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कंपनी का लाड़ करेगा जेब को बीमार
कंपनी समूह स्वास्थ्य बीमा में कर्मचारियों को भी चुकाना पड़ सकता है इलाज का खर्च
नीलाद्रि भट्टाचार्य / मुंबई April 15, 2011

अगर आपकी कंपनी ने आपकी सेहत का खयाल करते हुए आपको स्वास्थ्य बीमा की सुविधा दी है तो अब आप उसकी अधिक कीमत चुकाने के लिए तैयार हो जाइए। समूह की स्वास्थ्य योजनाओं के नवीकरण के दौरान अधिकतर कारोबारी कंपनियों ने इसका कुछ हिस्सा कर्मचारियों से वसूलने (को पेमेंट) का विकल्प चुना है।

इस तरह की योजना अपनाने वाले समूहों को बीमा कंपनियां प्रीमियम पर 10-30 फीसदी की रियायत दे रही हैं। उद्योग के अधिकारियों के अनुसार सामान्य समूह स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के प्रीमियम में 25-30 फीसदी इजाफा होने के कारण उनके 50 फीसदी ग्राहक कंपनियों ने को पेमेंट के विकल्प को तवज्जो दी है।

को-पेमेंट कई स्तरों पर काम करता है। इस तरह के दावे का भुगतान करते समय कर्मचारी को उस रकम का कुछ फीसदी  या फिर एक तय राशि देनी पड़ती है। इसी तरह योजना में कमरे के किराये की अधिकतम कीमत पहले से तय हो सकती है। दरअसल अस्पताल में होने वाले खर्च में कमरे के किराये का हिस्सा सबसे अधिक होता है।

अगर कर्मचारी द्वारा दी जाने वाली रकम 10,000 रुपये तय की गई है तो किसी भी दावे के लिए उसे सिर्फ 10,000 रुपये ही चुकाने होंगे और बाकी भरपाई कंपनी करेगी। अगर कर्मचारी को कुछ फीसदी रकम का भुगतान करना हो तो उसे 50,000 रुपये के दावे के लिए 10,000 रुपये चुकाने होंगे।

एचडीएफसी अर्गो जनरल इंश्योरेंस के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी रितेश कुमार कहते हैं, 'स्वास्थ्य बीमा योजनाओं से उद्योग को होने वाला घाटा 120-130 फीसदी है। इसके अलावा दावे की रकम बढ़ाने के लिए अस्पतालों के नकली दस्तावेज जमा किये जाते हैं। इससे दावेदार की भी जवाबदेही सुनिश्चित होगी।'

सार्वजनिक क्षेत्र की सामान्य बीमा कंपनी के वरिष्ठï अधिकारी ने बताया, 'प्रीमियम में बढ़ोतरी होने से कंपनियां कवरेज घटा देती हैं या फिर इसके दायरे में कर्मचारी के माता-पिता को हटाकर पति/पत्नी और बच्चों को ही शामिल करती हैं। को पेमेंट विकल्प चुनने के कारण कवरेज की रकम उतनी ही रहती है लेकिन योजनाधारक को कुछ रकम चुकानी पड़ती है।'

Keyword: group insurance policies, companies,
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