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विधानसभा चुनाव के बाद तय होगा नया राजनीतिक भाव
सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  March 11, 2011

निर्वाचन आयोग ने पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के कार्यक्रम की घोषणा कर दी है और इसके साथ ही असम, केरल, पुद्दुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में  चुनावों की उलटी गिनती शुरू हो गई है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वादा किया है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल किया जाएगा। यह मानना उचित होगा कि नए मंत्रियों की नियुक्ति या पुरानों को हटाने के निर्णय में चुनावों के दौरान सत्तारुढ़ गठबंधन का प्रदर्शन असर डालेगा।
इन चुनावों में कई बातें सामने आएंगी। वर्ष 2009 के आम चुनाव में कांग्रेस ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में सबसे अधिक 203 सीटें जीती थीं जो पिछले चुनाव यानी 2004 की 157 सीटों की तुलना में काफी अधिक थी लेकिन उसके बावजूद पार्टी नैतिक दबाव महसूस कर रही है और वह प्रशासनिक उलझनों की शिकार है। इसका एक कारण सत्ता का विभाजन भी हो सकता है।
प्रशासन का काम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास है जबकि राजनीति की बागडोर पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी के हाथ में है। ऐसे में जब सांसद या मंत्री मनमोहन सिंह अथवा उनके सहयोगियों के पास ऐसे काम के लिए आते हैं जो पूरा नहीं हो सकता तो उनके पास यही पक्की दलील होती है कि 'मैडम से बात हो गई है।Ó इसका मतलब यह कि सोनिया जी चाहती हैं कि यह काम हो जाना चाहिए। इस बीच राष्टï्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) वीटो के अधिकार के साथ सत्ता की धुरी का एक और केंद्र बनकर उभरी है।
खाद्य सुरक्षा विधेयक पर मौजूदा बहस इसका एक उदाहरण है। एक ओर जहां एनएसी का कहना है कि इसे पूरा किया जाए क्योंकि ऐसा न करना अनैतिक है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद कहती है कि ऐसे समय में जबकि भारी मात्रा में अन्न बरबाद हो रहा है और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में से उसकी चोरी की जा रही है, ऐसे में खाद्य सुरक्षा विधेयक लाना अनैतिक है और पहले कुछ सुधार लाए जाने चाहिए उसके बाद ही इस पर विचार होना चाहिए।
समूची नौकरशाही प्रशासन में आए ढीलेपन पर चर्चा कर रही है। एक वरिष्ठï नौकरशाह का कहना है कि सुरक्षा के मसले पर बनी मंत्रिमंडलीय समिति छोटे मोटे कामों में तो रुचि रखती है लेकिन वह सामरिक और नीतिगत सुधार के मुद्दों पर चर्चा करने से बचती है। प्रधानमंत्री संसद में कहते हैं कि वह मुख्य सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) की नियुक्ति और उसके बाद की फजीहत की पूरी जिम्मेदारी लेते हैं। उसके बाद वह कहते हैं कि राज्य मंत्री ने उन्हें कभी नहीं बताया कि सीवीसी के खिलाफ क्या मामले चल रहे हैं।
दूसरे शब्दों में कहा जाए तो वह कहना चाहते हैं कि वह समूचे प्रकरण से बाहर थे। इस वक्तव्य के बाद भारतीय जनता पार्टी ने पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के नेतृत्व में प्रधानमंत्री पर हल्ला बोला। उन्होंने सुषमा स्वराज की उस बात से अलग चलने का फैसला किया जिसमें उन्होंने कहा था कि लोगों के मन में प्रधानमंत्री को लेकर सम्मान का भाव है और हमें इस मामले को छोड़ देना चाहिए।
बहरहाल, लोग क्या सोचते हैं वह ज्यादा रोचक है। हाल ही में आयोजित एक सुरक्षा सम्मेलन में जहां कुछ वरिष्ठï अधिकारी मौजूद थे। एक अपेक्षाकृत कनिष्ठï सेवानिवृत्त अधिकारी को अध्यक्षता का मौका मिला था और एक वरिष्ठï सेवानिवृत्त अधिकारी अपना वक्तव्य दे रहे थे।
उन्हें अपनी बात कहने के लिए 10 मिनट का समय दिया गया था और वह तयशुदा समय से ज्यादा देर तक बोलते रह गए। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कनिष्ठï अधिकारी ने कहा, 'सर मैं सोनिया गांधी हूं और आप मनमोहन सिंह। मैं आप से कह रहा हूं कि आप अब बोलना बंद कर दें।Ó वरिष्ठï अधिकारी महोदय ने बोलना बंद कर दिया! सत्ता के ध्रुवों का अंतर अब आम लोगों की बोलचाल में शामिल हो रहा है। दुखद बात यह है कि सरकार के बीच भी बहस इस बात को लेकर नहीं है कि महत्त्वपूर्ण पदों पर सही लोगों को नियुक्त किया जाए। वहां चर्चा इस बात को लेकर रहती है कि ये लोग कितने नियंत्रण में रहेंगे। हाल में मंत्रिमंडल में अनौपचारिक रूप से इस बात पर चर्चा की गई कि किसी वरिष्ठï महिला को मुख्य निर्वाचन आयुक्त अथवा मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद पर नियुक्त किया जाए। बहरहाल चर्चा में मुद्दा यह नहीं था कि वह इन पदों के लिए सक्षम हैं अथवा नहीं बल्कि उनकी नाकाबिलियत यह थी कि वह बहुत कठोर थीं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो मंत्रिगण इस पद पर एक ऐसा अधिकारी चाहते थे जिसे आसानी से प्रभावित किया जा सके।
विधानसभा चुनावों के नतीजों का सरकार में आदेश के इस विभाजन पर बहुत अधिक असर तो नहीं होगा लेकिन कुछ हद तक संतुलन कायम करने में मदद जरूर मिलेगी। पश्चिम बंगाल में संप्रग की महत्त्वपूर्ण साझेदार तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनने की उम्मीद जतार्ई जा रही है।
तृणमूल कांग्रेस वाम मोर्चे का स्थान लेगी जो 30 वर्षों से सत्ता पर काबिज है। वाम दलों के एक और गढ़ केरल में कांग्रेस के जीतने की उम्मीद है। तमिलनाडु और पुद्दुचेरी में सत्तारुढ़ गठबंधनों को झटका लग सकता है लेकिन असम में कांग्रेस के दोबारा जीत हासिल करने की उम्मीद है।
उम्मीद है कि इन जीतों से उस घोटालाकाल का अंत होगा जिसने सत्ताधारी गठबंधन की जड़ खोद डाली है और शायद उसे नए सिरे से काम करने का उद्देश्य मिले। यह बात बहुत उलझाऊ है। 9 फीसदी की विकास दर के साथ अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन बहुत बेहतर है।
शहरी आबादी के पास पहले के मुकाबले काफी रकम है। सेवा क्षेत्र फलफूल रहा है। हां खाद्यान्न कीमतें बहुत ऊंची बनी हुई हैं लेकिन लोगों का वेतन भी बढ़ा है, और हां प्रशासनिक क्षेत्र से जुड़े लोग भी कड़े उपाय अपनाने से बच रहे हैं। पाकिस्तान के साथ बातचीत की शुरुआत के मसले पर साफतौर पर अभी भी यह संदेह है कि क्या पाकिस्तान कभी भारत का दोस्त हो सकता है? मुंबई हमले ने इस सवाल को और मौजूं बना दिया।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की गंभीरता पर किसी को शक नहीं लेकिन कई बार उनकी नेतृत्व क्षमता पर शंका जरूर होती है। सरकार को ऐसी निर्णायक और असंदिग्ध राजनीतिक जीत की आवश्यकता है जो विपक्ष को उससे सहमत होने के लिए मजबूर कर दे। आगामी विधानसभा चुनाव निश्चित तौर पर यह मौका मुहैया करा सकते हैं जो न केवल सत्तापक्ष के लिए निर्णायक होंगे बल्कि विपक्ष के लिए भी इनकी कम अहमियत नहीं होगी।

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