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निर्णायक मोड़
संपादकीय /  May 03, 2011

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अपने मौद्रिक नीति संबंधी वक्तव्य और उसके अनुगामी नीतिगत कदमों के जरिए चालू वित्त वर्ष में देश की व्यापक आर्थिक नीति के मानकों को नए सिरे से परिभाषित करना चाहा है। अपनी पतवार समेट कर धारा के साथ बहने के बजाय केंद्रीय बैंक ने नए नियम तय किए हैं। उम्मीद की है कि सरकार उनका अनुपालन करेगी। आरबीआई का यह जोर देना उचित है कि उच्च मुद्रास्फीति स्थायी विकास के लिए प्रतिकूल कारक है और महंगाई का मौजूदा स्तर और अनुमान भविष्य की विकास दर के लिए महत्त्वपूर्ण खतरा है। साथ ही महंगाई  को नीचे लाने के लिए विकास अनुमानों को कम करने का विकल्प चुनकर आरबीआई ने मध्यावधि में केंद्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा राजकोषीय सुधार को गड़बड़ा दिया है।

वित्त वर्ष 2011-12 के लिए देश के आर्थिक सुधार संबंधी पूर्वानुमानों को समायोजन में घटाकर 7.5 से 8.5 फीसदी कर दिया गया है और मौद्रिक नीति संबंधी कदम इस आधार पर उठाए गए हैं कि जब तक महंगाई दर को ठीक से नियंत्रित नहीं किया जाएगा तब तक मध्यावधि में विकास संबंधी पूर्वानुमान वर्तमान में अनुमानित अल्पावधि की घोषित विकास दर से कमतर रहेगा। इस वर्ष के बजट संबंधी आकलन में जहां विकास और महंगाई का अनुपात 9:5 था वहीं अब आरबीआई ने विकास अनुमान में कमी और महंगाई अनुमान में इजाफे के साथ इसे सुधार कर 8:6 कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप नीतिगत दरों में 50-50 आधार अंक की बढ़ोतरी की गई है। रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति की सफलता के लिए इसे वित्त मंत्रालय की ओर से सहायक नीतिगत कदमों की आवश्यकता होगी। इसमें सब्सिडी में धीमे-धीमे कमी लाना और अन्य खर्चों में कटौती शामिल है। जहां वित्त मंत्री के पास इस संबंध में अपनी जिम्मेदारियां हैं, वहीं उद्योग जगत को यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने होंगे कि लागत आधारित महंगाई कहीं मांग आधारित महंगाई पर दबाव न डाले।

रिजर्व बैंक का अनुमान है कि कीमतों में कमजोरी आएगी और उसे उम्मीद है कि इससे मेहनताने और कीमत के उस भंवरजाल को तोडऩे में मदद मिलेगी जिसके चलते महंगाई बढ़ती है। बहरहाल तेल की कीमतों में आगे और मजबूती तथा खराब मॉनसून जैसे बाहरी कारण इस योजना को चोट पहुंचा सकते है। न तो केंद्रीय बैंक और न ही सरकार का ऐसे बाहरी कारणों पर कोई नियंत्रण है, ऐसे में स्वाभाविक तौर पर रिजर्व बैंक ने अपने नियंत्रण में आने वाले कम से कम एक कारक यानी कि नीतिगत दर के क्षेत्र में कदम उठाने का निर्णय लिया। रिजर्व बैंक के इस नीतिगत कदम का महत्त्व यह है कि इसने नई परिचालन प्रक्रिया के साथ मौद्रिक नीति के नए पैमाने भी तय किए हैं। इसमें ओवरनाइट कॉल मनी रेट, मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (एमएसएफ) के रूप में एक नई शुरुआत तथा रीपो और रिवर्स रीपो दर में एक स्थायी रिश्ता जैसी बातें शामिल हैं।रीपो दर को इकलौती नीतिगत दर के रूप में परिभाषित किया गया है, शेष सभी दरों को इसके मुताबिक समायोजन करना होगा।

एक विशेषज्ञ समिति द्वारा अनुशंसित एक दर वाली प्रणाली की ओर बढऩे से मौद्रिक बाजारों की अनिश्चितता कम करने में मदद मिलेगी और नीतिगत संदेशों का संचरण अधिक तेजी से होगा। आखिरकार, रिजर्व बैंक ने बचत जमा दरों में 50 आधार अंकों की बढ़ोतरी कर देश के मध्यवर्ग को राहत दी है जबकि बचत दरों को नियंत्रण मुक्त करने का मामला भविष्य में कार्रवाई के लिए छोड़ दिया गया है।  गवर्नर सुब्बाराव का वक्तव्य वृहद अर्थव्यवस्था के नीति निर्माण में निर्णायक मोड़ है। इसका असर सकारात्मक होगा अथवा नकारात्मक, यह आने वाला समय ही बताएगा।

Keyword: monetry policy statement by RBI, inflation & development,
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