बिजनेस स?टैंडर?ड - 'कॉफीÓ को नाकाफी लग रही है मौजूदा 'माफीÓ
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'कॉफीÓ को नाकाफी लग रही है मौजूदा 'माफीÓ
कॉफी उत्पादकों को दी जा रही सब्सिडी से इस क्षेत्र का समग्र विकास नहीं हो पा रहा है बल्कि इससे एक विशेष तबके के हितों की ही हो रही है रक्षा। इसके निहितार्थ समझा रहे हैं
शुभाशिष गंगोपाध्याय /  March 30, 2011

उड़ीसा में कॉफी उत्पादकों ने मांग की है कि जिन गैर-परंपरागत इलाकों में कॉफी के रकबे में बढ़ोतरी हो रही है, उन्हें भी उसके लिए उतनी मात्रा में ही सब्सिडी (सरकारी सहायता) दी जानी चाहिए, जितनी सब्सिडी कॉफी उत्पादन के परंपरागत क्षेत्रों में रकबे में वृद्घि किए जाने पर दी जाती है।
दूसरे शब्दों में कहें तो एक गैर-परंपरागत कॉफी उत्पादक के तौर पर उनका असंतोष इसे लेकर है कि कॉफी बोर्ड परंपरागत उत्पादकों की तुलना में उन्हें काफी कम सब्सिडी देता है। उड़ीसा में कॉफी उत्पादकों का संघ विशेष तौर पर मांग कर रहा है कि कॉफी उत्पादन का दायरा जितनी नई जमीन पर बढ़ाया जाए उसकी 50 फीसदी लागत के लिए सब्सिडी मिलनी चाहिए और इसके लिए संघ प्रति हेक्टेयर 1.75 लाख रुपये की मांग कर रहा है।
फिलहाल बुआई की योजनागत लागत के तौर पर उन्हें 25 फीसदी तक का अनुदान मिलता है जो प्रति हेक्टेयर 60,000 रुपये है। अपने दावे के समर्थन में वे दो बिंदु तर्क के रूप में पेश भी कर रहे हैं। पहला तो यही कि सब्सिडी का मौजूदा मानक वर्ष 1992 के आंकड़ों पर आधारित है और चूंकि तब से लागत काफी बढ़ गई है, ऐसे में सब्सिडी भी बढ़ाई जानी चाहिए। दूसरा बिंदु यही है कि गैर-परंपरागत उत्पादकों को परंपरागत उत्पादकों की तुलना में कम फायदा होता है जो उनके लिए न्यायसंगत नहीं है।
चलिए उनके तर्कों को बिंदुवार कसौटी पर कसते हैं। वर्ष 2011 में लोग तर्क कर रहे हैं कि पिछले 20 वर्षों से दी जा रही सब्सिडी में संशोधन की आवश्यकता है। हालांकि वे बहुत ज्यादा कुछ नहीं कह रहे हैं लेकिन मैं अनुमान लगा रहा हूं कि वे यह कह रहे हैं कि सब्सिडी के चलन के बावजूद गैर-परंपरागत इलाकों में कॉफी उत्पादन का दायरा नहीं फैला है, इसलिए कि उत्पादकों के लिए यह आर्थिक गतिविधि उतनी ज्यादा फायदेमंद और लुभावनी साबित नहीं हुई है।
एक स्वाभाविक सा प्रश्न है कि आखिर गैर-परंपरागत क्षेत्रों में कॉफी उत्पादन बढ़ाना क्यों अहम है? क्या कॉफी एक ऐसी रणनीतिक फसल है जिसे उत्पादित करने की भारत को सख्त जरूरत है, इसके लिए किसी को अपने खुद के आर्थिक मुनाफे पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए? मुनाफे और दूसरी गतिविधियों के मद्देनजर राष्टï्रीय सुरक्षा के लिए कोई व्यापक निहितार्थ हैं?
या फिर, यह एक सार्वजनिक वस्तु है और निजी मुनाफे में आनी वाली कमी इस गतिविधि में निवेश को कम करने में भूमिका अदा करेगी और जो काफी कम है? किस कारणवश मैं इन पंक्तियों के जरिये इस पर संदेह व्यक्त कर रहा हूं, शायद इसलिए कि जीवन भर मैं इस तर्क को समझ नहीं पाया। जब मैं इस विषय में सोचना शुरू करता हूं तो मेरे मस्तिष्क में कई अपरिहार्य निष्कर्ष निकलने लगते हैं।
जैसे- यदि कोई सब्सिडी पिछले 20 वर्ष से लगातार दी जा रही है, उसके बाद भी इसे अनिश्चितकाल तक बढ़ाने और इसके दायरे को फैलाने की बात की जा रही है तब इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता कि इस सब्सिडी को जड़ से ही समाप्त कर देना चाहिए। गैर-परंपरागत क्षेत्रों में अधिक कॉफी उत्पादन के कुछ गैर-व्यावसायिक कारणों पर भी हम गौर कर सकते हैं।
मैं पूरी तरह आश्वस्त हूं कि अगले 20 वर्ष में हमें ऐसे तर्कों से सहमति जताने पड़े क्योंकि तब तक सब्सिडी के कारण इन बागानों में काम करने वालों की तादाद बढ़ती जाएगी और इससे काफी लोगों की आजीविका जुड़ जाएगी। और तब सब्सिडी में किसी भी तरह की कमी या इसे खत्म करने का मतलब होगा कि आप कई लोगों के रोजगार को खतरे में डाल रहे हैं और इस तरह हम तर्क दे सकते हैं कि सब्सिडी का दौर अनंतकाल तक कायम रखा जाए।
इसके अतिरिक्त तब तक गैर-परंपरागत इलाकों में कॉफी की वृद्घि से इस पर निर्भर लोगों की संख्या भी कई गुना बढ़ जाएगी जिनका रोजगार दांव पर लगा होगा। यह भी काफी दिलचस्प है कि कॉफी बोर्ड ने उन कई इलाकों की पहचान की है जहां कॉफी उगाई जा सकती है। हालांकि, मेरा आकलन है कि यह केवल मृदा और मौसम जैसी तकनीकी सक्षमता नहीं हो बल्कि इसकी व्यावसायिक व्यवहार्यता पर भी विचार करना चाहिए। यदि 20 वर्ष की निर्बाध सब्सिडी के बाद कोई और ज्यादा की फरियाद करता है तब ऐसे चयन की प्रक्रिया में कहीं न कहीं बहुत बड़ी गड़बड़ी है।
मैं केवल अंदाजा लगा सकता हूं प्रति हेक्टेयर 1.75 लाख रुपये हेक्टेयर की राशि के साथ कॉफी उत्पादन में लगने वाले भावी लोगों के बच्चे क्या करेंगे। शायद वे कुछ शिक्षा और प्रशिक्षण ग्रहण करेंगे जिसकी परिणति इन्फोसिस जैसी किसी कंपनी के लिए काम करने के रूप में हो सकती है! शायद, मैं कुछ ज्यादा ही नादान बन रहा हूं।
अब मुझे उड़ीसा के कॉफी उत्पादकों के दूसरे कारण पर मंथन करना चाहिए-जो परंपरागत और गैर-परंपरागत क्षेत्रों के उत्पादकों की हिस्सेदारी में अंतर का है। कोई भी सोच सकता है कि परंपरागत इलाकों में कॉफी उत्पादन के लिए कई विशेष लाभ रहे हैं और उनकी इस मामले में शानदार परंपरा भी रही है।
असल में यह विशुद्घ भाग्य का मामला है कि उन्होंने गैर-परंपरागत क्षेत्रों से पहले अपने इलाकों में कॉफी उत्पादन शुरू कर दिया। लेकिन अब वे यह जान गए हैं कि उनके लिए ऐसा अवसर मौजूद है, गैर-परंपरागत उत्पादकों को इस मौके को भुनाना चाहिए और मुनाफा बनाना शुरू करना चाहिए। वास्तव में, यही कारण है कि वे सरकार और बोर्ड को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने मुनाफा बनाने का असल मार्ग भी खोज लिया है-सब्सिडी का रास्ता! और इस तरह वे इक्विटी की मांग कर रहे हैं, यदि सरकार अपनी उदारता से कुछ लोगों के समूह को फायदा पहुंचाती है तब कानून के राज में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत हर किसी को फायदा क्यों नहीं पहुंचाया जाता। एक बार मैं पुन: अचंभे में हूं। कॉफी उत्पादकों को सरकार से जो धन मिल रहा है वह न तो सरकार का है और न ही कॉफी उत्पादकों का। इस धन का ताल्लुक कॉफी पीने वालों से है। बोर्ड के पास जाने के बजाय क्या कॉपी उत्पादकों को यह नहीं पूछना चाहिए कि वे किसका धन लेना चाहते हैं?
यह सब्सिडी देने वाली सरकार और सब्सिडी लेने वाले उत्पादकों की जिम्मेदारी नहीं है कि वे इस बात की व्याख्या करें कि वे किसके धन का चलन चला रहे हैं और यह सब्सिडी किस तरह मददगार (लेने वालों के अलावा) साबित हो रही है? जब कभी भी कोई सब्सिडी को लेकर सवाल उठाता है तो जो लोग इसे लेते हैं वे चिल्ल-पौं करने लगते हैं और इसे 'आजीविका पर संकटÓ करार देने लगते हैं। समस्या केवल यही है कि आजादी और 1991 के दौर से ही ऐसा हो रहा है। हालांकि, आजीविका का मसला किसी भी लिहाज से कमतर नहीं है लेकिन हमारी कोशिश केवल सब्सिडी के नए-नवेले रास्तों पर गुहार लगाने की हो रही है।

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