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सुलगता सिंगुर न बन जाए ममता के लिए 'भस्मासुर
स्वाति गर्ग और ईशिता आयान दत्त / सिंगुर May 30, 2011

सिंगुर के किसान विनय दास को लगता है कि 5 साल पहले जो बुरा सपना शुरू हुआ था, वह जल्द ही खत्म हो जाएगा। पश्चिम बंगाल की कमान संभालते ही ममता बनर्जी ने ऐलान किया कि जमीन बेचने के अनिच्छुक दास और 2000 दूसरे किसानों को जमीन जल्द ही लौटा दी जाएगी। दास को इसी ऐलान से उम्मीद है, लेकिन उनकी उम्मीद का दामन अब बहुत बड़ा हो गया है।
टाटा मोटर्स की नैनो परियोजना के नाम दास की भी 3.5 एकड़ जमीन भेंट चढ़ गई थी। अब वह केवल जमीन वापस नहीं चाहते हैं, साथ में मुआवजा चाहते हैं और परिवार के एक आदमी को नौकरी दिए जाने की भी मांग बुलंद कर रहे हैं। और अगर ऐसा नहीं होता है तो एक बार फिर वह और उनके साथी संघर्ष की कुदाल हाथ में लेने के लिए तैयार हैं।
किसानों की 400 एकड़ जमीन वापस कराने के लिए बनर्जी ने जो आंदोलन छेड़ा, उसकी वजह से टाटा मोटर्स ने 2008 में सिंगुर से नैनो परियोजना हटा ली। इस कदम से बनर्जी के राजनीतिक जीवन में जबरदस्त उत्थान आया और सिंगुर में जमीन बेचने के अनिच्छुक 2,000 किसानों को भी ताकत मिल गई।
किसान जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में 34 साल पुरानी वामपंथी सरकार को सत्ता से बाहर फेंकने का असली काम उन्होंने ही किया था और अब वे इसकी कीमत चाहते हैं। इसका सबूत नैनो के खिलाफ जीत के साथ बागी हुए उनके तेवरों से ही मिलता है। वे राष्टï्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत बेहतर काम और पैसा चाहते हैं।
दास ने कहा, 'हम 100 के बजाय 200 रुपये दिहाड़ी तथा साल में 100 के बजाय 150 दिन काम चाहते हैं। अगर वे हमसे बेहतर हालात वाले शिक्षकों को वक्त पर तनख्वाह दे सकते हैं तो हमारे लिए भी उन्हें वास्तव में कुछ करना होगा।Ó तृणमूल कांग्रेस ने शिक्षकों को हर महीने 10 के बजाय 1 तारीख को ही वेतन देने का फैसला किया है।
किसानों को मुआवजा भी बाजार की दर पर चाहिए यानी हर साल के ऐवज में उन्हें 1 लाख रुपये प्रति कोटा चाहिए। अधिग्रहण के वक्त राज्य सरकार ने उन्हें 1 एकड़ यानी 60 कोटे के लिए 9 से 12 लाख रुपये की पेशकश की थी।
एक अन्य किसान अनिल पाल ने कहा, 'हमारी जमीन लेने और हमें दूसरों की जमीन पर महज मजदूर बना देने के एवज में उन्हें मुआवजा देना ही होगा। मुआवजा कहां से आएगा, इससे हमें कोई मतलब नहीं है और इसमें लिए हम आंदोलन करने को भी तैयार हैं।Ó
बडग़ादार (साझेदारी में खेती करने वाले) सुशांत घोष के हालात तो औरों से भी खराब हैं। 1978 में वामपंथी दलों की सरकार ने बडग़ादारों को कानूनी संरक्षण दिया था, जिसके मुताबिक उन्हें जमीन से हटाया नहीं जा सकता और फसल का हिस्सा भी उन्हें मिलेगा।
सरकार के समझौते के मुताबिक सिंगुर परियोजना में जमीन की 25 फीसदी कीमत पंजीकृत बडग़ादार को दी जाएगी। लेकिन उनमें से ज्यादातर के पास इस बात का कोई कागजी सबूत ही नहीं है, इसलिए उन्हें मुआवजा भी नहीं मिला।
हालांकि कृषि जमी रक्षा समिति के बैनर तले आंदोलन की अगुआई करने वाले और अब तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर विधायक बन चुके बेचाराम मन्ना किसानों को दिलासा दे रहे हैं। उनका कहना है, 'दीदी इंसानियत के नाते भी मुआवजे पर विचार कर रही हैं। हम उन्हें मुआवजा देने के बारे में सोचेंगे।Ó
लेकिन जमीन बेचने को राजी किसानों के लिए मुश्किलें कहीं ज्यादा हैं।।ऐसे 11,000 किसानों ने परियोजना में रकम लगाई थी और इसके रद्द होते ही उनकी रकम डूब गई। उनमें से कुछ को टाटा मोटर्स ने प्रशिक्षण दिया था और सिंगुर कारखाना शुरू होते ही नौकरी मिलने की उन्हें उम्मीद थी।
सिंगुर शिल्प विकास ओ उन्नयन समिति के अध्यक्ष उदयन दास कहते हैं, 'वह जमीन बेचने के लिए अनिच्छुक किसानों की ही मुख्यमंत्री नहीं हैं, इच्छुक किसानों ने भी उन्हें वोट दिए हैं। मुझे नहीं लगता कि दोनों धड़ों के बीच खाई वह गहरी करेंगी। अनिच्छुक किसानों को मुआवजा मिलता है तो वह इच्छुक किसानों के बारे में भी सोचेंगी।Ó
लेकिन तृणमूल सरकार की मश्क्कत के बावजूद समझौते की कोई सूरत नजर नहीं आ रही है। सिंगुर में इन विस्फोटक हालात के मद्देनजर कुछ अरसे बाद राज्य सरकार रतन टाटा से बातचीत के लिए पींगें बढ़ाए तो हैरत नहीं होनी चाहिए।

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