बिजनेस स?टैंडर?ड - चंदेरी के बुनकरों की बढ़ती चमक
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चंदेरी के बुनकरों की बढ़ती चमक
अंजलि भार्गव /  June 16, 2008
मध्यप्रदेश के अशोकनगर जिले का एक छोटा सा गांव-चंदेरी। पारा 42 से 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने के बावजूद यहां भीषण गर्मी से राहत का कोई नामोनिशान नहीं।
खाली सूखी जमीन पर धूल देखकर ऐसा लगता है कि महीनों से इस जमीन को बारिश की बूंदों ने तर नहीं किया है। यहां पानी की काफी किल्लत है और टैंकर के पानी के जरिए स्थानीय लोगों की जरूरतों को पूरा किया जाता है। यहां के स्थानीय निवासियों में 1000 बुनकर भी शामिल हैं।

ये बुनकर अब भी अपना काम तो जारी रखे हुए हैं। लेकिन यहां के मशहूर चंदेरी वस्त्रों की मांग कम होने की वजह से उनको काफी बड़ा झटका लगा है। वास्तव में यहां के हालात बेहद नाजुक हैं फिर भी इस गांव में उम्मीद और उत्साह कायम है। इसकी वजह यह है कि इस गांव के 455 बुनकर परिवार एक ऐसी कंपनी के शेयरों के मालिक बनने जा ररहे हैं जिसका मालिक उनका अपना समुदाय है।

कुछ युवा लोगों को छोड़कर गांव के  दूसरे लोगों के लिए यह अवधारणा बिल्कुल ही नई है। मोहम्मद जुबैर अंसारी की उम्र है 28 साल और उन्होंने स्नातकोत्तर की डिग्री भी ली है। जब उन्हें कोई नौकरी नहीं मिली तो उनके पास करघे का ही विकल्प था। हालांकि वह अब भी विकास के पैरोकार हैं और उन्होंने अपनी कोशिश जारी रखी है। उनका कहना है, 'हम लोगों ने 1000 रुपये के शेयर खरीदे हैं और मैं जानता हूं कि इससे हमारी जिंदगी में किसी तरह का बदलाव जरूर आएगा।'

यह रास्ता दिखाया है रिटेल आउटफिट फैब इंडिया ने, जिसका 1990 के दशक में मात्र एक स्टोर हुआ करता था और आज उसके स्टोरों की संख्या 85 तक पहुंच गई। लगभग 9 साल पहले सामुदायिक स्वामित्व वाली कंपनियों के साथ एक प्रयोग किया गया था। जिसका मकसद वस्त्रों और हस्तशिल्प के रचनात्मक काम के जरिए कारीगरों को बेहतर मौका मुहैया कराना था ताकि वे तरक्की कर सकें।

फैब इंडिया की सहायक इकाई 'आर्टिसंस माइक्रो फाइनेंस' एक उद्यम कोष है जो इस तरह की कई कंपनियों को स्थापित करने का काम करती है। इस 'आर्टिसंस माइक्रो फाइनेंस' का 49 फीसदी हिस्सा इसका अपना होता है जबकि 26 फीसदी हिस्सा कारीगरों का होता है। निजी निवेशकों का हिस्सा लगभग 15 प्रतिशत होता है जबकि 10 प्रतिशत हिस्सा सामुदायिक स्वामित्व वाली कंपनियों के  कर्मचारियों का होता है।

इन चार श्रेणियों के  निवेशकों द्वारा किए गए निवेश से इसको चुकता पूंजी मुहैया होती है। फैब इंडिया इस तरह के कारीगर समुदाय के बनाए हुए सामान का सबसे बड़ा खरीदार है। कंपनी इस तरह की बिक्री के लिए कारीगरों को काफी प्रोत्साहित भी करती है। इस तरह की कंपनियां फैब इंडिया के अलावा दूसरे खरीदारों को भी अपना माल बेचती हैं। हरियाणा और फरीदाबाद ने स्वतंत्र रूप से अपनी बिक्री शुरू की है।

एक साल में जितनी बिक्री होती है उसमें से खर्च का हिस्सा और टैक्स को घटा कर साल का मुनाफा निकाल लिया जाता है। इसी आधार पर कंपनी का आकलन कर लिया जाता है और इसके शेयरों की बढ़ी हुई कीमत का भी अनुमान लगाया जाता है। कारीगरों को कई तरह से मुनाफा होता है। उनके शेयरों की कीमत बढ़ जाती है। जब कंपनी फायदे में होती है तो उन्हें भी इसमें से लाभांश मिलता है। कंपनी बैंकों के माध्यम से कारीगरों को लोन देती है।

इस कर्ज का इस्तेमाल नए करघे खरीदने और दूसरी चीजों  के उत्पादन का विस्तार करने के लिए किया जाता है। कंपनी की आंतरिक व्यापार व्यवस्था के जरिए कारीगर अपने शेयरों की खरीद-बिक्री का काम भी कर सकते हैं। हालांकि गांव के लोग इसे एक जुआ समझते हैं। एक साल पहले जोधपुर में एक सामुदायिक स्वामित्व वाली कंपनी बनाई गई जो आज करीब 1.10 करोड़ रुपये की कंपनी है। इस कंपनी की चुकता पूंजी 34 लाख रुपये है।

कंपनी ने 5.7 करोड़ रुपये की बिक्री की और टैक्स देने के बाद पहले साल में उसे कुल 22 लाख रुपये का मुनाफा हुआ। इस कंपनी में 2300 कारीगर शेयरहोल्डर हैं। उनके 100 रुपये वाले शेयरों की कीमत अब 300 रुपये हो गई है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी के पास 10 शेयर हैं और मान लीजिए उसने इस पर 1000 रुपये का निवेश किया है तो उसकी कीमत बढ़कर 3000 यानी तिगुनी होर् गई ।

इस तरह की बढ़ोतरी की उम्मीद तो कारीगरों ने कतई नहीं की होगी। इस तरह की जटिल आंतरिक व्यापार व्यवस्था के जरिए अगर एक कारीगर चाहे तो अपने निवेश की रिकवरी भी करता है। अगर चंदेरी और जोधपुर की बात की जाए तो इसे एक शुरूआत कह सक ते हैं। अब तक 17 सामुदायिक स्वामित्व वाली कंपनियां स्थापित की गई हैं।

इनमें कुल 6000 कारीगर शेयर होल्डर हैं। फैब इंडिया इस तरह की 100 कंपनियों को बनाने की उम्मीद कर रही है जिसमें वह अपनी आपूर्ति के स्रोत को अलग हिस्सों में बांट देगी। ये 100 कंपनियां 21 राज्यों में होंगी जहां 100,000 कारीगर होंगे।

कौन हैं प्रेरणास्रोत

फैब इंडिया के प्रबंध निदेशक विलियम बिसेल ने इस तरह के मॉडल की कल्पना की और इसे एक रूप देने की कोशिश की थी। उनका कहना है कि दूसरी भारतीय कंपनियों की तरह वह कॉरपोरेट सोशल रेस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) के  लिए कोई एक विभाग बनाने की कोई कोशिश नहीं करना चाहते।

उनका कहना है, 'अगर कोई वाकई सीएसआर के बारे में थोड़ा भी गंभीर है तो उसे यह जानना चाहिए कि यह जिम्मेदारी कंपनी के वाइस प्रेसीडेंट की है। मैंने ऐसे कई लोगों को देखा है जो दोहरे मापदंड अपनाते हैं। इससे संगठन के अंदर और बाहर कई तरह की विभिन्नताएं नजर आने लगती हैं। हमारी सम्मिलित कोशिश हमारे ब्रांड की खासियत  दर्शाती है।

आप जिन चीजों में यकीन करते हैं, और अगर आप उन्हें करते हैं तो वे ही आपकी खासियत और पहचान बन जाती हैं।' उनका मानना है कि कारीगरों को इसमें शामिल करना और कंपनी के मुनाफे में उन्हें हिस्सेदार बनाना अच्छी बात है। इसके जरिए लंबा रिश्ता कायम किया जा सकता है। उनके मुताबिक इस तरह की बाजार व्यवस्था के जरिए गरीबी खत्म करने की बेहतर पहल की जा सकती है। हालांकि इस तरह की व्यवस्था को कोई खास महत्व नहीं मिल पाया है।

वह रघुराम राजन की किताब का हवाला देते हुए तर्क देते हैं कि भारत अब पूंजीवादी व्यवस्था को अपनाने की राह पर बढ़ रहा है। हालांकि कोई भी वास्तविक पूंजीवादी व्यवस्था के  लिए कोई मौका नहीं देना चाहता है।

बिसेल कहते हैं, 'अगर पूंजीवादी व्यवस्था का लाभ सबको मिलेगा तो जाहिर है इसका असर सकारात्मक ही होगा।' उनकी किताब जल्द ही पूरी होने वाली है। इस किताब का नाम है 'रीइमैजिंग इंडिया'। इन शेयरों के जरिए कारीगरों को अपनी अलग संपत्ति के मुताबिक वर्ग मिलता है (मसलन जमीन के बंटवारे में कई तरह का  झंझट होता है। गहनों का बंटवारा भी संभव नहीं हो पाता)।

सामुदायिक स्वामित्व वाली कंपनी के जरिए फैब इंडिया के कारीगर उसकी संपत्ति बन जाते हैं। बिसेल का कहना है, 'ये सभी ऐसे कदम हैं जिनका आकलन किसी बैलेंस शीट पर नहीं किया जा सकता। लेकिन मैं यकीन करता हूं कि अगर हम अपने आपूर्तिकर्तोओं और इन कारीगरों को सामुदायिक स्वामित्व वाली कंपनियों के जरिए लाते हैं तो ये सभी फैब इंडिया की संपत्ति का एक खास हिस्सा बन जाएंगे।' हालांकि यह मॉडल केवल सामाजिक नजरिए से ज्यादा बेहतर नहीं माना जा सकता है।

फैब इंडिया 1960 के दशक में निर्यात करता था। फिलहाल उसका कारोबार 300 करोड़ रुपये का है जिसमें घरेलू बिक्री लगभग 90 प्रतिशत है। इसका लक्ष्य लाइफ स्टाइल की जरूरी चीजों का बड़े पैमाने पर विकल्प मुहैया कराना है। फैब इंडिया साबुन, कपड़े और फर्नीचर से लेकर जैविक खाद्य पदार्थ भी उपभोक्ताओं को मुहैया कराती है। उसका दावा है कि ये सारी चीजें प्राकृतिक चीजों से बनी हैं और पर्यावरण के अनुकूल हैं और इनसे प्रदूषण भी नहीं फैलता।

ये सारे विकल्प शिल्प आधारित प्रक्रियाओं से  बनते हैं। कंपनी का कहना है कि वह अपने लिए कोई तयशुदा लक्ष्य पहले से नहीं बनाती लेकिन अगले चार सालों में इसके 250 स्टोर जरूर खुल जाएंगे। आर्टिसंस माइक्रो फाइनेंस की निदेशक स्मिता मांकड  ने एबीएन एमरो को इस वजह से छोड़ा था ताकि वे अपने मन मुताबिक कोई  सार्थक काम कर सकें।

उनका कहना है, 'अगर आप हमारी तरह विकास करना चाहते हैं तो आपको अपने सप्लायर बेस को मजबूत रखना होगा।' वह जोर देते हुए कहती हैं कि फैब इंडिया की तरक्की कारीगरों की तरक्की पर ही निर्भर है, अगर कारीगरों के लिए कुछ बेहतर नहीं होता तो यह संभव नहीं है कि फैब इंडिया की तरक्की हो जाए। फैब इंडिया का कारोबार कारीगरों के हुनर और मेहनत पर निर्भर है।

इस प्रक्रिया या ऐसे उद्योगों को कोई रोक नहीं सकता है जैसा कि चीन में बड़े पैमाने के उद्योगों के साथ हुआ। इस तरह की सामुदायिक स्वामित्व वाली कंपनियों के जरिए लोगों की जिंदगी में बेहद सुधार आता है। बिसेल का कहना है, 'अगर वे अपनी बेटी की शादी करना चाहते हैं या उन्हें पैसों की जरूरत होती है तो वे अपने शेयर बेच सकते हैं और अपनी जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। वे अपने शेयरों को कंपनी को देकर उन पर लोन भी ले सकते हैं।'

दो तरफा प्रक्रिया

अगर फैब इंडिया कारीगरों के काम के  तरीके को बदल रही है तो इस तरह का नया मॉडल फैब इंडिया के काम में भी एक बदलाव ला रहा है। सामुदायिक स्वामित्व वाली कंपनियां परंपरागत मालगोदामों को अपना सामान स्टोर करने के लिए रखती हैं जिसके जरिए सामान सीधे इन्हीं स्टोरों से पूरे देश में भेजा जाता है। इसकी वजह से खर्च में भी कमी आती है और किसी बिचौलिए की जरुरत भी नहीं होती है।

हालांकि यह व्यवस्था सुचारु रूप से काम कर रही है लेकिन इस राह में चुनौतियां भी हैं। एक चुनौती सेकंडरी मार्केट बनाने की है ताकि कारीगरों की ये कंपनियां अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। इसमें एक बात बेहद खास है कि कारीगरों को बेहतर डिजाइन बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है ताकि उनके उत्पादों के लिए लोगों में आर्कषण पैदा हो।

बिसेल का कहना है कि यह मॉडल काफी हद तक कारीगरों पर निर्भर है और दोनों के साथ होने का अपना फायदा भी है। बेशक यह संस्था एक कोऑपरेटिव संस्था की तरह काम नहीं करती। बिसेल कहते हैं, 'कोऑपरेटिव संस्था उन पर कई तरह के  प्रतिबंध लगाती है और बदले में कोई खास मुनाफा भी नहीं देती। अगर आप साथ होकर कोई कारोबार में अपना योगदान देते हैं तो आपको बड़ा मुनाफा तो होता ही है।'

ऐसा ही कुछ चंदेरी में देखने को मिल रहा है। अंसारी का कहना है कि उसके परिवार में सात लोग थे। सब पर गरीबी की मार पड़ रही थी और उनका भविष्य भी अनिश्चित था। बुनकरों को एक मीटर कपड़ा बनाने पर 13 रुपये मिलते थे। इसके अलावा सेठ से प्रति साड़ी के आधार पर काफी मोल-तोल भी करना पड़ता था। उनका भुगतान भी काफी अनियमित होता था। उसके दूसरे बुनकर दोस्त अपना गुजारा करने के लिए गांव छोड़ने लगे ताकि उन्हें कमाने का दूसरा विकल्प कहीं मिल सके ।

यूनिडो प्रोजेक्ट के जरिए उनकी जिंदगी सुधारने के लिए कोशिश की । फैब इंडिया यहां बहुत बड़ा बदलाव लेकर आई। उसने चंदेरी से साल भर में एक करोड़ रुपये का क पड़ा लेना शुरू किया। इसी वजह से अब कारीगरों को एक मीटर के लिए 23 रुपये मिलने लगे। अब अंसारी के  दोनों करघों पर दिन भर काम चलता रहता है। उसके पास 10 शेयर भी हैं और बेहतर भविष्य का वादा भी है।
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