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कृषि विज्ञान केंद्र कर पाएंगे खेती में नवजीवन का संचार
खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  May 03, 2011

पुलिस और अद्र्घसैनिक बलों के जवान देश के नक्सल प्रभावित जिलों में उनसे बचने के लिए भले ही सावधानीपूर्वक कदम बढ़ाते हों लेकिन कृषि वैज्ञानिक इन इलाकों में आराम से आतेजाते हैं और कृषि विकास से संबंधित तकनीक का प्रसार करते हैं।

यहां तक कि स्थानीय लोग और अतिवादी, दोनों ही उनका एक समान स्वागत करते हैं। झारखंड के भुंबला और महाराष्ट्र के गोंदिया, सोनभद्र और गढ़चिरौली जैसे जिलों में स्थित कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) के अधिकांश वैज्ञानिकों का अनुभव यही कहता है। ये वैज्ञानिक संसाधनहीन गरीब लोगों को यह दिखाते हैं कि कैसे अपने छोटे खेतों से होने वाली आय को बढ़ाया जाए ताकि ग्रामीण हलकों के युवाओं को चरमपंथ से विमुख करने में मदद मिल सके।

राज्य सरकारों के कृषि विस्तार कार्यकर्ता और कच्चे माल के आपूतिकर्ता आमतौर पर अंदरूनी इलाकों की अनदेखी कर देते हैं। जाहिर सी बात है कि इन क्षेत्रों के किसानों को आधुनिक कृषि से जुड़ी तकनीक और संबंधित ज्ञान आदि नहीं मिल पाता। इसके अलावा उन्हें पैदावार में इजाफा करने वाला कच्चा माल जैसे कि अच्छे बीज, उर्वरक, कीटनाशक तथा अन्य संवर्धित उपकरण भी नहीं मिल पाते।

केवीके को पूरी तरह भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) से धन मिलता है, हालांकि उसे विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों और अन्य शोध एवं विकास संगठनों के जरिए चलाया जाता है। इन संगठनों को ऐसे क्षेत्रों में किसानों के बीच काम करने का निर्देश दिया जाता है जहां वे कुछ खास परिस्थितियों में काम करने वाली ऐसी तकनीक हस्तांतरित करते हैं। आईसीएआर के उपमहानिदेशक (प्रसार) और केवीके के प्रभारी केडी कोकाटे ने कहा, 'केवीके के वैज्ञानिक अब जमीन के तमाम हिस्सों से अधिकतम आय अर्जित करने की कोशिशों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं ताकि मुनाफे में कमी के चलते खेती में रुचि गंवा रहे युवाओं को इस ओर वापस आकर्षित किया जा सके।'

चूंकि भारत में अधिकांश किसानों की जोत छोटी और असिंचित है इसलिए द्वितीयक खेती और मधुमक्खी पालन, छोटे पैमाने पर मुर्गी पालन, बकरियां पालना तथा वर्मीकल्चर आदि आय में इजाफा करने का बड़ा जरिया है।

केवीके किसानों को अलग-अलग तरह की खेती करने के तरीकों को अपनाने की सलाहियत देते हैं ताकि वे अतिरिक्त आय कमा सकें। निश्चित तौर पर केवीके का मूल विचार किसानों और ग्रामीण युवाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिलाना और उन्हें कच्चे माल के आपूर्तिकर्ताओं और कारोबारियों से जोडऩे का था। बहरहाल, बदलती कृषि-आर्थिक परिस्थितियों के दरमियान उनकी भूमिका में भी बदलाव आता गया।

केवीके अपने क्षेत्र के आसपास स्थित संस्थानों से प्रासंगिक तकनीक हासिल करते हैं और उन्हें किसानों को हस्तांतरित कर देते हैं। लेकिन ऐसा करने के पहले वे उन्हें किसानों को सौंपने के पहले अपने यहां अपनाकर देखते हैं। इस प्रक्रिया के द्वारा वे यह देखते हैं कि स्थानीय परिस्थितियों में यह कितनी प्रभावी साबित होगी। तकनीक में स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक थोड़ा बहुत बदलाव भी किया जाता है। यकीनन इसका उद्देश्य किसानों को ऐसी तकनीक उपलब्ध कराना है जो उनके संसाधन ढांचे के अनुकूल हो और उन्हें बाजार की मांग के मुताबिक उत्पाद तैयार करने में मददगार साबित हो। बहरहाल अब इन केवीके को ज्ञान और संसाधन के केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां तकनीक और निर्देशन संबंधी सहायता उपलब्ध कराए जाने के अलावा जल एवं मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं और फसल में होने वाली बीमारियों तथा उसमें लगने वाले कीटों से निपटने के तरीकों के रूप में सहायक सेवाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी।

कोकाटे कहते हैं,'आज के किसानों की प्राथमिकताओं में बढिय़ा उत्पादन व्यवस्था और कृषि क्षेत्र से जुड़े व्यापार तक पहुंच जैसी बातें शामिल हैं। ऐसे में ज्ञान आधारित सशक्तीकरण कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है। केवीके उनकी इन्हीं जरूरतों को पूरा करने की कोशिश कर रहा है।'

इसके लिए केवीके को ई-कनेक्टिविटी मुहैया कराई जा रही है ताकि वे न केवल एक दूसरे के साथ और आईसीएआर के साथ संपर्क में रहें बल्कि वे कृषि संबंधी सूचनाओं को कहीं अधिक तेजी के साथ प्रसारित कर सकें। एक नए कदम के रूप में किसानों को मोबाइल फोन के जरिए खेती के कामकाज के बारे में संदेश दिए जा रहे हैं। इसके अलावा यह मौसम के पूर्वानुमान, पौधों की बीमारियों और अन्य समस्याओं के बारे में 'चेतावनी' भी जारी करता है। यह भी बताया जाता है कि इन सब समस्याओं से कैसे निपटा जाए।

केवीके के वैज्ञानिकों और विषय विशेषज्ञों का नवीनतम उद्देश्य है, 'किसान पहले'। वह किसानों के साथ निरंतर संपर्क में रहते हैं और इस तरह सूचना का दो स्तरीय आदान प्रदान होता है।  एक तो वैज्ञानिकों से किसानों की ओर सूचना का प्रसार होता है और साथ ही किसानों की प्रतिक्रिया सीधे वैज्ञानिकों को प्राप्त होती है।

इस समय तकरीबन 588 केवीके लगभग तमाम जिलों में काम कर रहे हैं और उन्होंने कृषि विस्तार के अनूठे प्रारूप के तौर पर दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। दरअसल, अनेक अफ्रीकी देश आईसीएआर के साथ संपर्क में हैं और वे केवीके मॉडल के अनुकरण में उसकी सहायता चाहते हैं। आईसीएआर इन देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है और उम्मीद है कि ये केवीके उन देशों में भी परिवर्तन के मुख्य स्त्रोत के रूप में काम करेंगे।

Keyword: agri scientists, KVK, ICAR,
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