पेनिश प्रधानमंत्री जोस लुइ रोड्रिग्ज जापातेरो ने कहा था कि चीन स्पेन का सबसे अच्छा मित्र है।
आश्चर्य की बात यह है कि चीन एक ऐसी विनिमय दर नीति का पालन कर रहा है जिसका न केवल अमेरिका और यूरोप बल्कि चीन से प्रतिस्पर्धा कर रहे अनेक उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों पर भी नकारात्मक असर हो रहा है। इन देशों में ब्राजील, मैक्सिको, भारत, तुर्की, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देश शामिल हैं। लेकिन शेष विश्व चीन की नीतियों में बदलाव लाने में सक्षम नहीं रहा है। अगर यह वर्चस्व नहीं है तो भला और क्या है?
यहां तक कि ताकतवर अमेरिका ने भी लगातार चीन के खिलाफ कार्रवाई करने की धमकी दी है लेकिन वह ऐसा करने में सफल नहीं हो पाया। वह धमकी तो देता रहा लेकिन अब तक कुछ नहीं कर सका। अमेरिका और चीन के रिश्तों के मद्देनजर शक्ति संतुलन में जो परिवर्तन आ रहा है वह ध्यान देने योग्य इसलिए भी है क्योंकि महज एक दशक पहले अमेरिका कृषि, वस्तु एवं सेवा बाजार को खोलने के लिए चीन पर दबाव बनाने में कामयाब रहा था। ऐसे में चीनी प्रभुत्व की बात करें तो दो तरह के वर्चस्व की बात सामने आती है। एक ऐसा दबदबा जो स्वाभाविक तौर पर अनुयायी तैयार करता है और जिसके लिए व्यवस्था तथा कुछ संस्थानों का निर्माण आवश्यक होता है जिस तरह द्वितीय विश्वयुद्घ के दौरान अमेरिका ने किया था। ऐसे में अगर चीन लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था की ओर अग्रसर नहीं होता है तो संभव है कुछ समय के लिए वह इससे अलग रहे। लेकिन प्रभुत्व के दूसरे तरीके मसलन, दूसरे देशों की नीतियों में परिवर्तन लाना और अपनी नीतियों में परिवर्तन का ऐसा विरोध करना जिसके चलते बाहरी स्तर पर नकारात्मकता पैदा हो, आदि कुछ ऐसी बाते हैं जिनका चीन ने इस्तेमाल शुरू भी कर दिया है। अगले दो दशकों के दौरान जैसे-जैसे चीन बड़ा और समृद्घ होता जाएगा तब हमें उससे क्या उम्मीद करनी चाहिए?

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