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उठाएंगे सक्षम कदम तो इस सदी में जोर पकड़ेगा एशिया का दम
अपनी कामयाबी को एशिया जाया नहीं जाने दे सकता। लेकिन संस्थाओं की कमजोरी, अक्षम सरकारें और आय वितरण में असमानता, महाद्वीप के सपने को धुंधला कर सकते हैं। 
राजीव अनंतराम /  May 17, 2011

विकास के अर्थशास्त्र से जुड़ी चर्चाओं में 1970 से ही कई मुद्दों की प्रमुखता रही है। मसलन आर्थिक वृद्घि की प्रक्रिया को निरंतर आगे बढ़ाने के लिए संस्थानों और मानव पूंजी की भूमिका और सार्वत्रिक रूप से आर्थिक वृद्घि के लाभ को पहुंचाने में 'ट्रिकल डाउनÓ प्रभाव की सीमा जैसे विषय प्रमुख रहे हैं। इस महीने की शुरुआत में वियतनाम की राजधानी हनोई में हुई एशियाई विकास बैंक (एडीबी) की सालाना बैठक में ये मुद्दे फिर से उठे। इस बैठक में एशिया 2050 मसौदा रिपोर्ट पेश की गई-जिसमें एहसास कराया गया कि यह सदी एशिया के नाम रहने वाली है।
इस रिपोर्ट में उन छह बिंदुओं की पहचान की गई है जिनके आधार पर आने वाले दशक में एशिया वृद्घि के पथ पर आगे बढ़ेगा। ये हैं तकनीकी उन्नति, पूंजी संग्रहण, जनसांख्यिकीय और श्रम शक्ति, उभरता मध्यम वर्ग, जलवायु परिवर्तन में कमी एवं संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा और संचार क्रांति। इस रिपोर्ट से एक गंभीर संदेश यही निकला कि एशिया अपनी कामयाबी को हल्के में नहीं ले सकता-ऐसे में कुछ विशेष नीतियों के अभाव में उपरोक्त में से कोई भी कारक एशिया के सुनहरे सपनों का रंग फीका कर सकता है।
एशियाई सहस्राब्दि नाम की इस रिपोर्ट में दो भविष्यवाणियां बेहद आशावादी हैं जो मौजूदा लोकप्रिय भावनाओं में निश्चितता के तौर पर नजर आ रही हैं। इस परिदृश्य के तहत एशिया का सम्मिलित सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 1,480 खरब डॉलर हो जाएगा और प्रति व्यक्ति आय (क्रय शक्ति समानता में) 48,500 डॉलर हो जाएगी और वैश्विक उत्पादन का 51 फीसदी एशिया से होगा। इसका कम चमकदार पहलू मध्यम आय का जाल हो सकता है जो इस अवधि में उपर्युक्त श्रेणियों में क्रमश: 610 खरब डॉलर, 20,000 डॉलर और 32 फीसदी हो सकता है।
 एशिया काफी विरोधाभासों वाली जगह है। आखिरकार दुनिया की 10 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से 3 एशिया में है। चीन का जीडीपी 49 खरब डॉलर, जापान का 46 खरब डॉलर और भारत का 16 खरब डॉलर है। इसके साथ ही इस महाद्वीप में अफगानिस्तान, म्यांमार और लाओस जैसे बेहद गरीब देश भी हैं। इन तीन बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के गर्वीले दस्ते के अलावा यहां प्रति व्यक्ति आय में काफी बड़ा अंतर भी है। जापान दुनिया के सबसे अमीर देशों में शुमार है, चीन तेजी से 'निम्न मध्य आयÓ की ओर बढ़ रहा है, वहीं भारत अभी भी कम आमदनी वाली श्रेणी में अटका हुआ है। इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि महाद्वीप के अमीर और गरीब देशों के बीच कोई विशेष जुड़ाव नजर नहीं आता। रिपोर्ट के मुताबिक भविष्य में संभावित वृद्घि पूर्व और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के इर्द-गिर्द ही मंडराएगी जिसमें भारत की भी अहम भूमिका होगी।
कार्यपद्घति या प्रक्रिया को एक तरफ हटा दें तो मध्य आय जाल के रूप में आर्थिक अटकाव को गंभीरता से लिए जाने की जरूरत नहीं है। मध्य आय जाल का यह जुमला उन देशों के विकास के अनुभव से उपजा है जिन्होंने शुरुआती स्तर पर तो बेहद दु्रत गति के साथ विकास किया लेकिन दीर्घकाल में उस रफ्तार के साथ ये देश सामंजस्य नहीं बिठा सके और मध्य आय स्तर पर आकर ठहर गए। इस पैमाने पर दक्षिण अमेरिकी देश काफी खरे उतरते हैं जहां ठहराव आने से पहले प्रति व्यक्ति जीडीपी तेजी से 3,000 से 4,000 डॉलरर के स्तर पर पहुंचा।
विश्लेषणात्मक अध्ययन विशेषकर विश्व बैंक द्वारा किए गए अध्ययन में इन देशों के कुछ विशेष लक्षण सामने आए हैं। जैसे संस्थाओं की कमजोर क्षमताएं, क्योंकि बड़ी अर्थव्यवस्था द्वारा जनित मांग को पूरा करने में ये संस्थान आमतौर पर नाकाम रहे हैं, प्राय: ढुलमुल सरकार और आमदनी और अवसरों के लिहाज से संरचानत्मक असमानता।
दीर्घ-अवधि की आर्थिक वृद्घि पर आय असमानता का प्रतिकूल प्रभाव मामूली सा ही है और ऐसा जिस पर एशिया 2050 रिपोर्ट में प्रकाश डाला गया है। इसके निष्कर्ष को कहीं भी पुष्टï किया जा सकता है। एल्बर्टाे एलेसिना और डानी रॉड्रिक द्वारा 65 औद्योगिक अर्थव्यस्थाओं पर किए गए एक अध्ययन में यह सामने आया है कि जिन देशों में निम्न और मध्यम आमदनी वाले वर्गों का आर्थिक गतिविधियों में ज्यादा हिस्सा है वहां पर आर्थिक वृद्घि की दर निरंतर ऊंची बनी हुई थी जबकि जिन देशों में आमदनी का मुख्य हिस्सा देश की शीर्ष 20 फीसदी आबादी में केंद्रित था वहां इसका उलट रुझान था। व्यापक रूप से आय असमानता के प्रतीक बने ब्राजील और मैक्सिको बिना किसी हैरानी के मध्य आय जाल की सटीक मिसाल साबित हुए हैं। समानता महज समान हिस्सेदारी का ही मसला नहीं है। विशुद्घ व्यावहारिक अर्थों में देखा जाए तो आबादी का एक बड़ा हिस्सा जो घरेलू अर्थव्यवस्था में योगदान करने में सक्षम नहीं है तो वह वृद्घि को ही प्रभावित करेगा।
रिपोर्ट में उल्लिखित चेतावनियों पर ध्यान देकर भारत बढिय़ा करेगा। यदि भारत मध्य आमदनी के जाल के आसपास या उसी स्तर पर पहुंच जाता है तो वैश्विक, सकल और प्रति व्यक्ति स्तर के पैमाने पर की जाने वाली तुलना में वह एशियाई सदी के मानकों से पीछे छूट जाएगा। उदाहरण के तौर पर एशियाई सदी में मध्य आमदनी जाल प्रति व्यक्ति आय 42 फीसदी रहनी चाहिए। ऐसे में कोई भी गिरावट खतरे की घंटी ही होगी। रिपोर्ट में उल्लिखित छह मानकों के मौजूदा रुख के हिसाब से भारत में पूंजी संचयन की स्थिति बेहतर दिशा में है हालांकि अन्य पांच पैमानों पर भी बेहतरी अपेक्षित है। तकनीकी प्रगति (इसका मूल्यांकन बौद्घिक संपदा में बढ़ोतरी के मामलों से किया जाता है) क्षमता के हिसाब से कम है, सामाजिक क्षेत्र पर व्यय की स्थिति भी कामचलाऊ सी है और भारत अभी भी संसाधनों के हिसाब से तंगहाल अर्थव्यवस्था बना हुआ है।
इसके लिए राह सुगम करनी है तो भौतिक और मानव पूंजी के विकास में काफी खर्च करना होगा, शोध एवं विकास में निवेश बढ़ाना होगा, नीतियों को इस तरह से तैयार करना होगा कि नवीनता को प्रोत्साहन मिले (जैसा कि विज्ञान, तकनीक और नवीनता (एसटीआई) अधिनियम, 2003 करने की कोशिश करता है) और हरित तकनीक में निवेश में इजाफा किया जाए। इन मानकों में एक ऊंचा अंतर्सबंध है। यह बताता है कि सावधानी से बनाई गई सक्षम नीतियां सतत वृद्घि और विकास को कई चरणों में फैला सकती हैं। जैसा कि अंतरराष्टï्रीय विकास के जानकार माइकल वॉल्टन तर्क देते हैं कि भारत में असमानता का ढांचा काफी गहरा है और यह शीर्ष स्तर पर धन में उछाल से और नुमाया हो रहा है (हालांकि राष्टï्रीय सैंपल सर्वे के आंकड़ों में यह प्रतिबिंबित नहीं होता), क्षेत्रीय और समूह स्तर पर अवसरों में विषमता और असमानता बढ़ रही है। वास्तव में, शिक्षा तक कुछ विशेष सामाजिक-आर्थिक तबके की पहुंच न होना भी इस मौजूदा विषमता को और बढ़ा रहा है, खासतौर से 1991 में आर्थिक सुधारों के सूत्रपात के बाद कौशल आधारित श्रम की मांग भी एक कारक है।
यह अगला दशक ही तय करेगा कि विकास के मामले में भारत ब्राजील या फिर दक्षिण कोरिया का अनुसरण करेगा। दिलचस्प बात यह है कि जहां ब्राजील मे हाल में आय असमानता कम हुई है वहीं पूर्वी एशिया में इसमें इजाफा हुआ है। भारत की वृद्घि की अपरिहार्यता का अनुमान लगाना बेहद आसान है। बहरहाल एक तेजी से विकास कर रही अर्थव्यवस्था की उम्मीदों को पूरा करने के लिए संस्थाओं के स्तर पर सुधारों में तेजी लानी ही होगी। 1990 में हॉवर्ड में अमत्र्य सेन ने समानता को 'सामाजिक जरूरतÓ करार दिया था। एशिया 2050 रिपोर्ट उसे एक आर्थिक जरूरत बना देती है।

Keyword: rajeev anantram,
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