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किस्सागो की अनूठी परंपरा का अद्भुत 'संगम'
इंदुलेखा अरविंद /  October 11, 2011

केतम 38 साल के हैं और वह जिंदगी में पहली बार अपने गांव गुडालुर से बाहर जा रहे हैं। यह तमिलनाडु के नीलगिरि क्षेत्र का चाय बागान वाला जिला है। अभी तक वह बस से भी अनजाने रहे हैं। वह पहली दफा बस में सफर कर रहे हैं। इसके बाद शुरू होती है अपने गांव वालों से इतर दूसरों को कहानी सुनाने की प्रक्रिया। वह और उनके पूर्वज उन देवताओं की कहानियां सुनाते रहे हैं जिनकी उन्होंने पूजा की है। केतम उन 9 देसी किस्सागो में शुमार हैं जो बेंगलूर से 30 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद हरे-भरे अभयारण्य, फायर फ्लाईज आश्रम में आए हैं। यहां 3 दिन तक देसी किस्सागो का महोत्सव होने वाला है। इस महोत्सव को नाम दिया गया है- कन्फ्लूएंस यानी संगम । दरअसल यह आयोजन शहर की एक गैर-मुनाफे वाली संस्था 'अकाउस्टिक ट्रेडिशनल' के संघर्षों का नतीजा है। ऐसे आयोजन के जरिये पर्वतीय और वन इलाके के समुदायों की किस्सागोई की परंपरा को संरक्षित करने की कोशिश होती है।
अकाउस्टिक ट्रेडिशनल के संस्थापक सलिल मुखिया को देखकर यह अंदाजा नहीं होता है कि यह संघर्ष उन पर भारी पड़ रहा है। करीब 32 साल के मुखिया इस बात को लेकर बड़े उत्साहित हैं कि वह और 5 लोगों की उनकी टीम नीलगिरि, आंध्र प्रदेश, सिक्किम, दार्जिलिंग और कर्नाटक से किस्सागो को बुलाती है जो शायद कभी भी अपने इलाके से निकल नहीं सकते थे। इसके अलावा मुखिया की टीम शहर के पेशेवर किस्सागो और उन लोगों को बुलाती है जो इस खत्म होती परंपरा में खासी दिलचस्पी लेते हैं। यह माना जा सकता है कि यहां पर्वतीय-जंगल और शहर की मुख्यधारा के लोगों का अनूठा संगम होता है।
अकाउस्टिक ट्रेडिशनल की शुरुआत वर्ष 1990 के दशक के मध्य में तब हुई जब मुखिया जनजातीय किस्सों के उद्भव का पता लगाने की कोशिश कर रहे थे जिसे संगीतमय अंदाज में कहा जाता है। अपनी इस खोज के दौरान उन्हें यह महसूस हुआ कि कुछ दिनों में यह कला हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। यह महोत्सव अब दूसरे चरण में है और इसके जरिये इस कला को संरक्षित रखने की कोशिश की जा रही है।
ऐसा नहीं है कि मुखिया और उनकी टीम जो कोशिश कर रही है वह आसान है बल्कि इस राह में कई बाधाएं हैं। इनमें से एक चुनौती यह है कि कुछ कहानियां लिखी नहीं जा सकती हैं और कुछ कहानियों को कुछ खास लोग ही कह सकते हैं। मुखिया कहते हैं, 'इसकी वजह यह है कि इसमें धार्मिक ज्ञान है। अगर इन कहानियों को उस अंदाज में नहीं कहा जाए जिस अंदाज में सही लोगों द्वारा कहा जाना चाहिए तो इसका वैसा असर नहीं होगा।' इस महोत्सव में सबसे बड़ी बाधा नजर आती है भाषा की। इससे उस समूह के लिए कोई समस्या खड़ी नहीं होती है जिसने चेन्नई के वल्र्ड स्टोरीटेलिंग इंस्टीट्यूट के निदेशक एरिक मिलर के एक सत्र के लिए पंजीकरण कराया है क्योंकि यहां अंगे्रजी सार्वजनिक भाषा के तौर पर मौजूद है। लेकिन देसी किस्सागो के सत्र में शामिल एक स्वयंसेवक और एमफिल छात्र अभिषेक केआर को कुरुबा और पनियार के लिए इन कहानियों का अनुवाद तमिल में और आंध्र के नैकपोदुज के लिए तेलुगू और बाकी के सभी लोगों के लिए अंग्रेजी में करना पड़ता है। इस प्रक्रिया में उन्हें अच्छी-खासी मशक्कत करनी पड़ती है। केतम कुरुबा के किस्सागो हैं। वह स्वीकार करते हैं कि उन्हें यह महसूस होता है कि वह इस तरह किस्सागोई नहीं कर पाएंगे और वह अपने घर वापस चले जाएंगे जहां उनके अपने कबीले के लोग होंगे। लेकिन वह यह कहना नहीं भूलते कि उनके बच्चे भी उनकी कहानियों की किस्सागोई करने की परंपरा को जारी रखे हुए हैं भले ही तमिलनाडु सरकार की प्रतिद्वंद्वी पार्टी यानी डीएमके ने गांव के लोगों को टेलीविजन सेट दे दिए हों।
पनियार और कुरुबा चाय बागानों और फैक्टरियों में दिन में काम करते हैं लेकिन वे किसी खास मौके की शाम को या त्योहारों के लिए किस्सागोई की परंपरा बरकरार रखे हुए हैं। वहीं दूसरी ओर शहरी किस्सागोई की दुनिया थोड़ी अलग है। मुंबई की शिक्षिका से पेशेवर किस्सागो बन चुकी उषा वेंकटरामन का कहना है, 'इस कला को अब धीरे-धीरे एक प्रोफेशन के तौर पर स्वीकार्यता मिल रही है।' वेंकटरामन हाथ वाली कठपुतलियों का इस्तेमाल कर किस्सागोई का सत्र चलाती हैं।
वैसे अगर पश्चिमी देशों की बात करें तो वहां इसे ऐसा पेशा माना जाता है जिसके लिए अच्छी खासी रकम मिलती है। स्पेन में बसे ब्रिटेन के एक किस्सागो और थियेटर कलाकार टिम बाउले जब भी किंग ऑर्थर की कहानियां और एस्किमो की लोक कथाएं कहते हैं तो दर्शकों का हुजूम जुटता है। वह एक सत्र के लिए 400 से 700 यूरो लेते हैं। भारत के मुकाबले वहां काफी बेहतर स्थिति है। वैसे भाषायी या कोई अन्य तरह की बाधाएं न हों तो अकाउस्टिक ट्रेडिशनल के लोग खुश हैं। मुखिया कहते हैं, 'मेतेई कुरुबा से मिलते हैं और कुरुबा लेप्चा से मिलते हैं और एक अनूठा वातावरण तैयार होता है। इस तरह हम यहां एक सामूहिक किस्सागोई का ताना-बाना बुन रहे हैं।'

Keyword: india story,
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