बिजनेस स्टैंडर्ड - 'दोहरे नियंत्रण की समस्या को दूर करने की जरूरत'
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'दोहरे नियंत्रण की समस्या को दूर करने की जरूरत'
वाई एच मालेगाम, चेयरमैन, पैनल, शहरी सहकारिता बैंक
शहरी सहकारिता क्षेत्र में नए बैंकिंग जारी करने पर गठित आरबीआई पैनल के चेयरमैन वाई एच मालेगाम ने सहकारी क्षेत्र में आए बदलावों के बारे में अभिजीत लेले से बात की। उन्होंने यह भी बताया कि क्या यह क्षेत्र नए बैंकों के लिए तैयार है। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश: /  October 07, 2011

पैनल ने सहकारिता क्षेत्र में नए शहरी बैंकों की स्थापना पर जोर दिया है। कौन से ऐसे मुद्दे हैं जो इस काम पर असर डाल रहे हैं?
दोहरे नियंत्रण का मुद्दा है। यह सहाकारिता है इसलिए प्रबंधन के खिलाफ कोई भी निर्णय रजिस्ट्रार और कोऑपरेटिव्स (आरओसी) ही ले सकता है। रजिस्ट्रार पर प्राय: राजनीतिक और अन्य दबाव रहता है। लिहाजा होता यह है कि आरबीआई निरीक्षण करता है, समस्याओं को चिह्नित करता है लेकिन यह अनुशासन की बहाली नहीं कर पाता है और इसे हमेशा रजिस्ट्रार के जरिये आगे बढऩा होता है। अब स्थिति में बदलाव हुए हैं। आरबीआई और राज्य सरकारों ने सुधरती वित्तीय हालत और शहरी बैंकों के प्रबंधन के लिए टास्क फोर्स का गठन किया है।

टास्क फोर्स पैनल पिछले चार-पांच साल से काम कर रहा है। क्या सुधरती वित्तीय हालत और मजबूती पर संयोजन कार्य हो रहा है? क्या हम नए बैंकों को अनुमति दे सकते हैं?
शहरी बैंकों की हालत में काफी सुधार हुआ है लेकिन प्रक्रिया में अब भी काफी समय लगता है। हमने कहा है कि जब भी आप सहकारी बैंकों पर नजर डालते हैं तो आप यही कहते हैं कि यह एक सहकारिता है जो बैंक चलाता है। अगर आप इस तथ्य की तलाश कर लेते हैं तो दोहरे नियंत्रण की समस्या समाप्त हो जाती है।

यह कैसे किया जा सकता है?
ऐसा करने के लिए हम यह शर्त तय कर सकते हैं कि निदेशक मंडल, जो सहकारिता अधिनियम के तहत है, के अलावा एक प्रबंधन बोर्ड रखा जा सकता है। प्रबंधन बोर्ड का गठन निदेशक मंडल करेगा लेकिन इसमें व्यावसायिक  बैंक के निदेशक मंडल की सारी खूबियां मौजूद होंगी। इसका मतलब इसमें मुख्य कार्याधिकारी और पेशेवर लोग होंगे। यह आरबीआई के अनुशासन में रहेगा और आरबीआई के पास प्रबंधन बोर्ड को अनुशासित रखने के सभी अधिकार होंगे। लाइसेंस के लिए इसे शर्त के रूप में पेश कर हम ऐसा कर सकते हैं। अत: हम यह कहते हैं कि हम उसी शर्त पर लाइसेंस देंगे जब आप प्रबंधन बोर्ड का गठन करेंगे और आरबीआई को भी प्रबंधन बोर्ड पर उतना ही अधिकार होगाा जितना व्यावसायिक बैंकों के निदेशकों पर
होता है।

क्या इस तरह की व्यवस्था राजनीतिक या स्थानीय हितों के हस्तक्षेप को कम कर देगी?
इससे हस्तक्षेप कम हो जाएगा क्योंकि राजनीतिक तत्वों की प्रबंधन बोर्ड में कोई भूमिका नहीं होगी। उनकी भूमिका निदेशक मंडल में होगी। अब निदेशक बैंक चलाने नहीं जा रहे हैं। बैंक को प्रबंधन बोर्ड चलाएगा लिहाजा आरबीआई को प्रबंधन बोर्ड से लोगों को हटाने और मुख्य कार्याधिकारी के चयन का अधिकार होगा। व्यावसायिक बैंक के मामले में इसे उतना ही अधिकार होगा।
आपने सिफारिश की है कि शहरी क्षेत्रों में काम करने वाली सहकारी समितियों को नए शहरी बैंक स्थापित करने में छूट मिलनी चाहिए? इसके पीछे क्या
तर्क है?

हम इसे दूसरे संदर्भ में देखें। पहली बात दोहरे नियंत्रण की दिक्कत थी। इसे प्रबंधन बोर्ड के जरिये हल कर लिया जाएगा। दूसरी समस्या यह कि हमारे आंकड़ों के अनुसार शहरी बैंकों का वितरण एक समान नहीं है। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और गुजरात जैसे कुछ ऐसे राज्य हैं जहां कई शहरी सहकारी बैंक है। कुछ ऐसे भी राज्य हैं जहां इनकी संख्या कम है। हम यह नहीं जानते कि जो लोग इन नए बैंकों की शुरुआत कर रहे हैं वह इसे बेहतर तरीके से चला पाएंगे। लेकिन आपके पास पहले से ही साख समितियां हैं जो बड़ी हैं बैंकों की तरह काम कर रही हैं। लिहाजा अगर बेहतर तरीक से चलने वाली साख समिति हो और सभी मानदंडों को पूरा करती है तो से बैंक बनाने में वरीयता दी जा सकती है।

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