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पेशेवर बनाम प्रवर्तक की बहस का कोई अंत नहीं
कारोबारी मंत्र
भूपेश भन्डारी /  June 01, 2011

मोहनदास पई प्रकरण से प्रवर्तक बनाम पेशेवर से संबंधित बरसों पुरानी बहस एक बार फिर जोर पकडऩे लगी है। आखिर किसी कंपनी का संचालन सबसे बेहतर तरीके से कौन कर सकता है-प्रवर्तक या पेशेवर! इस मामले में दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं। पेशेवर की कार्यशैली में सुरक्षित गतिविधियां शामिल होने की संभावना रहती है। वह शानदार नतीजों की उम्मीद में जोखिम नहीं उठाता। दूसरी ओर प्रवर्तक में किसी उपक्रम का कुशल नेतृत्व करने के लिए जरूरी प्रबंधकीय कौशल नहीं होता। इन दोनों दृष्टिïकोणों के पक्षधर अपने-अपने नजरिए को साबित करने के लिए आपको आंकड़ों के उलझन में डाल सकते हैं। लेकिन अब ऐसा लगने लगा है कि इस बहस का अंत जल्दी हो जाएगा।

फिर भी, क्या भारतीय प्रवर्तक कंपनी पर अपना नियंत्रण छोडऩे और उसे अपने पेशेवर प्रबंधकों के हाथ में डालने के लिए तैयार हैं? अनुभव क्या कहते हैं? वास्तव में इस तरह के कुछ ही उदाहरण हैं और नतीजे मिलेजुले। आयशर के दीपक लाल संभवत: पहले ऐसे व्यवसायी थे, जिन्होंने कंपनी की बागडोर सुबोध भार्गव को सौंप दी थी। इसके बाद आयशर काम करने के लिए बढिय़ा जगह के रूप में जानी जाने लगी, जहां शानदार काबलियत वाले लोग बेहतर तरीके से अपने-अपने काम को अंजाम देते हैं।

कुछ लोग इससे भी एक कदम आगे बढ़ गए- उन्होंने पेशेवरों को पारिवारिक सदस्यों की तुलना में कहीं ज्यादा तरजीह दी। लाला चरत राम ने नीलकंठ रत्नाकर डोंगरे का ओहदा बढ़ाकर उन्हें कर्मचारी से कारोबार साझेदार बना लिया, अपने पारिवारिक सदस्यों की झुंझलाहट के बावजूद। ये दोनों चरत राम-डोंगरे समूह के रूप में मशहूर हुए। डोंगरे जबरदस्त वफादार थे। कोलकाता स्थित चरत राम की कंपनी 'जय इंजीनियरिंग वक्र्स' के कारखाने के कर्मचारियों ने एक बार घेराबंदी कर रखी थी। स्थिति नाजुक हो गई थी। डोंगरे ने तमाम महत्त्वपूर्ण दस्तावेज एक ट्रक में भर लिए, एक दीवार तोड़ी और दिल्ली निकल गए। इसके बाद एक अपरिहार्य घटना हुई। यह साबित हुआ कि खून का रिश्ता ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है। चरत राम ने अपने बेटे सिद्घार्थ श्रीराम को आगे किया। डोंगरे अकेले पड़ गए और अंतत: कारोबार से बाहर हो गए। डोंगरे ने उन कंपनियों को अपने नियंत्रण में बनाए रखने की तगड़ी लड़ाई लड़ी जिनपर वे अपना अधिकार समझते थे- श्रीराम रिंग्स ऐंड पिस्टन्स और उषा इंटरनैशनल। लेकिन बोर्ड (निदेशक मंडल) और अदालत में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में भाई मोहन सिंह और उनके बेटे परविंदर सिंह के बीच कंपनी बोर्ड के भीतर और बाहर जबरदस्त लड़ाई हुई। परविंदर सिंह डी एस बराड़ को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे, लेकिन भाई मोहन सिंह पुराने ख्यालों वाले व्यवसायी थे जो इस विचार से कतई सहमत नहीं थे कि कंपनी के शीर्ष पद पर कोई बाहरी व्यक्ति विराजमान हो। भयंकर लड़ाई के बाद भाई मोहन सिंह निदेशक मंडल से निकल गए और परविंदर सिंह अपनी रणनीति पर आगे बढ़े।

वर्ष 1999 में, जब कैंसर पीडि़त परविंदर सिंह का निधन हो गया, भाई मोहन सिंह एक बार फिर सक्रिय हो गए और कंपनी के निदेशक मंडल में अपने पोतों मालविंदर व शिविंदर को जगह दिलाने के लिए खेमेबाजी शुरू कर दी। हालांकि इन दोनों भाइयों ने एक बयान जारी करके कहा कि वे कंपनी के प्रबंधन से स्वामित्व को अलग रखने से संबंधित अपने पिता के दर्शन का पालन करेंगे और इसीलिए निदेशक मंडल में किसी पद की इच्छा नहीं रखते। इसके बाद के घटनाक्रम में थोड़ी सुस्ती आई, लेकिन रैनबैक्सी में मालविंदर सिंह तेजी से उभरे और जल्दी ही निदेशक मंडल में शामिल हो गए। इसके बाद बराड़ ने कंपनी को विदा कहने का फैसला किया। 

चलिए मान लेते हैं कि ज्यादातर भारतीय मुख्य कार्याधिकारी बहुत चतुर होते हैं। बराड़  ने अपने लिए एक बढिय़ा कारोबार खड़ा किया और उनका बिजनेस मॉडल रैनबैक्सी की तुलना में बहुत कम जोखिम वाला है। एक ओर जहां रैनबैक्सी को अमेरिका में कई कानूनी पचड़ों का सामना करना पड़ रहा है वहीं ब्रार आसानी से आगे बढ़ रहे हैं। या फिर जेनपैक्ट के प्रमोद भसीन का उदाहरण भी पेश किया जा सकता है, जो किसी व्यवसायी से कमतर उद्यमी साबित नहीं होते। जैक वेल्श ने इस कंपनी के लिए केवल एक राय (आइडिया) दी थी, जिसे भसीन ने नई ऊंचाई पर पहुंचाया। वास्तव में अहम् का टकराव तब शुरू होता है जब पेशेवर यह सोचने लगते हैं कि वे कंपनी के कारोबार के लिए अपरिहार्य हैं। पारिवारिक नियंत्रण वाली कंपनियों में ऐसा ज्यादा होता है, हालांकि जेनपैक्ट जैसी निजी इक्विटी वाली कंपनियों में ऐसा कम ही होता है। मैंने कई मर्तबा मुख्य कार्याधिकारी को यह कहते हुए सुना है कि 'मैंने कंपनी को इस अहम मुकाम तक पहुंचाया, लेकिन मेरे हिस्से में कुछ नहीं आया। इस तरह की बातचीत में कंपनी के प्रवर्तकों की प्रतिभा का तिरस्कार अंतर्निहित होता है। इससे अंतत: प्रवर्तकों के साथ मनमुटाव वाली स्थिति बनती है। व्यवसायी बहुत तीक्ष्ण बुद्घि वाले लोग होते हैं। उन्हें पूरा अंदाजा होता है कि उनका अधिकार-क्षेत्र कब आहत हुआ है।

सीमा रेखा बिलकुल स्पष्टï है। मुख्य कार्याधिकारी को इसलिए भुगतान किया जाता है कि वह शेयरधारकों की संपत्ति अधिक-से-अधिक बढ़ाए। जब वह इस सीमा रेखा को लांघता है तो उसे बाहर जाना पड़ता है, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो। एक बहुत ज्यादा होशियार व्यक्ति ने अपनी नौकरी इसलिए गंवा दी क्योंकि उसने एक पार्टी में सार्वजनिक रूप से कह डाला कि उसने कारोबार को एक लाला की कंपनी से पेशेवर कंपनी में बदलने के लिए नियुक्तियां की थी। मैंने अब तक उन प्रयोगों के बारे में बात की है, जो असरदार नहीं हुए। लेकिन, डाबर के बर्मन बंधुओं ने कंपनी में अपनी तमाम कार्यकारी भूमिका खत्म कर दी और निदेशक मंडल में अल्पसंख्यक होकर खुश हैं। कंपनी के प्रबंधन में उनका दखल बहुत कम रह गया है। कंपनी की कार्यकारी टीम ने अधिग्रहण किया, उत्पाद विकसित किए, ब्रांड शुरू किए और रणनीतिक पहल की। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, जिसके हवाले से यह कहा जा सके कि उनके इन कदमों से कंपनी को नुकसान उठाना पड़ा है।

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