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यूं तो मर्ज हैं अनेक, मगर उनकी जड़ है एक
सुनीता नारायण /  February 14, 2011

दावोस में हर वर्ष होने वाली विश्व आर्थिक मंच की हालिया बैठक में दुनिया के ताकतवर मुल्कों ने उन खतरों का आकलन किया है जिनसे हमें आने वाले समय में दो चार होना पड़ सकता है। उनके विश्लेषण के मुताबिक आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन दुनिया के सामने सबसे बड़े जोखिम के रूप में उभर सकता है।
इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात है जलवायु परिवर्तन और अन्य बड़े जोखिमों का आपसी संबंध। उदाहरण के लिए आर्थिक असमानता (तीसरा बड़ा खतरा), मौसम में असमान उतार चढ़ाव (पांचवां), ऊर्जा कीमतों में असामान्य उतार चढ़ाव (छठा), भू-राजनीतिक संघर्ष (सातवां) और बाढ़ और जल सुरक्षा (नौवां और 10वां बड़ा जोखिम) का मसला।
उपरोक्त चुनौतियां अतीत या भविष्य की बात नहीं करतीं बल्कि यह हमारे मौजूदा समय यानी वर्तमान की दास्तान कह रही हैं। द फूड ऐंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन (एफएओ) के मुताबिक इस जनवरी में खाद्य कीमतें ऐतिहासिक ऊंचाई पर जा पहुंचीं। एफएओ का खाद्य कीमतों का सूचकांक जनवरी में औसतन 231 अंकों पर रहा। यहां 1990 से वैश्विक खाद्यान्न कीमतों का रिकॉर्ड रखा जा रहा है और यह तब से अब तक का उच्चतम स्तर है।
कीमतों में इस तेजी के लिए केवल लालची सटोरियों और गड़बड़ वायदा बाजार अथवा बढ़ती मांग जैसे पारंपरिक कारण जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि इसके लिए नए खतरे जिम्मेदार हैं। इनमें मौसम में आ रहे बदलाव, बाढ़ और सूखा, गर्मी और पाला जैसे अनेक नए कारण शामिल हैं। निश्चित रूप से ये नई चुनौतियां पहले के मुकाबले कहीं अधिक कठिन हैं। बीते वर्ष के बारे में ध्यान कीजिए। अगस्त और सितंबर महीने में दुनिया के दो अलग-अलग अन्न उपजाने वाले इलाके मौसम की मार से प्रभावित हुए। कनाडा में जहां खासी ठंड और पाला पड़ा वहीं रूस को बेतरह गर्मी, आग और सूखे का सामना करना पड़ा।
इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया में बाढ़ और अब चीन के मुख्य गेहूं उत्पादक उत्तरी इलाके में ठंड और सूखा पड़ रहा है। इन तमाम बातों का एक ही मतलब है गेहूं के उत्पादन में कमी और कीमतों में इजाफा। हमारे देश में पिछले दो महीनों के दौरान आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में बेमौसम बारिश के बाद खेतों में कटाई के लिए तैयार धान की फसल बरबाद हो गई। तमिलनाडु में मिर्च की फसल प्रभावित हुई।
मध्य प्रदेश, राजस्थान और पंजाब में पाला और अत्यधिक ठंड ने फसल को नुकसान पहुंचाया। किसानों ने फसल बरबाद होने पर आत्महत्या तक कर ली। इनके अलावा भी मौसम में बदलाव के चलते फसल बरबाद होने के अनेक अन्य उदाहरण हैं।पिछले वर्ष देश के अनेक इलाकों में बाढ़ आई थी। इस वर्ष अफ्रीका के अनेक इलाके बाढ़ का सामना कर रहे हैं। सूखा और बाढ़ विकास की प्रक्रिया से हासिल होने वाले लाभों को जबरदस्त धक्का पहुंचाते हैं।
हमें मौसम में ऐसे किसी बदलाव का पता नहीं है जिसकी वजह जलवायु परिवर्तन हो लेकिन उनकी बढ़ती तीव्रता और निरंतरता का उससे संबंध अवश्य है। हमें यह समझना शुरू करना होगा कि खराब मौसम, बढ़ती खाद्यान्न कीमतें जिनके कारण गरीबी भी बढ़ रही है और दुनिया भर में फैल रही अशांति का आपस में क्या संबंध है।
खाद्यान्न कीमतों में आई तेजी ने ही ट्यूनीशिया में विद्रोह की पहली चिंगारी को हवा दी और अब वह मिस्र समेत अरब की दुनिया के कई देशों तक फैल गई है। साफ है कि आबादी के साथ-साथ खाद्यान्न की बढ़ती मांग के साथ खराब मौसम के कारण फसल उत्पादन में आ रही कमी  और खराब प्रशासन आगे चलकर परिस्थितियों को और अधिक विस्फोटक बना सकते हैं।
ये सारी बातें वैश्विक स्तर पर आर्थिक असमानता में और अधिक इजाफा करने वाली साबित होंगी। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्यों अमीर देश अभी भी इस स्थिति से मुंह फेरे हुए हैं। वे मिलकर जलवायु परिवर्तन की आसन्न समस्या का हल खोजने की कोशिश क्यों नहीं करते? क्यों कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की कोई कोशिश नहीं होती? दरअसल, दुनिया भर में इतने बड़े संकट से निपटने  को लेकर पता नहीं क्यों सकारात्मक वातावरण नहीं है।
जलवायु परिवर्तन पर किसी समझौते के संबंध में भी दुनिया अब तक नही ं पहुंच पाई है। इस संबंध में तमाम प्रयास निराश करने वाले हैं। हमें पता है कि कानकुन में जानबूझकर और सफलतापूर्वक उत्सर्जन के तय लक्ष्यों में कटौती की गई जबकि वह दुनिया के वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए बड़ी चुनौती है। वहां सारी कवायद अमेरिका और उसके सहयोगियों को खुश करने के लिए की गई। कानकुन के बाद अब दुनिया के प्रमुख देश उत्सर्जन में कमी को लेकर कड़ा संबंध उठाने के मामले में किसी कानूनी, नैतिक अथवा वित्तीय दबाव में नहीं हैं। कानकुन में किसी और देश ने नहीं बल्कि बोलीविया ने समझौते की निंदा की और कहा कि यह किसी के हित में नहीं है।
चूंकि कानकुन में दुनिया के देश कार्बन उत्सर्जन के मुद्दे पर अपनी पुरानी प्रतिबद्घताओं से भी पीछे हट गए हैं।  जापान ने अपने हाथ खड़े करते हुए कह दिया है कि वह और अधिक कुछ नहीं कर सकता। अमेरिका अभी इस जुगत में लगा है कि वह कैसे उन छोटे प्रयासों को बंद कर सके जो वह कार्बन डाइ ऑक्साइड जैसे प्रदूषक तत्त्व के उत्सर्जन को कम करने के लिए कर रहा है। यूरोप के देश तथा अन्य देश ऐसी कोशिशों में लगे हैं ताकि खुद उन्हें इस दिशा में ज्यादा कुछ न करना पड़े। दुनिया में अनिश्चितता के बादल छाए हुए हैं। एक ओर जहां संकट बढ़ रहा है और सामने आ रहा है वहीं दूसरी ओर इस संबंध में पर्याप्त प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिल रही।
मेरे सवाल का जवाब खोजना कोई कठिन काम नहीं है। दावोस में विश्व आर्थिक मंच के सदस्यों द्वारा किए गए जलवायु परिवर्तन संबंधी आकलन में भी एक बहुत बड़ी कमी है। उसमें दुनिया को इस सबसे बड़े खतरे की ओर ले जाने वाले शक्तिशाली आर्थिक खेल की भूमिका का कोई जिक्र नहीं है। जो प्रमुख राष्टï्र दुनिया को चला रहे हैं उन्होंने अभी तक समस्या के हल की ओर एक कदम तक नहीं बढ़ाया है। यह हमारे समय की सबसे बड़ी और घातक समस्या है। हम सबको इसकी कीमत चुकानी होगी। अगर निकट भविष्य में इसको लेकर तत्काल कदम नहीं उठाए तो हम आने वाली पीढिय़ों के लिए जहरभरी विरासत ही छोड़ पाएंगे।

Keyword: davos, world economic forum, sunita narayan,
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