बिजनेस स्टैंडर्ड - बचत दरों के नियंत्रण मुक्त होने का नफा-नुकसान
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बचत दरों के नियंत्रण मुक्त होने का नफा-नुकसान
रिजर्व बैंक ने एक तरह से बैंकों की बचत दरों से नियंत्रण हटाने पर राय आमंत्रित करता हुआ एक चर्चा पत्र पेश किया है। इसके संभावित परिणामों पर विस्तार से चर्र्चा कर रहे हैं
जैमिनी भगवती /  May 22, 2011

बीती 28 अप्रैल को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 'डिरेग्युलेशन ऑफ सेविंग्स बैंक डिपॉजिट इंटरेस्ट रेटÓ शीर्षक से एक चर्चा पत्र प्रस्तुत किया। इसे आरबीआई की वेबसाइट पर देखा जा सकता है। इस आलेख में हम इस पत्र और उसमें पूछे गए पांच सवालों की प्रतिक्रियाओं पर चर्चा करेंगे।
आरबीआई के पत्र के मुताबिक बैंकों के बचत खातों की जमा ब्याज दर (एसबीडीआर) इकलौती ऐसी ब्याज दर है जिसे नियंत्रणमुक्त किया जाना शेष है। अन्य प्रशासित ब्याज दरों की तर्ज पर यह पूरी तरह सही भी नहीं है। उदाहरण के लिए छोटी बचत, पेंशन और भविष्य निधि योजनाओं पर केंद्र तथा राज्य सरकारों ने ऐसी ब्याज दरें निर्धारित की हैं जो बाजार से निर्धारित नहीं होती हैं।
बहरहाल यह एक स्वागतयोग्य कदम है। एसबीडीआर को नियंत्रणमुक्त किए जाने की संभावना को आगे बढ़ाने के लिए इस पत्र में संक्षेप में यह वर्णन किया गया है कि कैसे 1990 के दशक के अंत में जमा और ऋण ब्याज दरों को कमोबेश पूरी तरह नियंत्रणमुक्त कर दिया गया था। इसके बाद जुलाई 2010 में 2 लाख रुपये तक के छोटे ऋणों और रुपये के निर्यात ऋण की ब्याज दरों को मुक्त किया गया। बहरहाल, रिजर्व बैंक ने मार्च 1978 के बाद से लगातार एसबीडीआर का निर्धारण किया है। वर्ष 1992 में यह 6 फीसदी सालाना थी और उसके बाद मार्च 2003 तक यह धीरे-धीरे घटकर 3.5 फीसदी तक आ गई। तब से लेकर 3 मई 2011 को आरबीआई द्वारा 4 फीसदी किए जाने तक यह दर 3.5 फीसदी पर ही स्थिर रही।
मार्च 2009 में देश के बैंकों के बचत खातों में कुल मिलाकर 90,000 करोड़ रुपये की राशि जमा थी। उक्त तारीख तक इन खातों का में 84 फीसदी का स्वामित्व घरेलू स्तर पर था और 32 फीसदी ग्रामीण अथवा कस्बाई इलाकों के लोगों का था। इन बचत बैंक खातों में घरेलू क्षेत्र की कुल वित्तीय संपत्तियों का 26.8 फीसदी हिस्सा था और यह बैंक में कुल जमा राशि का 22 फीसदी था। चर्चा पत्र में इस बात का उल्लेख है कि वर्ष 2004 से एसबीडीआर लगातार रिवर्स रीपो दर और तीन माह अथवा अधिक की जमा दरों से नीचे बनी रही है (इस समय रिवर्स रीपो दर 6.25 फीसदी है)।  बचत बैंक के जमाकर्ता आमतौर पर अपने खाते का पर्याप्त अंश तीन महीने से अधिक समय तक कायम रखते हैं। ये खाताधारक शायद सावधि जमा की ऊंची ब्याज दरों को लेकर पूरी तरह जागरूक नहीं हैं। या फिर वे अपना पैसा जब चाहे निकालने की सुविधा के लिए कम ब्याज दर स्वीकार करने को तैयार हैं।
आरबीआई जिन पांच सवालों पर जनता की प्रतिक्रिया मांग रही है। उनमें पहला यह है कि क्या यह एसडीआर को नियंत्रण मुक्त करने का सही समय है? संभावना यह है कि एसबीडीआर को नियंत्रण मुक्त करने बैंकों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी और इसलिए ब्याज दरों में इजाफा होगा। इसके अलावा ब्याज दरों में इजाफा होने से इन खातों में अधिक से अधिक मात्रा में धनराशि आएगी। दूसरी ओर बैंक ऋण दरों में इजाफा करके अपनी भरपाई करने की कोशिश करेंगे। वे पैसे निकालने की सीमा तय करने और न्यूनतम जमा राशि में इजाफा करने जैसे कदम भी उठा सकते हैं। बहरहाल, आरबीआई न्यूनतम बैलेंस के मुद्दे पर कोई सीमा तय कर सकती है। कुल मिलाकर इस सवाल का जवाब हां में ही होना चाहिए।
दूसरा और तीसरा सवाल यह है कि क्या एसबीडीआर को चरणबद्घ तरीके से नियंत्रण मुक्त किया जाना चाए? और किस तरह वरिष्ठï नागरिकों, पेंशनभोगियों और अल्प बचत (खासतौर पर ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में ) वाले लोगों के हितों की रक्षा की जाए। चरणबद्घ तरीके से इस काम को अंजाम देने से खाता धारकों को बाजार आधारित रिटर्न दिलाने के लक्ष्य को हासिल करने में देरी लगेगी। जहां तक बात कमजोर तबकों के हितों की रक्षा की बात है तो उसके लिए ब्याज दरों से छेड़छाड़ के अलावा भी कई दूसरी प्रत्यक्ष व्यवस्थाएं हैं।
चौथा सवाल बैंकों के बीच संभावित घनी प्रतिद्वंद्विता को लेकर और उनकी परिसंपत्तियों और देनदारियों में असंतुलन को लेकर है। यह कहा जा सकता है कि बैंक ऐसी जमा पर काफी ऊंची ब्याज दरों की घोषणा करके खुद को कहीं अधिक अस्थिर हालात में डाल सकते हैं। बैंकों के बिजनेस मॉडल के मुताबिक वे कम अवधि के लिए ऋण लेते हैं जबकि लंबे समय के लिए देते हैं। परिणामस्वरूप अगर एसबीडीआर को नियंत्रण मुक्त किए जाने के बाद बैंकों के संपत्ति और देनदारी में आए असंतुलन का रुख ऊपर की ओर होता तो उम्मीद की जाती कि बैंक अपनी परिपक्वता अवधि को सीमित करेंगे। साथ ही वे इंटरेस्ट रेट फ्यूचर्स और स्वैप का इस्तेमाल कर इंटरेस्ट रेट से जुड़े जोखिम की हेजिंग करेंगे। बहरहाल, भारतीय ब्याज दरों के वायदा बाजार में नकदी की स्थिति नगण्य ही है।
आरबीआई और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड को ब्याज दर वायदा बाजार के विकास के लिए मिलकर काम करना चाहिए। इसके लिए उन्हें देश के सरकारी अल्प परिपक्वता वाले प्रतिभूति बाजारों में नकदी बढ़ानी चाहिए। इसके अलावा बगैर कागजी कार्रवाई वाले डेरिवेटिव्स के सेटलमेंट को भी एक्सचेंजों समेत तमाम केंद्रीय क्लियरिंग प्लेटफार्मों की गारंटी मिलनी चाहिए। आरबीआई द्वारा की गई व्यवस्था के मुताबिक ओटीसी डेरिवेटिव्स के कम से कम एक प्रतिपक्ष का नियमन आरबीआई के जरिए होना चाहिए और स्टॉक ब्रोकरों को इससे बाहर रखना चाहिए। बाजार में प्रतिभागियों की संख्या बढ़ाने का एक तरीका यह भी है कि आरबीआई समवर्ती तरीके से उन ब्रोकरों का नियमन करे जो ओटीसी बाजारों में प्रतिपक्ष के रूप में काम करते हैं।
पांचवां प्रश्न पैसे निकालने की बारम्बारता से और इस बात से संबंधित है कि क्या बैंकों को उस स्थिति में ऊंची ब्याज दर देनी चाहिए जबकि बचत खाताधारक के पास चेक बुक की सुविधा न हो। ऐसे मामलों में बैंकों को प्रतिस्पर्धा के आधार पर निर्णय लेने चाहिए।
हालांकि इस संबंध में अलग अलग लोगों के अलग मत हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड के अंग्रेजी संस्करण के 11 मई के अंक में एचडीएफसी और यस बैंक के प्रबंध निदेशकों ने इस विषय पर जुदा राय रखी। एचडीएफसी के एमडी के मुताबिक अगर बचत जमा दरें ऊपर जाती हैं तो इसके साथ ही ऋण दरों, रखरखाव तथा अन्य शुल्कों में इसी अनुपात में इजाफा होगा। वहीं यस बैंक के एमडी का मानना था कि ब्याज दरों के बाजार आधारित होने पर इस श्रेणी के बचतकर्ता को फायदा होगा। इसके अलावा ऐसा होने पर घरेलू बचत का और अधिक हिस्सा बैंकों तक पहुंचेगा।
कुलमिलाकर कहा जाए तो अनेक बैंक परदे के पीछे इन कोशिशों में लगे हुए हैं कि रिजर्व बैंक की एसबीडीआर को नियंत्रण मुक्त करने की प्रक्रिया को किसी प्रकार धीमा किया जा सके। इसके अलावा यह उम्मीद भी की जा रही है कि बैंक बचत खामों पर कम ब्याज चुका कर तथा आवासीय और अन्य तरह के ऋणों की दर ऊंची रखकर मुनाफा कमाने की अपनी कोशिश जारी रखेंगे। हालांकि उनकी इस कमाई की कीमत मुख्यतया मध्यवर्ग और निम्र आय बचत वाले वर्ग को चुकानी पड़ती है। अब समय आ गया है कि इसे समाप्त किया जाए।

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