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खाद्य और तेल के दामों पर जी 20 लगा पाएगा लगाम?
जी 20 का महत्त्वपूर्ण सदस्य होने के नाते भारत को खाद्य और ईंधन कीमतों को और अधिक स्थिर बनाने की दिशा में सहमति बनाने के लिए संगठन के भीतर ठोस पहल करनी चाहिए, बता रहे हैं
नागेश कुमार /  May 26, 2011

एशिया-प्रशांत क्षेत्र के अधिकांश इलाकों में खाद्य पदार्थों और तेल कीमतों में लगातार हो रहे इजाफे ने क्षेत्र की विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के मजबूत विकास संबंधी पूर्वानुमानों के लिए जोखिम पैदा कर दिया है। एशिया और प्रशांत क्षेत्र के लिए सामाजिक एवं आर्थिक आयोग (ईएससीएपी) के पूर्वानुमान बताते हैं कि इन अर्थव्यवस्थाओं में जहां चीन की विकास दर 9.5 फीसदी और भारत की 8.7 फीसदी है वहीं वर्ष 2011 में इनकी औसत विकास दर  7.3 फीसदी रहने की  उम्मीद है।
अगस्त 2010 से अब तक विभिन्न देशों में खाद्य कीमतों में 10 से 35 फीसदी तक का इजाफा हुआ है। बीते वर्ष के दौरान तेल कीमतें 45 फीसदी बढ़ी हैं। जाहिर है बीते वर्ष के दौरान दुनिया के अनेक देशों में खाद्य पदार्थों और ईंधन की बढ़ती कीमतों ने ध्यान आकर्षित किया है। आबादी के संवदेनशील तबके पर इसके असर को लेकर तथा भारत जैसे आबादी वाले देशों में गरीबी हटाने के प्रयासों पर इसके प्रभाव को लेकर चिंताएं भी जताई गईं।
ईएससीएपी ने अपने हालिया सामाजिक और आर्थिक सर्वेक्षण 2011में अनुमान जताया है कि वर्ष 2011 में एशिया प्रशांत क्षेत्र में 4.2 करोड़ अतिरिक्त लोग गरीबी के शिकार होंगे जबकि वर्ष 2010 में बढ़ती खाद्य और ईंधन कीमतों की बदौलत 1.9 करोड़ लोग पहले से ही इसके असर में हैं। इन आंकड़ों में वे लोग भी शामिल हैं जो कीमतों में इस इजाफे की बदौलत गरीबी के आंकड़ों से बाहर नहीं निकल सकेंगे या फिर गरीबों में शामिल हो जाएंगे। इतना ही नहीं भारत समेत अनेक विकासशील देशों में इसकी वजह से गरीबी घटाने संबंधी सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य को हासिल करने में पांच वर्ष तक की देरी होने की आशंका है।
विपरीत जलवायु परिस्थितियों ने भी अनेक देशों में आपूर्ति की स्थिति पर असर डाला है। इसमें रूस, कजाकस्तान और यूक्रेन में फसलों को नुकसान, पाकिस्तान और आस्ट्रेलिया में बाढ़ तथा चीन मे सूखे की स्थिति शामिल है। रूस जैसे अनेक देशों ने पैदावार की खराब स्थिति को देखते हुए निर्यात पर पाबंदी लगा दी है, इससे अंतरराष्टï्रीय बाजारों में कीमतों में तेजी आई है। खाद्य फसलों को जैव ईंधन के रूप में इस्तेमाल करना भी इसका एक कारण है। इसकी वजह से बाजार में अनाज की आपूर्ति पर असर पड़ा है। बहरहाल ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जमाखोरी और खाद्य जिंसों के बाजार में सटोरिया कारोबार के कारण भी कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है।
खाद्य कीमतों तथा ईंधन की कीमतों में आए इजाफे की वजह से मुद्रास्फीति पर असर पड़ा है और मौद्रिक प्राधिकार ने इससे निपटने के लिए कड़े मौद्रिक उपाय अपनाए हैं। पिछले एक वर्ष के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक ने भी यह काम कई बार किया है। हालांकि चूंकि खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी का कारण मुख्यतया आपूर्ति से संबंधित है इसलिए मौद्रिक नीति इस संबंध में कुछ खास मददगार साबित नहीं होती है।
बढ़ती खाद्य कीमतों से निपटने का एक स्थायी हल आपूर्ति के क्षेत्र में ही खोजा जा सकता है। अनाज कीमतों में अस्थिरता से निपटने के लिए बफर स्टॉक का विपरीत परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जा सकता है। छोटी अर्थव्यवस्था वाले देश जिनके पास बड़े पैमाने पर खाद्य भंडारण की सुविधा नहीं है, उनके लिए क्षेत्रीय स्तर पर भंडारण के लिए राइस रिजर्व इनीशिएटिव ऑफ द एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशंस प्लस थ्री और साउथ एशियन एसोसिएशन फॉर रीजनल कोऑपरेशन फूड बैंक और साउथ एशियन एसोसिएशन फॉर रीजनल कोऑपरेशन फूड बैंक की तर्ज पर क्षेत्रीय खाद्य भंडार बनाए जा सकते हैं।
आबादी के संवेदशनशील तबके की रक्षा के लिए सार्वजनिक खाद्य वितरण प्रणाली अथवा फूड बाउचर या फिर नकदी हस्तांतरण योजनाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। इस संबंध में प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम एक महत्त्वपूर्ण पहल है जिसके जरिए देश के संवेदनशील तबके को पोषण संबंधी सुरक्षा उपलब्ध कराई जाएगी।
मध्यावधि में ऐसे प्रयास किए जाने चाहिए ताकि सार्वजनिक नीति में कृषि क्षेत्र की उपेक्षा को दूर कर आपूर्ति क्षेत्र में आश्वस्ति सुनिश्चित की जा सके। इसके लिए कृषि शोध को सहायता बढ़ानी होगी। इतना ही नहीं कृषि क्षेत्र में ऋण की उपलब्धता बढ़ाकर तथा कच्चे माल की आपूर्ति को आसान बनाकर स्थायित्व आधारित कृषि के जरिए नए तरह की हरित क्रांति को जन्म दिया जा सकता है। विकासशील देशों के दरमियान आपसी सहयोग और ज्ञान तथा तकनीक हस्तांतरण के क्षेत्र में त्रिपक्षीय सहयोग से वैश्विक खाद्य आपूर्ति की स्थिति भी बेहतर बनाई जा सकती है। उदाहरण के लिए भारत अफ्रीका तथा एशिया प्रशांत क्षेत्र में हरित क्रांति के विकास में मददगार साबित हो सकता है। इससे वैश्विक स्तर पर आपूर्ति बहाल करने तथा दुनिया के इन इलाकों में गरीबी तथा भूख की स्थिति को काबू करने में मदद मिलेगी। कुलमिलाकर खाद्य तथा तेल कीमतों को स्थिर बनाने तथा कीमतों को अस्थिर करने के कारकों से निपटने के लिए अंतरराष्टï्रीय सहयोग की आवश्यकता है।
ऐसे में वैश्विक आर्थिक सहयोग के क्षेत्र में बड़े मंच के रूप में उभरे जी 20 संगठन को इस दिशा में निर्णायक भागीदारी निभानी चाहिए, खासतौर पर इस बात को ध्यान में रखते हुए कि विकास की प्रक्रिया में इन दोनों का महत्त्वपूर्ण दखल और प्रभाव पड़ता है। इसमें अंतरराष्टï्रीय जिंस कीमतों में वित्तीय सटोरियों पर अंकुश लगाने और खाद्य तथा जैव ईंधन के विनियमन के कदम शामिल हैं। तेल कीमतों की बात करें तो जी20 और तेल निर्यातक देशों का समूह (ओपेक)आपस में चर्चा करके इसकी एक मानक और उचित कीमत तय कर सकते हैं तथा तेल कीमतों में उतार चढ़ाव को एक खास दायरे में सीमित कर सकते हैं। इसके अलावा तेल कीमतों में अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए जी20 एक वैश्विक रणनीतिक कोष का निर्माण कर सकता है जिसका जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल किया जा सके। इससे इटली के ला अकिला शहर में पारित खाद्य सुरक्षा संबंधी पहल में तेजी लाई जा सकती है जिसमें विकासशील देशों में खाद्य सुरक्षा को वित्तीय मदद उपलब्ध कराने का प्रावधान शामिल है।
जी 20 के एक सदस्यता तथा बड़ी संख्या में गरीब आबादी वाले देश के रूप में भारत की खाद्य तथा तेल कीमतों को स्थिर करने के मामले में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। उसे अन्य विकासशील सदस्यों को भी प्रेरित करना चाहिए और इस एजेंडे को फ्रांस में होने वाली जी 20 देशों की अगली बैठक में उठाना चाहिए। फ्रांस की भूमिका वित्तीय बाजारों के नियमन और खाद्य जिंस बाजार में सटोरिया कारोबार को नियंत्रित करने के मामले में काफी सकारात्मक रही है। भारत को कोशिश करनी चाहिए कि वह जी 20 देशों के संगठन में अपनी जैसी सोच वाले देशों को साथ लेकर इन मुद्दों पर सहमति बना सके। चूंकि खाद्य और तेल कीमतों से जुड़ा यह संकट वैश्विक स्तर पर विकास क्षेत्र में नकारात्मक असर डाल सकता है इसलिए भारत को इसे आगे बढ़ाना चाहिए।

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