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वाहन बीमा कंपनियों पर भारी पड़ते अदालती आदेश
अदालती आईना
एम. जे. एंटनी /  January 16, 2011

वाहन बीमा कंपनियों के लिए हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया एक निर्णय स्तब्ध करने वाला हो सकता है। एक वाहन से पेट्रोल चोरी के दौरान घटी दुर्घटना में कुछ लोगों की जान जाने के इस मामले में न्यायालय ने कहा है कि इस मामले में बीमा कंपनी को पीडि़तों को भुगतान करना होगा। पिछले 10 वर्षों के दौरान यह मामला दो बार न्यायालय के समक्ष आया और हर बार बीमा कंपनी को ही मुंह की खानी पड़ी।
मोटर वाहन अधिनियम के मुताबिक किसी सड़क दुर्घटना में होने वाली मौत अथवा चोट के लिए दो तरह की क्षतिपूर्ति का प्रावधान है। पहली का नाम है, 'नो फॉल्ट लाइबिलिटीÓ, इसमें उस स्थिति में भी भुगतान करना पड़ता है जबकि पीडि़त का दोष हो। इस कानून का उद्देश्य है घायल और उसके आश्रितों को तत्काल राहत उपलब्ध कराना क्योंकि वास्तविक जिम्मेदारी तय करने में काफी समय लग सकता है। बाद में वास्तविक क्षतिपूर्ति का आकलन इस आधार पर किया जाता है कि दुर्घटना के लिए जिम्मेदार कौन था और पीडि़त या मृतक की इसमें क्या भूमिका थी। चूंकि वाहनों का बीमा हर स्थिति में अनिवार्य है अत: क्षतिपूर्ति का भुगतान करने की जिम्मेदारी बीमा कंपनी की रहती है। मौजूदा मामले में बीमाकर्ता को दोनों स्थितियों में भुगतान करना पड़ा।
इस मामले में हुआ यह था कि पुणे-बेंगलुरू राजमार्ग पर एक पेट्रोल टैंकर और ट्रक में भिड़ंत हो गई। दुर्घटना के बाद टैंकर सड़क से नीचे उतर कर थोड़ी गहराई में जा गिरा। परिणामस्वरूप उसमें से पेट्रोल बहने लगा और पास ही एक गड्ढïे में एकत्रित हो गया। सुबह-सुबह गांव वाले इकठ्ठïे हुए और उन्होंने वाहन चालक और खलासी की चेतावनी के बावजूद पेट्रोल की चोरी शुरू कर दी। इसी हंगामे के बीच वहां धमाका हो गया जिसमें 46 लोगों की जान चली गई। मृतकों के आश्रितों ने वाहन मालिक और बीमा कंपनी से हर्जाना देने की मांग की और वे इसके लिए निर्धारित पंचाट के पास पहुंच गए। पंचाट ने पाया कि सड़क दुर्घटना और चोरी की कोशिश में हुई मौतों का आपस में कोई संबंध नहीं है। लेकिन बंबई उच्च न्यायालय ने शिवाजी दयानु पाटिल और श्रीमती वत्सला के मामले में पंचाट के फैसले को पलट दिया और मामले में 'नो फॉल्ट लाइबिलिटीÓ तय कर दी। सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय को बरकरार रखा।
सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में जो निर्णय दिया वह दूसरे दौर का निर्णय था जिसमें न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी ने उच्च न्यायालय के उस निर्णय के खिलाफ अपील की थी जिसमें तथ्यों के विश्लेषण के बाद कुछ पीडि़तों को क्षतिपूर्ति देने का निर्देश दिया गया था। पंचाट ने अपने निर्णय में कहा था कि आग लगने के समय वाहन प्रयोग में नहीं था। इसके अलावा पहले घटी सड़क दुर्घटना और विस्फोट का आपस में कोई संबंध नहीं था। पंचाट ने यह भी कहा था कि पेट्रोल चुराने की मंशा रखने वाले लोग ही इस दुर्घटना के लिए जिम्मेदार थे। पुलिस रिपोर्ट में भी पीड़तों पर ही आरोप लगाया गया कि उनके द्वारा बीड़ी सुलगाए जाने के कारण हादसा हुआ। बहरहाल, उच्च न्यायालय ने फैसले को उलट दिया और बीमा कंपनी को ही भुगतान करने का निर्देश दिया। वाहन स्वामी और बीमा कंपनी ने इस आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की। उन्होंने जोर देकर कहा कि पेट्रोल टैंकर कानून के मुताबिक वाहन नहीं था क्योंकि एक तो वह इस्तेमाल में नहीं था दूसरे वह नीचे गिरा हुआ था और सड़क पर चलने की स्थिति में नहीं था। इसके अलावा दुर्घटना और उसके पांच घंटे बाद हुए विस्फोट में कोई संबंध नहीं था। बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया और निर्णय दिया कि भले ही वाहन चल नहीं रहा था तब भी चूंकि वह चलाए जाने योग्य था इसलिए उसे 'इस्तेमाल मेंÓ माना जाएगा।
ओरिएंटल फायर ऐंड जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और सुमन नवनाथ राजगुरु के मामले में  एक पेट्रोल टैंकर को एक पेट्रोल पंप के सामने फुटपाथ के निकट खड़ा किया गया था। इसमें हुए विस्फोट की वजह से कुछ लोगों को घातक चोटें आईं। बंबई उच्च न्यायालय ने बीमाकर्ता की यह अपील खारिज कर दी कि घटना के समय टैंकर इस्तेमाल में नहीं था। ऐसे ही अन्य निर्णयों को नजीर मानकर ही मौजूदा मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने बीमा कंपनी को भुगतान के लिए जवाबदेह ठहराया।
क्षतिपूर्ति के मामलों में पीडि़तों की उपेक्षा का मुद्दा हमेशा बहस का केंद्र रहा है। बीमा कंपनियां कहती रही हैं कि आमतौर पर सड़क दुर्घटनाओं में पीडि़तों की भी भूमिका रहती है। अगर यह बात साबित हो जाती है तो मालिक और बीमा कंपनी का उत्तरदायित्व बरती गई उपेक्षा के ही अनुपात में कम हो जाता है। लेकिन इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय तक ने यह स्वीकार नही ंकिया कि पीडि़त कुछ गलत कर रहे थे। उसने यह तर्क स्वीकार नहीं किया। उसने प्रमाणों को भी स्वीकार नहीं किया। खैर हो सकता है कि चोरी के मामले में सभी गांव वाले शामिल न रहे हों और कानून के प्रावधानों का उद्देश्य भी दुर्घटना के मामलों में कल्याणकारी उपाय अपनाना ही है। बहरहाल न्यायालय को भी दुर्घटनाओं के मामलों में भीड़ के व्यवहार को ध्यान में रखना चाहिए जो कई बार पीडि़तों से नकदी, क्रेडिट कार्ड और आभूषण आदि लूटते हैं और उसके बाद बचाव कार्य शुरू करते हैं। जो भी हो लेकिन इस निर्णय का बीमा कंपनियों पर भारी असर होगा क्योंकि ऐसे अन्य मामलों में उनके पास तर्क का अभाव होगा।

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